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असुरक्षित होता सफर

सहज कल्पना की जा सकती है कि जो ट्रेन कुछ समय बाद ही अपने गंतव्य पर पहुंचने को हो, उसके यात्रियों के डकैतों से घिरे होने की सूचना मिले, तो परिवारीजनों पर क्या गुजरी होगी? बुधवार को डकैतों से घिरे नई दिल्ली-भागलपुर साप्ताहिक एक्सप्रेस के यात्रियों और उनके परिजनों को इसी त्रासदी से गुजरना पड़ा। बिना एस्कॉर्ट टीम के चल रही इस ट्रेन के चालक और गार्ड को बंधक बनाकर जिस तरह यात्रियों को लगभग 40 मिनट तक अलग-अलग बोगियों में लूटा गया, उसने लगातार महंगी होती गई ट्रेन यात्रा में सुरक्षा और एक ट्वीट पर समाधान के दावों की कलई खोलकर रख दी। 
ट्रेन जिस जगह लुटी, वह मुंगेर के एकदम करीब है। यह इलाका नक्सल सक्रियता के लिहाज से भी संवेदनशील है। मान लेना चाहिए कि इस मार्ग पर अपेक्षा से ज्यादा सतर्कता बरती जाती होगी। लेकिन इसके बावजूद इस राह से गुजरने वाली किसी ट्रेन में एस्कॉर्ट का न होना और इस तरह महज रात साढ़े नौ बजे के आसपास लुट जाना चिंता में डालता है। दो दर्जन से ज्यादा लुटेरों ने जिस तरह यात्रियों को बड़े आराम से लूटा, एक-एक महिला की चेन, अंगूठी और बिछिया तक उतरवाई, कई यात्रियों को चाकू से घायल किया, वह हैरान करने वाला है। सच तो यही है कि जो रेलवे, ट्रैक किनारे की अपनी संपत्ति की रक्षा करने में खुद को असमर्थ पाता रहा है, सर्दी में कोहरे को छोड़िए, गरमी में भी ट्रेन समय पर नहीं चला पा रहा, खान-पान और बेडरोल में गड़बड़ी की शिकायतें कम नहीं हो रहीं, ऐसे में यात्रियों की सुरक्षा भी ताक पर रखी दिखाई दे, तो किसी का भी परेशान होना स्वाभाविक है। कहने में हर्ज नहीं कि आधुनिकता के इस दौर में भी थोड़े से दबाव की स्थिति में जिस रेलवे का ऑनलाइन ट्रेन ट्रैकिंग सिस्टम तक जवाब दे जाता हो, उसके लिए संभलने का वक्त है। यह उन चर्चाओं पर भी सोचने का वक्त है कि कहीं यह सब अलग रेल बजट खत्म कर देने के बाद रेलवे बोर्ड की कम हुई ताकत और आत्मनिर्भरता कम होने से उपजे संकट का कुफल तो नहीं। 
ट्रेनों में सुरक्षा-संरक्षा, लेट-लतीफी, खान-पान, बेडरोल और साफ-सफाई की शिकायतें नई भले न हों, इस सच से तो किसी को इनकार नहीं होगा कि हवाई यात्रा की तर्ज पर डायनेमिक प्राइसिंग के इस दौर ने इन सवालों की तल्खी बढ़ाई है। रेल बजट को आम बजट में समाहित करने के पीछे तर्क था कि अलग बजट रेलवे को लोक-लुभावन घोषणाओं और उन्हें पूरा करने में ही उलझा देता है, ढांचागत और यात्री सुविधाओं-सुरक्षा पर ध्यान नहीं देने देता, लेकिन बीते एक-दो सालों का सच, उस सोच और भावना के बिल्कुल विपरीत है। जब हवाई चप्पल पहनने वाले के लिए भी हवाई यात्रा सुगम बनाने की बात हो रही हो, तब सुखद न सही, सुरक्षित यात्रा उपलब्ध कराना तो रेलवे की जिम्मेदारी बनती है। क्योंकि इस बात से तो कोई भी सहमत होगा कि भारी-भरकम किराए के दौर में यात्री जेब से समझौता भले कर ले, सुविधाओं व अपनी सुरक्षा से तो समझौता नहीं करना चाहेगा। यात्री की इन चिंताओं से उपजी चुनौती को साध पाना अपने आप में बड़ा काम है, जिसमें रेलवे फेल होता दिखा है। यह वक्त अपनी जर्जर काया पर बुलेट टे्रन दौड़ाने की बजाय काया को मजबूती देकर पटरी से उतरी व्यवस्थाएं वापस पटरी पर लाने का है, जिसके न तो कोई प्रयास दिख रहे हैं, न आसार।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 11 january