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हार के बाद

 

गठबंधन आखिर टूट गया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनाव की हार के दस दिन बीतने के साथ ही अपने रास्ते अलग कर लिए। सोमवार को बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसके संकेत दिए थे और मंगलवार को इसकी विधिवत घोषणा भी कर दी। हार का कसैलापन दोनों ही दल महसूस कर रहे हैं, यह मायावती की प्रेस कांफ्रेन्स से भी जाहिर हो गया और सपा प्रमुख अखिलेश यादव की उस पर प्रतिक्रिया से भी। मायावती जब प्रेस कांफ्रेन्स के लिए आईं, तो उनके पास कहने को बहुत कुछ था। उन्होंने कहा कि हाथी और साइकिल का एक साथ आगे बढ़ना अब मुश्किल होता जा रहा है। उनका आरोप था कि अखिलेश अपने यादव वोटरों को यह समझा पाने में विफल रहे कि उन्हें बसपा उम्मीदवारों को वोट देने चाहिए। वैसे उत्तर प्रदेश में पूरे चुनाव के दौरान सबसे गरम मुद्दा यही था कि क्या सपा और बसपा अपने वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर करा पाएंगी? हालांकि नतीजों के विश्लेषण में यही कहा गया कि वोट ट्रांसफर हुए हैं, इसीलिए बसपा कुछ सीटें जीत पाईं। वरना पिछले आम चुनाव में तो उत्तर प्रदेश से उसका सफाया ही हो गया था। भले ही उसके मत प्रतिशत पर कोई असर न पड़ा हो, लेकिन उसे एक भी सीट नहीं मिल पाई थी। वैसे मायावती के इस रुख को हमें उनकी पिछले एक-दो दिन की उस सक्रियता से भी जोड़कर देखना चाहिए, जिसमें उन्होंने अपने दल की अन्य राज्यों की इकाइयों में भी फेरबदल किए हैं।
कुछ गठबंधन भले ही लंबे चल जाते हों, लेकिन राजनीति में यही माना जाता है कि एक चुनाव सीजन भर का रिश्ता होते हैं। पिछले आम चुनाव से पहले जब सपा और बसपा आपस में मिली थीं, तो यह तभी साफ था कि रिश्ता लंबा चलने वाला नहीं है। यह माना गया था कि हार या जीत, दोनों ही स्थितियों में यह गठजोड़ टूटेगा ही। जीतते तो शायद कुछ दिन और चल जाते, लेकिन हार के बाद इसे टूटना ही था। यह भी माना जाता है कि दोनों दलों के अपने-अपने जनाधार उन्हें ऐसे विपरीत ध्रुव बनाते हैं, जिनका लंबे समय तक साथ रहना शायद संभव नहीं। पर पूरे चुनाव के दौरान कई कारणों से यह गठजोड़ चर्चा में बना रहा। एक तो इसलिए कि पिछले सारे गणित यह बता रहे थे कि दोनों दलों का साथ आना उत्तर प्रदेश में समीकरण बदल सकता है। यह बात अलग है कि इस बार जो हिसाब-किताब हुआ, उसमें पुराने पहाड़े बहुत काम नहीं आए। दूसरा इसलिए भी कि कई ऐतिहासिक कारणों से यह माना जाने लगा था कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा एक साथ नहीं आ सकतीं। वैसे मायावती ने मंगलवार को लगे हाथ यह भी बता दिया कि रास्ते अलग करने का अर्थ यह नहीं है कि जरूरत पड़ने पर दोनों फिर साथ नहीं आ सकते।
कुछ उप-चुनावों को छोड़ दें, तो अभी उत्तर प्रदेश में ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा कि दोनों के साथ-साथ या अलग-अलग रहने का कोई खास अर्थ हो। दोनों दलों के लिए अभी सबसे जरूरी अपने आधार को मजबूत करना है और उसके लिए साथ रहना कोई जरूरी नहीं है। जहां तक आधार की बात है, तो दोनों दलों को इस बार लगा झटका काफी बड़ा है। उत्तर प्रदेश में दोनों दलों की नींव को सबसे मजबूत माना जाता था, लेकिन इस बार दोनों की ही नींव बुरी तरह हिल गई है। इसलिए अब जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं।

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  • Web Title:editorial hindustan column 5 june