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चुनाव में उपद्रव

 

पूरे देश में मतदान के छह चरणों में चुनाव प्रचार का कमोबेश शांतिपूर्ण रहना जितना प्रशंसनीय है, उतना ही निंदनीय है सातवें चरण के प्रचार में कोलकाता में हुई झड़प और हिंसा। दोषी कौन है, इस पर विमर्श और राजनीति भी होती रहेगी, लेकिन गंभीर चिंता की बात यह है कि एक पार्टी अध्यक्ष के रोड शो को उपद्रव व पथराव के कारण बीच में रोकना पड़ा। शायद इस चुनाव में यह पहला रोड शो है, जिसे हिंसा की वजह से रोकना पड़ा है। केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का यह कहना तो बेहद चिंताजनक है कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान नहीं होते, तो वह जिंदा नहीं लौटते। संभव है कि इस आरोप के पीछे भाजपा की राजनीति हो, लेकिन ममता बनर्जी द्वारा अमित शाह को सीधे गुंडा कह देने की राजनीति का बचाव कैसे किया जाए? कोलकाता की सड़कों पर मात्र वोट के लिए धार्मिक प्रतीकों और धार्मिक जयकारों का इस्तेमाल नैतिक रूप से कितना सही है और क्या उससे कोई भड़क सकता है, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन इसी आधार पर उस रोड शो पर पथराव को कैसे जायज ठहराया जाए? आप अपने अच्छे व्यवहार और विचार से वोट जुटाने के प्रयास करें, आप अपने घोषणापत्र का इस्तेमाल करके वोट जुटाएं। ज्यादातर राज्यों में राजनीतिक पार्टियों और प्रत्याशियों ने यही किया है। अगर बंगाल कुछ अलग ही ढंग में दिख रहा है, तो उसे कानून-व्यवस्था के तहत रखना राज्य सरकार और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। राज्य में हिंसक तत्व यदि सक्रिय हो गए हैं, तो उन्हें पकड़ना और हिंसा रोकना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। 
अपनी भद्रता के लिए मशहूर पश्चिम बंगाल में कुछ नेताओं-कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव में उचित व्यवहार प्रदर्शित नहीं किया है। वैसे भी काडर आधारित राजनीतिक हिंसा की परंपरा पश्चिम बंगाल में रही है, भावनाओं या आवेश की राजनीति वहां होती रही है। पश्चिम बंगाल में करीब 34 वर्ष के वाम शासन के बाद उम्मीद की गई थी कि ममता बनर्जी राजनीतिक संस्कृति को बदल देंगी, लेकिन शायद ऐसा नहीं हो पाया है। यह राजनीतिक समाजशास्त्रियों के लिए विचार का विषय है कि पश्चिम बंगाल में क्या भावनाएं, आवेश और काडर, तीनों ही एक सत्ताधारी से दूसरे सत्ताधारी तक पहुंच गए हैं? ऐसे में, विडंबना देखिए, देश के एक आदर्श शालीन समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर को भी वोट की राजनीति में घसीट लिया गया है। भाजपा और तृणमूल समर्थकों के बीच संघर्ष के दौरान विद्यासागर की प्रतिमा टूटने की घटना हुई है। लेकिन यह राजनीति का शर्मनाक और लापरवाही भरा पहलू है कि उपद्रवी कार्यकर्ता बचकर निकल जाएंगे और नेता वोट लेकर विद्यासागर को भूल जाएंगे? 
समय आ गया है, जब देश में ऐसी काडर आधारित राजनीतिक हिंसा, बंद, हड़ताल, रैली, रोड शो, सभा इत्यादि की स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जाए। राजनीतिक हिंसा या चुनावी हिंसा को रोकने के लिए स्पष्ट नियम-कायदे बनें। जिस पार्टी का काडर हिंसा या तोड़फोड़ को अंजाम दे, उस पार्टी पर दंडात्मक कार्रवाई हो। फिर भी अगर कोई पार्टी न सुधरे, तो उसकी मान्यता रद्द हो। देश को सभ्य बनाए रखना है, तो असभ्यों को पालने वाली पार्टियों की कतई आवश्यकता नहीं है। 

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column 16 may