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एग्जिट पोल और बाजार

 

कहा जाता है कि शेयर बाजार की चाल तथ्यों से नहीं, उम्मीदों से ऊर्जा पाती है। यहां कई बार खबरें नहीं, अटकलें ज्यादा बड़ा अर्थ रखती हैं। कई बार बाजार सिर्फ इसलिए बल्लियों उछल पड़ता है कि जितनी उम्मीद थी, उससे मामूली सा ही कुछ ज्यादा अच्छा हो गया। या इसके उलट कई बार बाजार सिर्फ इसलिए गोता लगा जाता है कि जितनी उम्मीद थी, उससे कुछ  मामूली सा कम अच्छा हो गया। सोमवार को देश के शेयर बाजारों में जो दिखा, उसका कारण सिर्फ इतना था कि जितनी उम्मीद थी, उससे कुछ ज्यादा की उम्मीद बंध गई। रविवार को जब एग्जिट पोल के नतीजे आए, तो लगभग उसी समय तय हो गया कि अगले दिन बाजार आतिशबाजी का गवाह बनने वाला है। इसलिए सुबह जब बाजार में कारोबार शुरू हुआ, तभी से धूम-धड़ाके की खबरें आनी शुरू हो गईं। बंबई शेयर बाजार का सबसे महत्वपूर्ण 30 शेयरों वाला संवेदनशील सूचकांक जब शाम को कारोबार की समाप्ति पर बंद हुआ, तो उसने 1,422 अंकों की छलांग लगा ली थी। उसके बाद के सभी सूचकांकों ने भी दिन भर में यही रुझान दिखाया। हालांकि सबसे बड़ी छलांग उन फंडों ने लगाई, जिनकी बाजार में खरीद-फरोख्त होती है। ऐसे फंड की गति बताने वाला बीएससी भारत 22 सूचकांक कुछ ही घंटे के भीतर 4.7 प्रतिशत तक उछल गया। जो बताता है कि नई सरकार के आने के बाद सबसे ज्यादा उम्मीद म्यूचुअल फंड से ही बांधी जा रही है। यह उछाल उस समय दिखाई पड़ी है, जब विदेशी काफी हद तक अपना निवेश निकाल चुके हैं, जिसके कारण से शेयर बाजार ने पिछले कुछ सप्ताह में काफी झटके झेले हैं।
एग्जिट पोल के नतीजों से शेयर बाजार ने सिर्फ छलांग ही नहीं लगाई, बहुत सारे रिकॉर्ड भी तोडे़ हैं। मसलन, उसने एक दिन में बुलंदी छूने का दस साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यानी इसका एक अर्थ यह हुआ कि पांच साल पहले जब नरेंद्र मोदी ने सरकार बनाई थी, तब भी शेयर बाजार उतना नहीं उछला था, जितना वह उन राजनीतिक अटकलों से उछल गया, जिनको एग्जिट पोल कहा जाता है। यह सच है कि पिछले कुछ दिनों से आम चुनाव के माहौल में किसी भी दल या गठजोड़ को स्पष्ट बहुमत न मिलने की अटकलें तैर रही थीं, एग्जिट पोल ने ऐसी ही अटकलों पर विराम लगा दिया है। शेयर बाजार के लिए यह राहत बहुत बड़ी है और बाजार की राहत अंतत: शेयर कीमतों के बढ़ने में ही अभिव्यक्त होती है। सोमवार को सिर्फ यही हुआ।
ऐसा भी नहीं है कि पिछले कुछ समय में देश के सामने जो आर्थिक चुनौतियां खड़ी हुई थीं, वे एकाएक खत्म हो गई हैं। बाजार में मांग बहुत तेजी से कम हो रही है और उद्योगों को तत्काल कोई बड़ी उम्मीद नजर नहीं आ रही। जब तक मांग की पुरानी गति बहाल नहीं होती, बाजार के पास खुश होने का कोई ठोस कारण नहीं रहेगा और उसे यदा-कदा की अटकलों से ही काम चलाना होगा। इसी तरह, न तो देश कृषि संकट का कोई स्थाई हल खोज पाया है और न ही किसानों व ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान की राह ही किसी को सूझ रही है। बेरोजगारी की पहेली अभी कायम है। ऐसे में, अगर शेयर बाजार एग्जिट पोल के नतीजों पर दांव लगा रहा है, तो इससे हम समझ सकते हैं कि केंद्र की अगली सरकार की चुनौतियां क्या और कितनी कठिन होने वाली हैं।

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  • Web Title:editorial hindustan column 21 may