DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अनशन पर चंद्रबाबू 

 

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू अपने राज्य के लिए विशेष दर्जा मांगने दिल्ली में हैं। करीब सवा पांच साल बाद वह इसके लिए आंध्र भवन लौटे हैं। एक बार और अनशन करने के लिए। आखिर क्यों बार-बार अनशन कर रहे हैं चंद्रबाबू? दरअसल, 2013 में आंध्र प्रदेश को दो भागों में बांटने का फैसला केंद्र की यूपीए सरकार ने किया था। उससे तेलंगाना और आंध्र दो अलग राज्य बने। राज्य का सबसे अहम शहर हैदराबाद तेलंगाना में चला गया। आंध्र की राजधानी धीरे से तेलंगाना की राजधानी हो गई। हैदराबाद का फिसल जाना आंध्र के लिए भारी घाटे का सौदा था। आखिर हैदराबाद राज्य को उसकी आय का बड़ा हिस्सा देता था। तमाम उद्योगों और कंपनियों का जमावड़ा वहां है। बड़ी तादाद में शैक्षिक संस्थान हैं। फिल्मों का भी जबर्दस्त कारोबार है। जाहिर है, आंध्र को राजस्व का भारी नुकसान उठाना पड़ा। 
राज्य के बंटवारे से आंध्र की आय का जरिया ही कम नहीं हुआ, उसे अपने लिए अलग राजधानी भी बनानी थी। एक राजधानी बनाने के लिए अच्छी-खासी धनराशि की जरूरत होती है, यानी एक पूरी व्यवस्था विकसित करनी थी। इस घाटे को पूरा करने के लिए तब की केंद्र सरकार ने राज्य को ‘विशेष दर्जा’ देने का वादा किया था। यह दर्जा पांच साल के लिए दिया जाना था। दिक्कत यह हुई कि वादा तो हो गया, मगर जब आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक आया, तब उसमें विशेष दर्जे का प्रावधान नहीं था। असल परेशानी वहीं से शुरू हुई। तब की सरकार ने विशेष दर्जे की बात की थी। लेकिन उसके बाद आई राजग सरकार का कहना था कि 14वें वित्त आयोग ने राज्य को इस तरह के दर्जे की सिफारिश नहीं की है। चंद्रबाबू नायडू की बात जब नहीं सुनी गई, तो उन्होंने राजग को छोड़ दिया। यही नहीं, पिछले साल जुलाई में उनकी पार्टी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लेकर आई। कोई राज्य विशेष दर्जा इसलिए चाहता है, क्योंकि ऐसे राज्यों को कर्ज की बजाय अनुदान के तौर पर पैसा मिलता है। यह बहुत बड़ा फर्क डालता है। कर्ज आपको चुकाना पड़ता है। उससे राज्य पर बोझ और बढ़ जाता है। फिर आयकर, कॉरपोरेट टैक्स, आबकारी शुल्क वगैरह में भी छूट मिलती है, जिससे नए उद्योग-धंधे लगाने वालों को छूट दी जा सकती है। यह सब नए राज्य के लिए बेहद जरूरी होता है।
यूं तो चहुंमुखी विकास के लिए केंद्र और राज्यों के रिश्ते का सहज होना जरूरी है। लेकिन ऐसा होता नहीं। हर राज्य कहीं न कहीं विशेष दर्जे की कोशिश में रहता है और केंद्र उसे टालने को बेताब। आंध्र को विशेष दर्जा न देने के पीछे केंद्र की अपनी दिक्कतें हैं। कई राज्य पहले से विशेष दर्जा की मांग कर रहे हैं। मसलन, बिहार, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़। एक को दर्जा देते ही दूसरे तमाम राज्य यह मांग करने लगेंगे। हालांकि, आंध्र का मसला अलग है। तमाम तकनीकी बातें एक तरफ, लेकिन यह तय है कि नए सिरे से किसी राज्य का गठन आसान नहीं होता। उसकी दिक्कतें ही दिक्कतें होती हैं। सबसे बड़ी दिक्कत तो बुनियादी ढांचे को खड़ा करने की होती है। विकास का मुद्दा अपनी जगह है ही। उन दिक्कतों को समझा जाना चाहिए। उस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। नए राज्य को बनाने में केंद्र की अहम भूमिका होती है। यह भूमिका सचमुच एक अभिभावक की है। उसे धीरे-धीरे खड़ा करना होता है। वह खुद-ब-खुद खड़ा नहीं हो सकता।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 12 february