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भारत बंद की राजनीति 

राजनीति में सिद्धांत और व्यवहार का फर्क क्या होता है, इसे हम सबसे अच्छी तरह ‘भारत बंद’ जैसे विरोध आयोजनों से समझ सकते हैं। बंद जैसे आयोजनों का इस्तेमाल सरकार को चेतावनी देने के लिए किया जाता है। धारणा यह है कि सरकार के किसी फैसले या नीति से जनता गुस्से में है, तो वह ऐसे विरोध आयोजन में बढ़-चढ़कर भाग लेगी। जनता में जितना गुस्सा होगा, उतना ही बंद सफल होगा। मगर हकीकत में बंद की सफलता इस पर निर्भर करती है कि बंद की अपील किसने की है, उसे किस-किस का समर्थन मिल रहा है और आयोजन में शामिल होने वालों की जमीनी ताकत क्या है? बंद असल में विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन होता है। हकीकत में बंद की सफलता जनता के गुस्से पर उतनी निर्भर नहीं करती, जितनी कि यह इससे तय होती है कि इसका आयोजन करने वालों की वितंडा खड़ा करने की क्षमता कितनी है? जो सड़कों पर, बाजारों में जितना बवाल खड़ा कर सकता है, बंद को कामयाब बनाने में उतना ही सफल हो जाता है। फिर भारत बंद की सिर्फ राजनीति ही नहीं होती, इसका एक भूगोल भी होता है। जिन प्रदेशों में आपकी सरकारें हैं, उन प्रदेशों में बंद को सफल बनाने में आप आसनी से कामयाब हो सकते हैं। ऐसे प्रदेशों में अक्सर बंद के दिन सरकारी दफ्तरों के ताले तक नहीं खुलते। स्कूल-कॉलेज भी पहले ही बंद में शामिल होने की घोषणा कर देते हैं। जिन कारखानों में आपकी टे्रड यूनियन है, वहां भी इसे आसानी से सफल बनाया जा सकता है। नतीजा यह होता है कि बंद का आयोजन चाहे जो भी करे, अगले दिन अखबारों में आमतौर पर यही शीर्षक मिलता है- बंद का मिला-जुला असर रहा।

सोमवार को कांग्रेस ने भारत बंद का जो आयोजन किया, उसकी कहानी भी इससे अलग नहीं है। यह बंद पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत और रुपये के घटते मूल्य पर विरोध दर्ज कराने के लिए था। ये दोनों ही समस्याएं सचमुच ऐसी हैं, जो जनता को किसी न किसी रूप में परेशान कर रही हैं। इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि आम आदमी वास्तव में बंद को सफल बनाने के लिए सड़कों पर आ गया हो। शक्ति प्रदर्शन के मामले में यह बंद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर हो सकता था, क्योंकि यह उम्मीद बन रही थी कि इसके लिए पूरा विपक्ष एक दिखेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में शरद पवार और शरद यादव जैसे नेता जरूर शामिल हुए और बिहार में लालू यादव के राजद ने इसमें जोर-शोर से भाग लिया, लेकिन इसमें पूरे विपक्ष के एक साथ आने की सूरत नहीं दिखाई दी। सबसे बड़ी बात थी कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने खुद को इससे दूर रखा। इस बंद ने यह तो बता ही दिया कि पूरे विपक्ष का एक साथ आना फिलहाल इतना आसान भी नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि पिछले एक हफ्ते के अंदर यह दूसरा ‘भारत बंद’ था। पिछले भारत बंद का आयोजन एससी-एसटी ऐक्ट के मुद्दे पर किया गया था। उसका पूरा आयोजन सोशल मीडिया पर ही किया गया था और उसमें कोई राजनीतिक दल प्रत्यक्ष तौर पर शामिल नहीं था। जमीनी तौर पर इसके लिए कुछ छोटे-मोटे संगठन ही सक्रिय थे। यह तय है कि 2019 के आम चुनाव से पहले हमें ऐसे कई और बंद देखने को मिलेंगे। शक्ति प्रदर्शन का असली समय चुनाव से पहले ही होता है।

 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 11 september