DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चिंताओं का आसमान

 

देश के माथे पर पड़ी चिंता की रेखाएं अब गहराने लगी हैं। यह ठीक है कि अभी पूरी तरह हताश होने का मौका नहीं आया है, लेकिन मानसून की जो प्रगति है, वह आशंकाएं तो पैदा कर ही रही है। मानसून ने पहले ही आठ दिन की देरी से केरल के तट पर दस्तक दी थी, लेकिन बाद में वायु चक्रवात के कारण उसकी गति पहले थमी और फिर धीमी हो गई। जून का मध्य आते-आते मानसून के जो बादल आधे से ज्यादा भारत पर अच्छादित हो जाते थे, वे अभी तक दक्षिणी राज्यों को ही पूरी तरह भिगो नहीं पाए हैं। इसकी वजह से तमाम दूसरे संकटों के साथ ही तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में जल संकट खड़ा हो गया है। वैसे मानसून की देरी का यह अर्थ कभी नहीं होता कि वह खराब ही रहेगा। ऐसा कई बार हुआ है, जब मानसून काफी देरी से पहुंचा, लेकिन लेकिन पूरे देश में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश हुई। इस कारण से भी अभी उम्मीद छोड़ने का वक्त नहीं आया है, लेकिन इस साल क्योंकि पहले से ही कुछ लोग मानसून के कमजोर रहने की आशंकाएं व्यक्त कर रहे थे, इसलिए अभी तक जो देरी हुई है, उसने चिंता बढ़ा दी है। हालांकि मौसम विभाग ने मानसून के सामान्य रहने की भविष्यवाणी की थी और वह अभी भी इसी पर टिका हुआ है। 
यह हो सकता है कि मानसून देर से आए, लेकिन दुरुस्त बरसे। इसके बावजूद इसकी देरी चिंताओं को बढ़ाने के अलावा भी कई परेशानियां पैदा करती है और वे परेशानियां शुरू होती दिख रही हैं। देश के एक बड़े हिस्से में इस वक्त तक कपास, सोयाबीन और दलहन की बुआई हो जाती है। हालांकि कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़े यही बता रहे हैं कि इनकी बुआई में अभी तक नौ फीसदी की कमी आई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली ज्यादातर खबरें यही कह रही हैं कि किसानों ने खरीफ की इन फसलों की बुआई फिलहाल दो सप्ताह के लिए टाल दी है। किसान इस समय तक धान की फसल की तैयारियां शुरू करने लगते हैं, ताकि जब उनके खेत बारिश के पानी से लबालब हो जाएं, तो वे तुरंत ही इसकी रोपाई शुरू कर सकें। इससे एक आशंका यह भी उभरने लगी है कि अगर मामूली सा भी फर्क रहा, तो खरीफ की उपज में कमी आ सकती है। वैसे ऐसी कमी हुई भी, तो उससे कोई खाद्य संकट खड़ा होने वाला नहीं है, लेकिन सबसे पहले यह उन किसानों के लिए एक बुरी खबर बनेगा, जो खेती के लगातार बढ़ रहे घाटे से त्रस्त हैं और देश भर की सरकारें इसे मुनाफे का काम बनाने के लिए अपनी-अपनी तरह से जूझ रही हैं। फिर अगर ऐसा हुआ, तो खाद्य वस्तुओं की महंगाई भी बढ़ सकती है, जिसका असर कई तरह से पूरी अर्थव्यवस्था पर पडे़गा। ग्रामीण बाजारों में मांग में जो कमी आएगी, वह भी एक बड़ा खतरा है।
गांव ही नहीं, शहरों के बाजारों में मांग की कमी तो पहले ही प्रवेश कर चुकी है और मंदी की आशंकाएं गहराने लगी हैं। मानसून की कमी इस पूरे संकट को गहरा सकती है। हालांकि बारिश इस बार सामान्य से कम होगी, इसे अभी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, लेकिन चिंता का एक बड़ा कारण यह है कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए कार्ययोजना कहीं नहीं दिख रही, जबकि ग्लोबल वार्मिंग के मौजूदा दौर में आपात कार्ययोजनाओं का होना बहुत जरूरी है, मानसून चाहे कम हो या ज्यादा। 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Editorial Hindustan Column 20 june