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शह-मात के खेल में

 

एक पुरानी कहावत है कि खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर, हश्र दोनों सूरत में एक ही होता है। इन दिनों जब गोवा और कर्नाटक की राजनीति में खरबूजों के रंग बदलने का दौर जारी है, तब ये सवाल बेमानी से हो रहे हैं कि इसके पीछे कारण क्या है? इसके लिए दो तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। एक तो यह कि भारतीय जनता पार्टी जैसे-तैसे उस अभियान में जुट गई है, जिसे ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान का नाम दिया जाता है। दूसरा तर्क यह कहता है कि पिछले आम चुनाव के बाद कांग्रेस कमजोर हो गई है कि इसके नेता डूबते जहाज को छोड़कर भाग रहे हैं, और उन्हें अपना भविष्य अब कांग्रेस की बजाय भाजपा में दिख रहा है। इसमें पार्टी की वह अनिश्चितता भी एक भूमिका निभा रही है, जो उसके केंद्रीय नेतृत्व को लेकर इन दिनों बनी हुई है। शायद ये दोनों ही अपनी-अपनी तरह के आंशिक सच हैं और इनका कुल जमा नतीजा यह है कि एक जगह कांग्रेस के समर्थन वाली सरकार किसी भी क्षण गिर सकती है, तो दूसरी जगह विधानसभा में पार्टी बेतरह कमजोर स्थिति में पहुंच गई है। दूसरी तरह से देखें, तो एक जगह भाजपा सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है, तो दूसरी ओर उसने उस प्रदेश में अपनी सरकार को बहुत मजबूत बना लिया है, जहां वह दो साल पहले सरकार बनाने की स्थिति में ही नहीं दिख रही थी।
ये दोनों ऐसे प्रदेश हैं, जहां पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान त्रिशंकु विधानसभा बनी थी। खंडित जनादेश अपने पीछे राजनीतिक खेल की बड़ी गुंजाइश हमेशा ही छोड़ जाता है, और यही इन दोनों प्रदेशों में हुआ या अब तक हो रहा है। दो साल पहले हुए गोवा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पहले नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन सरकार बनाने की बाजी जीतने का जुगाड़ भाजपा ने भिड़ा लिया। तबसे वह लगातार अपनी स्थिति जैसे-तैसे मजबूत बनाती जा रही है। इसके ठीक उलट कर्नाटक में हुआ था। वहां भाजपा पहले नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी और कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी। भाजपा को मात देने के लिए वहां कांग्रेस ने ऐसा राजनीतिक समझौता किया कि भाजपा को सरकार बनाने से वंचित होना पड़ा। जो सरकार बनी, वह लगातार कमजोर होती हुई अब गिरने के कगार पर है। खंडित जनादेश के बाद ऐसी राजनीति कोई नई बात नहीं है। जहां भी ऐसा जनादेश आता है,  राजनीति के वात, कफ और पित्त अपनी अति के साथ प्रगट हो जाते हैं। आलोचनाएं हमेशा होती हैं, लेकिन इस रोग के इलाज का कोई विमर्श हमारे पास नहीं है।
फिलहाल यह भी कहा जा रहा है कि जो हो रहा है, वह पिछले आम चुनाव के नतीजों का ही एक तरह से विस्तार है। कुछ हद तक यह बात सही भी है और कुछ हद तक नहीं भी। आम चुनाव की भारी जीत ने भाजपा को भारी उत्साह दिया है और वह गाहे-बगाहे ‘पूरे घर को बदल डालूंगा’ वाले तेवर में दिखाई देती है। इसी का एक दूसरा पक्ष यह है कि भारी हार के मनोवैज्ञानिक दबाव से कांग्रेस अभी तक उबर नहीं सकी है और अपनी बची-खुची ताकत को बनाए रखने जैसा काम भी उससे ठीक से नहीं हो पा रहा है। लेकिन इसे अगर हम दूसरी तरह से देखें, तो यह मामला आम चुनाव के नतीजों से बहुत अलग है। आम चुनाव के नतीजे एक जनादेश थे, जबकि यह शह-मात की राजनीति है और वही हो रहा है, जो ऐसी राजनीति में होता है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 12 july