Editorial Hindustan Column for 1 may - बगदादी का वीडियो DA Image

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बगदादी का वीडियो

 

श्रीलंका की भयावह आतंकी वारदात के ठीक आठ दिन बाद आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के सबसे बडे़ नेता अबू बकर अल बगदादी का जो वीडियो जारी हुआ है, वह जितना डराता है, उससे कहीं ज्यादा परेशान करता है। जाहिर है, वीडियो में बगदादी ने न सिर्फ श्रीलंका के हमलों को जायज ठहराया है, बल्कि और जो कुछ भी कहा है, उसका कुलजमा आशय यही है कि ऐसे हमले अभी और जारी रहेंगे। आतंकवादी संगठनों के ऐसे प्रचार वीडियो हमेशा ही कुछ अनसुलझे सवाल खडे़ कर देते हैं, यही हाल इस वीडियो का भी है। इसके पहले हमारे पास बगदादी की एक ही तस्वीर थी, वह भी एक वीडियो के रूप में। यह 2014 का उस समय का वीडियो था, जब बगदादी ने इराक के मोसुल की अल-नूरी मस्जिद से खिलाफत कायम करने की घोषणा की थी। इस बीच उसकी आवाज वाले कई संदेश जरूर सामने आए, पर उनकी प्रामाणिकता हमेशा से संदिग्ध रही। पांच साल बाद पहली बार उसका वीडियो संदेश फिर सामने आया है। पिछली बार जिस बगदादी का वीडियो आया था, वह एक पतला-दुबला शख्स था, इस बार के वीडियो में एक भारी शरीर वाला शख्स क्लाश्निकोव के पास पालथी मारे बैठा है। दोनों की शक्लों में कई समानताएं हैं, तो कई अंतर भी हैं, इसलिए यह सवाल भी उठाया जा सकता है कि जिस शख्स का वीडियो आया है, वह असल में बगदादी है भी या नहीं।
हालांकि कई तरह से यह सवाल अपने आप में बहुत महत्व नहीं रखता है। अभी कुछ समय पहले ही सीरिया और इराक के एक बहुत बडे़ क्षेत्र को इस्लामिक स्टेट के कब्जे से मुक्त कराने के बाद अमेरिका ने न सिर्फ खिलाफत के खत्म होने की घोषणा कर दी थी, बल्कि यह एलान भी कर दिया था कि इस्लामिक स्टेट भी अंतिम सांसें ले रहा है। अब जो नया वीडियो संदेश आया है, तो विश्लेषक यह कह रहे हैं कि खिलाफत भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन इस्लामिक स्टेट अब भी जिंदा है। वैसे इस नतीजे पर पहुंचने के लिए किसी वीडियो की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी, श्रीलंका जैसी वारदात चीख-चीखकर कह रही हैं कि एक विध्वंसात्मक विचारधारा के रूप में इस्लामिक स्टेट का खतरा अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है।
इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिका व उसके सहयोगियों और रूस व उसके सहयोगियों ने अपने-अपने तरीके से जो लड़ाई लड़ी, वह इस आतंकी संगठन की ताकत के खिलाफ उनकी लड़ाई थी, जो उन्होंने काफी हद तक जीत भी ली। लेकिन एक उससे कहीं ज्यादा जरूरी लड़ाई थी इस्लामिक स्टेट की विचारधारा के खिलाफ, जो किसी ने कहीं लड़ी ही नहीं। इस संगठन की ताकत एक सीमित क्षेत्र में थी, लेकिन विचारधारा का विस्तार कहीं ज्यादा बड़ा है, जो पूरी दुनिया को अपने लपेटे में लेना चाहता है। श्रीलंका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह लड़ाई ताकत की लड़ाई से कहीं ज्यादा जरूरी है, और शायद कहीं ज्यादा जटिल भी है, जिसे कहीं भी कोई भी लड़ता नहीं दिख रहा। बात सिर्फ इस्लामिक स्टेट की नहीं है, पिछले डेढ़-दो दशक में हमें पूरी दुनिया में कई तरह की कट्टरताओं का उभार दिखा है। हम इन्हें खत्म करने का कोई तरीका नहीं निकाल सके और न ही कोई ऐसा संकल्प पैदा कर सके, जो जनमानस पर असर रखता हो।
 

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