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सातवें दौर के बाद

 


अब बस नतीजों का इंतजार है। सातवें चरण का मतदान पूरा होने के साथ ही अब सारे उम्मीदवारों, सभी दलों और दरअसल पूरे देश का भविष्य इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और वीवीपैट की पर्चियों में बंद हो चुका है। देश के 17वें आम चुनाव की घोषणा 10 मार्च को हुई थी। तब से अब तक देश को जिन लहरों, हवाओं और तनावों से गुजरना पड़ा है, वह अपने आप में अभूतपूर्व है। इस दौरान देश का राजनीतिक विमर्श कई बार जिस निचले स्तर पर पहुंचता दिखा, वह अपने आप में चिंता का विषय है। ऐसा नहीं है कि चुनाव के दौरान आरोप-प्रत्यारोप और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशें पहले नहीं होती थीं, लेकिन इस बार के चुनावी हंगामे ने न इतिहास को बख्शा और न पूर्वजों को। विरोधियों पर कीचड़ उछालने के प्रयास में उन स्तंभों को भी घेरे में लेने की कोशिश की गई, जिनका जनमानस आज भी सम्मान करता है और जिन पर हमारा वर्तमान टिका है। फिर पश्चिम बंगाल में जिस तरह की हिंसा हुई, वह बताती है कि लोकतांत्रिक लड़ाई की हमारी परंपराओं में सब कुछ अच्छा नहीं है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, दुनिया में कहीं भी इस तरह करोड़ों लोग घरों से निकलकर, लाइनों में लगकर अपनी किस्मत का फैसला करने नहीं जाते, जैसे वे भारत में जाते हैं। अगर यह हमारे लोकतंत्र की ताकत है, तो पिछले दो महीनों से ज्यादा समय में जो हुआ, उसे क्यों न हमारी व्यवस्था का ऐसा दोष माना जाए, जिसे अविलंब सुधारना जरूरी है।
लोकतंत्र कुछ आम सहमतियों पर टिका होता है, ये आम सहमतियां न सिर्फ लोकतंत्र को एक संतुलन देती हैं, बल्कि वे सीमा-रेखा भी खींच देती हैं, जिनके बीच रहकर प्रतिद्वंद्वियों को एक-दूसरे से लड़ना होता है। ऊपर जितनी भी गड़बड़ियां गिनाई गईं, उनकी एक वजह यह भी रही कि इस बार कई मौकों पर या शायद बार-बार ऐसी कई आम सहमतियां टूटती दिखीं। विदेश नीति और सेना वगैरह को इस देश ने हमेशा चुनावी लड़ाई से दूर रखा है, लेकिन इस बार इसे भी चुनाव मैदान में खींचा जाता रहा। चुनाव प्रक्रिया को लेकर जितने शक-शुबहे इस बार उठे उतने शायद पहले कभी नहीं उठे हों। आयोग को देश की ऐसी सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित संस्था माना जाता है, जिस पर ज्यादा संदेह नहीं उठते रहे हैं। आयोग की कुछ उपलब्धियां ऐसी हैं कि पश्चिमी देशों की चुनाव व्यवस्थाएं भी उससे ईष्र्या कर सकती हैं। अगर यह सिलसिला टूट रहा है, तो लोकतंत्र के लिए एक बुरी खबर है। रेफरी पर ही सवाल उठते रहे, तो प्रतियोगिता कहीं न कहीं अर्थ खोने लगेगी।
चुनाव बाद की सबसे जरूरी चीज है कि आम सहमतियों की ओर फिर से लौटा जाए। यह ऐसी चीज है, जिसे दलगत राजनीति से दूर रखना होगा। चुनाव प्रक्रिया और मतगणना ऐसी चीज है, जिस पर सभी दलों और निर्वाचन आयोग को मिलकर सहमतियां बनानी होंगी, ताकि बीच चुनाव में इस पर सवाल खडे़ न हों। यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है। भारतीय लोकतंत्र को धन-बल के प्रभाव से मुक्त कराने की कोशिशें न जाने कब से जारी हैं और यह चुनाव बताता है कि हम इसमें पूरी तरह असफल रहे हैं। लेकिन इस बीच बहुत सारी नई बुराइयां हमने लोकतंत्र के साथ जोड़ ली हैं। भारतीय लोकतंत्र को ऐसी प्रवृत्तियों से मुक्त कराने की जरूरत लगातार बढ़ती जा रही है।

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  • Web Title:editorial hindustan column 20 may