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सबसे खर्चीला चुनाव


भारत में दुनिया के सबसे महंगे चुनाव होने जा रहे हैं, तो इसमें ज्यादा आश्चर्य की बात भले न हो, लेकिन यह हमारे चिंतन का एक अनिवार्य विषय जरूर होना चाहिए। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज और अन्य अनेक राजनीतिक पंडितों ने अनुमान लगाया है कि 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों वाले विशाल लोकतंत्र में चुनावों का कुल खर्च इस बार 500 अरब रुपये के आंकड़े को पार कर जाएगा। वर्ष 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति और कांग्रेस (निचले सदन) के चुनावों में 6.5 अरब डॉलर अर्थात 455 अरब रुपये खर्च हुए थे। अमेरिका का रिकॉर्ड भारत के इस आम चुनाव में टूटने वाला है, तो हमें इस पर अवश्य गौर करना चाहिए कि हमारी वास्तविक खर्च क्षमताएं क्या हैं? अमेरिका में जहां हर व्यक्ति औसतन 6,000 रुपये से ज्यादा प्रतिदिन खर्च करता है, वहीं भारत में 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का प्रतिदिन का खर्च तीन डॉलर यानी लगभग 210 रुपये है। अमेरिका के लिए चुनावों का महंगा होना बहुत चिंता का विषय नहीं, लेकिन भारत जैसे देश में चुनावों को खर्च की शालीन सीमाओं का सम्मान करना ही होगा। ज्यादातर भारतीयों के पास प्रतिदिन खर्च के लिए 250 रुपये भी नहीं होते, लेकिन यहां प्रति मतदाता चुनावी खर्च 560 रुपये के करीब पहुंच जाता है, तो क्यों? 
वर्ष 2014 के चुनावों में 300 अरब रुपये से ज्यादा हुए थे और अकेले चुनाव आयोग ने 4,000 करोड़ रुपये खर्च किए थे। जाहिर है, इस बार भी चुनाव आयोग का खर्च बढे़गा, क्योंकि चुनावों को किफायती बनाने के लिए चुनाव आयोग की कोई विशेष तैयारी नजर नहीं आती। जब गंभीर चिंतन ही नहीं है, तो किसी ठोस पहल की आशा कैसे की जाए? चुनावों की घोषणा से लेकर 23 मई तक भारत के तन-मन-धन का एक बड़ा भाग चुनावों की भेंट चढ़ने वाला है, तो हम क्या करें? ध्यान रहे, लोकतंत्र की जिम्मेदारी केवल चुनाव आयोग या सरकार या राजनीतिक पार्टियों पर ही नहीं है, हम मतदाताओं और नागरिकों का भी कर्तव्य है कि हम अपने-अपने मोर्चे पर चुनावों को खर्च की शालीन सीमाओं में रखें। महात्मा गांधी ने कहा था, केवल सरकार के भरोसे मत रहना। अत: लोकतंत्र के लिए कुछ काम और सुधार हमें स्वयं भी करने चाहिए। किसी प्रत्याशी या किसी पार्टी का केवल खर्च देखकर उसे कतई वोट न करें। चुनावों को अमीरों का चुनाव न बनने दें। प्रत्याशी या पार्टी की गुणवत्ता पर गौर करें। हमारे चुनाव दुनिया के सबसे बड़े चुनाव अवश्य रहें, पर सबसे अच्छे व किफायती चुनाव के रूप में भी हमारे देश की ख्याति बने, तो सोने पर सुहागा होगा। 
दुनिया में जो बेहतर चुनाव वाले देश हैं, उनसे भी हमें सीखना चाहिए। डेनमार्क और कुछ अन्य यूरोपीय देशों के चुनावों को आदर्श कहा जाता है। वहां सुनिश्चित किया जाता है कि चुनावों में पैसे की भूमिका न्यूनतम रहे। टीवी पर प्रचार प्रतिबंधित रहता है। पर्चों, पोस्टर, सोशल मीडिया के जरिये ही ज्यादातर प्रचार चलता है। एक खूबी देखिए, डेनमार्क में मतदान प्रतिशत 80 से ज्यादा रहता है, जबकि महंगे चुनावों के लिए ख्यात अमेरिका में मतदान 60 प्रतिशत से भी नीचे होता है। आज हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे विशाल लोकतंत्र में चुनावों पर जो भी खर्च हो, वह देश को सभ्य और सकारात्मक दिशा में ले जाए। चुनावों में मन का महत्व बढ़े, धन का नहीं।

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  • Web Title:Editorial Hindustan column for 13 March