DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

स्पर्धा से बेहाल

संचार के इस युग में तकरीबन सभी संचार कंपनियों की हालत खस्ता है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों- भारत संचार निगम लिमिटेड और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड पर जो बीत रही है, उसे इस बाजार की गति से अलग करके देखने की जरूरत है। इन दोनों कंपनियों की लगातार पतली होती हालत मार्च आते-आते इतनी खराब हो गई कि उनके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक के पैसे नहीं बचे। लगभग आधा महीना बीत चुका है और इन कंपनियों के ज्यादातर कर्मचारियों को अब तक फूटी कौड़ी भी नहीं मिली। बुधवार की शाम तक की खबरें बता रही हैं कि दोनों कंपनियों की इस कड़की को लेकर संचार मंत्रालय और वित्त मंत्रालय ने सक्रियता दिखाई है, इसलिए उम्मीद बन रही है कि होली के पहले इन दोनों कंपनियों के एक लाख 70 हजार से ज्यादा कर्मचारियों को उनका मासिक वेतन मिल जाएगा और शायद उनका त्योहार बदरंग होने से बच सकेगा।

एक खबर यह भी है कि महानगर टेलीफोन निगम में वेतन बांटने के लिए 171 करोड़ रुपये की रकम जारी भी हो गई है और जब तक आप ये लाइनें पढ़ रहे होंगे, संभव है कि इसके 23 हजार कर्मचारियों के बैंक खाते में उनका वेतन पहुंच भी चुका होगा। उम्मीद है कि दूसरी कंपनी के कर्मचारियों को भी ज्यादा इंतजार नहीं करना पडे़गा। वैसे भी आम चुनाव की घोषणा हो चुकी है और इस समय किसी तरह का हंगामा खड़ा हो, यह शायद कोई नहीं चाहेगा। लेकिन यह भी तय है कि यह समस्या कुछ महीने बाद फिर हमारे सामने खड़ी होगी।

भारत का संचार क्षेत्र इस समय सबसे ज्यादा स्पद्र्धा वाला बाजार है। इस कड़ी स्पर्धा ने तकरीबन सभी संचार कंपनियों के बही खातों में लाल रंग छितरा दिया है। देश के सार्वजनिक क्षेत्र का पूरा इतिहास यही बताता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां बाजार की स्पर्धा में लंबे समय तक नहीं टिक पातीं। और जहां तक सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों का मामला है, तो वे एकाधिकार वाले युग की कंपनियां हैं और अभी तक अपने उसी पुराने ढर्रे पर चल रही हैं। दोनों कंपनियों में कुल मिलाकर डेढ़ लाख से अधिक कर्मचारियों का होना ही बताता है कि बदलते दौर के बाजार की जरूरतों से ये दोनों ही कंपनियां कितनी दूर हैं। निजी क्षेत्र की शायद ही किसी दूरसंचार कंपनी में इतने कर्मचारी हों। उनका ज्यादातर काम आउटसोर्सिंग वगैरह से चल जाता है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां अभी इस युग में भी ठीक से नहीं पहुंच सकी हैं। 

इस बीच एक खबर यह भी है कि सरकार दोनों कंपनियों के उद्धार के लिए एक पैकेज भी तैयार कर रही है, जिसमें वोलंटरी रिटायरमेंट स्कीम जैसी योजना भी होगी, ताकि कर्मचारियों की संख्या को कम किया जा सके। हालांकि इतने से कोई बड़ा सुधार हो जाएगा, ऐसी उम्मीद नहीं ही है। असली समस्या यह है कि इन कंपनियों की सेवाओं की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। पिछले कुछ समय में भारत संचार निगम के उपभोक्ताओं की संख्या काफी तेजी से कम हुई है और इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा। ऐसा कतई नहीं है कि देश में सार्वजनिक क्षेत्र की सभी कंपनियां खराब काम कर रही हैं, अपवाद स्वरूप कुछ अच्छा भी कर रही हैं। लेकिन समस्या यह है कि जिन सार्वजनिक कंपनियों की हालत खस्ता है, उनके उद्धार का कोई विश्वसनीय मॉडल हम अभी तक तो नहीं तैयार कर सके हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Editorial Column Hindustan 14th March