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ऐतिहासिक जीत

 

जो जीता वही सिकंदर की कहावत पुरानी है, लेकिन कम से कम वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लागू नहीं होती। वह इसलिए सिकंदर नहीं हैं कि जीत गए, बल्कि वह इस बार की चुनावी लड़ाई के अकेले सिकंदर थे, इसलिए उनका जीतना तो शायद लड़ाई शुरू होने से पहले ही तय था। उनका खुद का पराक्रम ही नहीं, उनकी अश्वरोहिणी सेनाएं भी मुख्य विरोधियों और क्षत्रपों से कहीं बड़ी थीं। नतीजा यही कहता है कि उनकी रणनीति ने विरोधियों की हर चाल को इस कदर नाकाम कर दिया कि वे हारे ही नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में बौने भी साबित हुए। बेशक यह चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए कोई अश्वमेघ यज्ञ नहीं था, लेकिन वह दिग्विजयी साबित हुए हैं। चुनाव के बाद भारत का जो नक्शा उभरा है, वह काफी दिलचस्प है। तमाम टीवी चैनलों में इसके नतीजों को जिस तरह के ग्राफिक्स के साथ दिखाया जा रहा है, उसमें हर तरफ केसरिया रंग बिखरा दिखाई देता है। पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण तकरीबन सभी जगह। यहां तक कि उस पूर्वोत्तर भारत में भी, जहां भारतीय जनता पार्टी की पहुंच के बारे में कुछ साल पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था। और तो और, जिन कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव में पिछले पांच साल में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, उनमें भी ज्यादातर में भाजपा ने अपना परचम फिर फहराया है। 
पांच साल पहले जब भाजपा ने आम चुनाव जीता था, तब नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कौशल को भले ही इसका श्रेय मिला हो, लेकिन उस श्रेय में कुछ और बातें भी कही जा रही थीं। तब उनकी जीत के साथ ही एक और महत्वपूर्ण चीज थी, यूपीए के दस साल के शासन का अंत। तब नरेंद्र मोदी, भाजपा और एनडीए की सफलता के साथ ही गिनाने के लिए यूपीए की असफलताएं भी थीं। इस बार ऐसा कुछ नहीं है, और यहां तक कि खुद भाजपा और एनडीए के तकरीबन सभी घटक नरेंद्र मोदी को माथे पर सजा रहे हैं। एक तरह से इंदिरा गांधी के शासनकाल के बाद यह पहला मौका भी है कि किसी दल ने पूरे बहुमत के साथ पांच साल सरकार चलाई और उसके बाद चुनाव में पार्टी को पहले से ज्यादा अच्छी स्थिति में पहुंचा दिया। कुछ हद तक यह श्रेय मनमोहन सिंह को भी दिया जा सकता है, लेकिन उनकी पार्टी पहली बार भी अल्पमत में थी और दूसरी बार भी उसकी स्थिति भले ही सुधरी, मगर वह रही अल्पमत में ही। फिर यूपीए-2 की मनमोहन सिंह वाली जीत में वैभव की वह विशालता नहीं थी, जो इस बार नरेंद्र मोदी की जीत में है। अभी अंतिम प्रतिशत नहीं आया है, लेकिन जो संकेत उभर रहे हैं, वे बताते हैं कि इस बार बहुत पुराने रिकॉर्ड भी टूट रहे हैं।
हर जीत अपने साथ चुनौतियां भी लाती है, जाहिर है इस बार नरेंद्र मोदी की चुनौतियां पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ जाएंगी। एक तात्कालिक चुनौती तो यह है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान चले चुनाव अभियान ने देश के राजनीतिक विमर्श में काफी कड़वाहट घोली है, इस कड़वाहट से तुरंत मुक्ति पाना अब बहुत जरूरी है। बेशक यह सभी दलों का दायित्व है, पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के कंधों पर ही होगी। इसके अलावा आर्थिक मोर्चों पर बहुत सारी नई-पुरानी चुनौतियां खड़ी हैं। मगर इस पर चर्चा बाद में होगी, फिलहाल लोकतंत्र के पर्व की उल्लास भरी समाप्ति पर यह जश्न का समय है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column 24 may