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अविरल नहीं कोई नदी

 

कहा जाता है कि कोई भी नदी तभी संपूर्ण बनती है, जब वह अविरल बहती हो। यानी उसके कुदरती बहाव में कोई बाधा न आए, उस पर कोई बांध न बने, उसका पानी किसी जलाशय में न जमा किया जाए, नहरें बना कर उसका पानी निकाला न जाए, जल परिवहन के लिए उसमें चैनल न बनाए जाएं और उसके बीच में ऐसी संरचनाएं न खड़ी की जाएं, जो उसकी धारा को रोकती हों। दुर्भाग्य से ऐसा बहुत कम होता है। विश्व के 34 नदी विशेषज्ञों ने पिछले दिनों दुनिया की उन सारी बड़ी नदियों का अध्ययन किया, जिनकी लंबाई 1000 किलोमीटर से ज्यादा है। इसमें वे सारी नदियां हैं, जिन्हें न सिर्फ महान नदियों में गिना जाता है, बल्कि जिनके किनारों पर दुनिया की महान सभ्यताएं विकसित हुई हैं। जाहिर है कि इस फेहरिस्त में भारत की भी कई वे नदियां हैं, जिन्हें हम पवित्र मानकर उनकी पूजा करते हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि दुनिया की 37 प्रतिशत बड़ी नदियां अब अविरल नहीं हैं, उनके प्रवाह में किसी न किसी तरह की बाधा जरूर है। 37 प्रतिशत का यह आंकड़ा अगर आप को चौंका रहा है, तो यह भी जान लीजिए कि भारत की कोई भी बड़ी नदी ऐसी नहीं है, जो अविरल हो। इस अध्ययन में जिन 37 प्रतिशत नदियों का जिक्र है, उन पर तमाम दूसरी बाधाओं के अलावा 28 लाख बांध बने हुए हैं और हजारों बांध अभी निर्माण की प्रक्रिया में हैं।
नदी की अविरलता का खत्म होना कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। एक तो इससे नदी की वह भूमिका बाधित होती है, जो वह हमारी प्रकृति में निभाती है। इससे नदी का पूरा इको-सिस्टम आहत होता है। यह कई तरह के जलजीवों और नदी के आस-पास के पूरे क्षेत्र की जैव विविधता पर भी बुरा असर डालता है। भारत में देखें, तो महशीर जैसी कई तरह की महत्वपूर्ण मछलियां लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। यहां तक कि नदी के आस-पास रहने वाले और इस पर निर्भर लोगों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। अविरलता की बाधाएं ही हमें बाढ़ जैसी आपदाएं भी देती हैं। 
नदियों से नहरों को निकाला जाना और इन पर बांधों का बनना करीब डेढ़ सदी पहले शुरू हो गया था। पिछली सदी में तो यह काम काफी तेजी से हुआ। भारत में तो शायद ही कोई ऐसी नदी बची हो, जिस पर बांध न बना हो या जिससे नहर न निकाली गई हो। बड़ी नदियों को तो छोड़िए, तमाम छोटी-छोटी नदियों पर बांध बनाए जा चुके हैं या बनाए जा रहे हैं। यह भी सच है कि इन बांधों ने हमारी बिजली की जरूरतों को पूरा किया है और उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद की है, जिसे हम विकास कहते हैं। इन्हीं नदियों से निकाली गई नहरों ने कृषि के विस्तार और हरित क्रांति में यानी देश के लोगों का पेट भरने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। नदियों की अविरलता में बाधा की जो समस्याएं आज हमारे सामने हैं, उनके बारे में तब यह सोचा भी नहीं गया था, जब इन बाधों की योजनाएं बनी थीं। हम चाहें, तो इस स्थिति के लिए अपनी कुछ पिछली पीढ़ियों को कोस भी सकते हैं, पर इससे कोई हल नहीं निकलेगा। फिलहाल हमारे पास जो बांध हैं, जो नहरें हैं, वह हमारे आज का सच है और हमें इसी से आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना होगा। नदियों को भले ही हम फिर से अविरल न बना सकें, लेकिन उन्हें निर्मल बनाने का काम तो कर ही सकते हैं।
 

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column 13 may