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बेअसर बंद

हो सकता है कि आपको इसका पता भी न चला हो। पिछले दो दिनों में जब पूरा देश सरकारी नौकरियों में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने की बहस में उलझा हुआ था, उस समय एक भारत बंद का भी आयोजन भी चल रहा था। देश के तमाम मजदूर संघों ने इसका आयोजन किया था। सिर्फ भाजपा से भारतीय मजदूर संघ इसमें शामिल नहीं था, बाकी देश के तकरीबन सभी मजदूर संघ इसमें शामिल थे। इस बंद का आयोजन केंद्र सरकार की उन नीतियों के खिलाफ किया गया था, जिसे ये संगठन मजदूर विरोधी मानते हैं। बंद के आयोजकों की तरफ से जो दावा किया गया है, उसके हिसाब से यह बंद गोवा, त्रिपुरा, केरल, ओडिशा, मणिपुर, मेघालय वगैरह में पूरी तरह सफल रहा। यह दावा ही बताता है कि देश के बाकी हिस्सों में यह उतना कामयाब नहीं रहा। इस आयोजन में बैंकों की ट्रेड यूनियनें भी शामिल थीं, वहां से आने वाली खबरें यह जरूर बताती हैं कि बंद की वजह से बैंकों का कामकाज काफी प्रभावित हुआ। सरकार का दावा यही है कि बैंकिंग पर मामूली असर ही पड़ा। चर्चा में बंद के न रहने का कारण आरक्षण पर देश में चल रही बहस नहीं थी, अगर यह बहस न होती, तब भी बंद की इससे ज्यादा कामयाबी संदिग्ध ही थी। यह बात ताजा बंद की ही नहीं है, पिछले न जाने कितने बंद आयोजनों का यही हश्र हुआ है।
बीते एक दशक में देश का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ काफी तेजी से बदल गया है। लेकिन इस दौरान हमारी कई संस्थाएं नहीं बदलीं, उनमें सबसे प्रमुख हैं देश के मजदूर संगठन। हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है  की तर्ज पर चलने वाले मजदूर संगठनों की दिक्कत यह है कि उदारीकरण के बाद देश की फिजां जिस तरह बदल गई है, उसे वे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सके हैं। जिसे वे जोर-जुल्म कहते हैं, वह तो पूरी तरह बदल गया है, लेकिन उनके संघर्ष का तरीका बिल्कुल ही नहीं बदला। बल्कि उनके संघर्ष के कई तरीके तो नए दौर में बिल्कुल निरर्थक हो गए हैं। उदाहरण के लिए, बैंकिंग क्षेत्र को ही लें। एक दौर था, जब बैंकों में हड़ताल का सीधा असर कई बाजारों के कामकाज पर पड़ता था। शेयर बाजारों की सक्रियता तक में नरमी आ जाती थी। अब बैंकिंग का ज्यादातर कामकाज ऑनलाइन हो गया है, जिसे चौबीसों घंटे चलने वाले सर्वर दिन-रात निपटाते रहते हैं। बहुत से कामों के लिए लोगों को बैंक की शाखाओं में जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसलिए कई मामलों में अब बैंकों की हड़ताल निरर्थक हो गई है। अब अगर बैंकों के ज्यादातार कर्मचारी भी हड़ताल पर चले जाएं, तब भी वह आंशिक रूप से सफल होने को अभिशप्त होगी।
मजूदर संगठन औद्योगिक क्रांति के बाद के समाजों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। कई बार कर्मचारियों को उनके अधिकार दिलाने में इन संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। लेकिन पिछले कुछ समय में हमारी दुनिया काफी बदल गई है और इसके साथ ही वह मध्यवर्ग भी बदल गया है, जो कभी श्रमिक संगठनों का सबसे बड़ा आधार होता था। आज का मध्यवर्ग यह समझता है कि अंतिम रूप से उसका फायदा उत्पादकता और विकास दर बढ़ने से ही होगा, उन हड़तालों से नहीं, जो उत्पादकता कम करने को बात मनवाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। यह बंद का नहीं, नए तरीकों पर सोचने का समय है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 10 january