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समाधान की ओर

अयोध्या भूमि विवाद को सुलझाने के लिए गठित तीन सदस्यीय पैनल को 15 अगस्त तक का समय देना तार्किक ही नहीं, व्यावहारिक भी है। स्वयं पैनल के निवेदन पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा निर्णय इस अति-विवादित समस्या के समाधान की दिशा में स्वागत योग्य प्रयास है। 8 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एफ एम कलीफुल्ला के नेतृत्व में तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल का गठन किया था। पैनल को यथोचित समाधान तक पहुंचने और अपनी रिपोर्ट जमा करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया था। यह समय विगत सप्ताह समाप्त हो चुका है और अब पैनल को  करीब 13 सप्ताह का अतिरिक्त समय दे दिया गया है। जहां यह देश 70 साल से इस विवाद को झेल रहा है, वहां और 13 सप्ताह की प्रतीक्षा ज्यादा मायने नहीं रखती। प्रश्न समय का नहीं, समाधान का है। वह समाधान, जिसमें सभी संबंधित पक्षों की सहमति समाहित हो। रामलला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड, यही तीन पक्ष हैं, जिनकी सहमति से अंतिम समाधान निकालना है। पूर्व जस्टिस कलीफुल्ला, धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर और प्रशिक्षित मध्यस्थ अधिवक्ता श्रीराम पंचू विगत आठ सप्ताह में समाधान की दिशा में जो काम कर चुके हैं, वह अब तक गोपनीय है, तो यह अनिवार्य भी है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सभी संबंधित पक्षों को पूर्ण गोपनीयता के लिए पाबंद कर रखा है, तो इसका सकारात्मक परिणाम हम इन दिनों देख रहे हैं। ध्यान दीजिए, आज चुनाव में बाबरी या मंदिर का मुद्दा प्रभावी नहीं है, किसी भी विघ्न-संतोषी या उपद्रवी तत्व के हाथ कुछ नहीं लग रहा है। 
शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में भी कुछ संबंधित पक्ष मध्यस्थता प्रयासों के बारे में जानना चाहते थे, लेकिन कोर्ट ने स्वयं भी गोपनीयता बरतने का यथोचित रुख अपनाया। लोगों की दृष्टि पैनल के भावी निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट पर है। राजनीति और धर्म क्षेत्र से कमोबेश निराशा के समय में अब सुप्रीम कोर्ट को ही आदर्श खड़ा करना है। अंतत: पैनल की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट को ही अंतिम फैसला लेना है। आज न चर्चित मध्यस्थ कुछ बोल रहे हैं और न संबंधित पक्षों ने कभी मुंह खोला है। यदि वाकई मध्यस्थता की यह अभूतपूर्व पहल भारत में सफल रही, तो तमाम कटु विवादों के समाधान के लिए हमें एक प्रक्रिया मिल जाएगी। हम अच्छी तरह जानते हैं कि सड़कों पर नारेबाजी, आपस में कटु बहस, सियासत, साजिश या खून-खराबे से ही विवादित मामले नहीं सुलझा करते। यह प्रयोग यदि सफल होने के लिए और समय भी मांगता है, तो देने में कोई हर्ज नहीं है। मध्यस्थ पैनल और सुप्रीम कोर्ट ने देश की उम्मीदों को बढ़ा दिया है। 
हालांकि लोकतंत्र में एक स्तर तक ही गोपनीयता बरती जा सकती है, लेकिन जब कोई सकारात्मक गोपनीयता अपने प्रयासों में सफल हो जाए, तो जरूरी है कि सबके लिए सबक बन जाए। निराशा भी हाथ लगे, तो मध्यस्थता के ऐसे प्रयोगों को छोड़ना नहीं चाहिए। यह सुखद संयोग ही है कि सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक प्रयास ऐसे समय में चल रहा है, जब देश महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मूल सिद्धांत- प्रेम, शांति और अहिंसा को व्यवहार में लाने के लिए भी ऐसे प्रयोग जरूरी हैं।

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  • Web Title:editorial hindustan column 11 may