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माफ करना याक

 

सिक्किम की पर्वतीय ऊंचाइयों पर बर्फ से घिरकर सैकड़ों याक की मौत बहुत दुखद और शर्मनाक है। दिसंबर से अप्रैल तक लगभग पांच महीने तक उत्तरी सिक्किम की मुगुथांग और युमथांग घाटियों में एक-एक कर केवल याक ही नहीं मरे होंगे, उनके साथ मनुष्य और उसकी कथित मानवता पर उनका विश्वास भी तिनका-तिनका मरा होगा। महात्मा गांधी की वह प्रसिद्ध टिप्पणी फिर ताजा हो गई है और हमें चिढ़ा रही है। महात्मा ने कहा था, किसी देश की महानता उस देश द्वारा उसके जानवरों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से परखी जाएगी। अब दोष किसको दिया जाए? क्या उन आम लोगों को, जिन्होंने अपने पालतू याक को भूख से तिल-तिल मरने को छोड़ दिया या उस सरकार को, जिसने याक की स्थिति का पता लगाने और उन तक घास पहुंचाने के लिए कुछ भी खास नहीं किया? अब पहाड़ों पर जब बर्फ पिघली है, तो पता चला है कि दोनों घाटियों में सैकड़ों याक भूख की भेंट चढ़ गए। बर्फबारी के मौसम में याक को ऊंचे पहाड़ों पर ही छोड़कर स्वयं नीचे सुरक्षित शरण लेने की कथित मानवीय परंपरा इतनी भारी पड़ेगी, शायद किसी ने नहीं सोचा होगा। मानवीय सोच का यह अभाव जाहिर करता है कि हम अपने पशुओं के बारे में कितना कम सोचते हैं। हिमालय के पूरे क्षेत्र में याक बहुपयोगी है। गाय-भैंस की मिलती-जुलती देहाकृति वाला यह जीव दूध, मांस तो देता ही है, गाड़ी भी खींचता है, हल भी जोतता है और सीधे सवारी भी कराता है। इसका उपयोग खेल में भी होता है। कभी यह जीव जंगली था, लेकिन वह जल्दी ही घरेलू हो गया, लेकिन हम कथित घरेलू मनुष्यों पर यह जीव आज सवालिया निशान लगा गया है। 
प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज आरवेल ने बहुत पहले यह संकेत कर दिया था, इंसान और पशु के हित एक समान हैं, इंसान की संपन्नता में ही पशुओं की संपन्नता है। ऐसे में, क्या हमें करीब 500 याक की विपन्न-अकाल मौत के आईने में अपनी संपन्नता को परखना नहीं चाहिए? वैसे तो हर साल याक बर्फबारी में घिरते थे। ठंड हर साल 15 से 20 याक अपने साथ ले जाती थी, लेकिन इस बार बताते हैं कि खूब मोटी बर्फ पड़ी है। ऐसे हालात में खुले में दिन-रात खड़े, बर्फ के बीच घास के तिनके खोजने में नाकाम भूखे याक तक मदद पहुंचाना क्या जरूरी नहीं था? याक मालिक और स्थानीय प्रशासन की जितनी निंदा हो, कम होगी। आश्चर्य है, सुरक्षा बलों ने भी याक प्रजाति द्वारा की गई सेवाओं को भुला दिया? ऊंचे दुर्गम पहाड़ों पर जवानों और उनके साजो-सामान पहुंचाने का माद्दा जिस याक जाति में है, उसे ही बर्फ के बीच मरने छोड़ दिया गया? 
अफसोस, सिक्किम का प्रशासन अभी भी तार्किकता या सुशासन का प्रमाण नहीं दे पा रहा है। मारे गए याक 25 परिवारों की संपत्ति थे। प्रशासन प्रति परिवार 90,000 रुपये से ज्यादा मुआवजा नहीं देगा, तो क्या केवल 75 याक के लिए ही मुआवजा बंटेगा? जिस लापरवाह प्रशासन पर दंड लगना चाहिए था, वह कम से कम मुआवजा तो ठीक से बांटे, ताकि यह पता चल सके कि इतने याक गंवाकर उसने कुछ सीखा है। केवल सिक्किम प्रशासन ही नहीं, हम सभी को इस दुखद त्रासदी से व्यापक सबक लेना चाहिए और पशुओं के प्रति अपने समग्र विचार-व्यवहार में सुधार लाना चाहिए।

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  • Web Title:editorial hindustan column 14 may