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ट्रंप का फैसला

दो दिन बाद, सोमवार को हम विश्व पर्यावरण दिवस मनाएंगे। जगह-जगह जलसे और जुलूस होंगे। वैसे ही जैसे हर साल होते हैं। उसी तरह की औपचारिकताएं और उसी तरह का उत्साह। लेकिन एक चीज इस बार नहीं होगी, वह उम्मीद जो पूरी दुनिया काफी समय से बांध रही थी। डेढ़ साल पहले हुए पेरिस पर्यावरण समझौते ने यह आश्वासन दिया था दुनिया की सभी बड़ी ताकतें, यहां तक कि छोटे-छोटे देश भी तपती धरती पर राहत की छींटे डालने के लिए कमर कस रहे हैं। इस समझौते में एक तरफ अगर अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और भारत जैसे देश थे तो दूसरी तरफ सीरिया और निकरागुआ जैसे देश भी। लेकिन आज अचानक ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह उम्मीद तोड़ दी। उन्होंने पेरिस पर्यावरण समझौते से अमेरिका को अलग करने की घोषणा की तो डेढ़ साल पुराने पर्यावरण समझौते पर ही आशंका के बादल नहीं मंडराए बल्कि दो दशक से ज्ययादा के राजनयिक प्रयासों का वह सिलसिला भी खतरे में पड़ गया जिसने ऐसे किसी समझौते तक पहुंचने केलिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। बेशक, अमेरिका के अलग हो जाने से यह समझौता खत्म नहीं हुआ है, इससे जुड़े बाकी सभी देश अपने संकल्प दुहरा रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका के अलग हो जाने के बाद पेरिस समझौता अब पहले जैसा नहीं रहेगा। डोनाल्ड टं्रप का कहना है कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है। यानी बात जब अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की आई तो उन्होंने अर्थव्यवस्था को चुना। बाकी देश भी यही सोचते तो शायद यह समझौता होता भी नहीं। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि यह सब अमेरिकी पेट्रोलियम कंपनियों के दबाव में किया गया। हालांकि गूगल और फेसबुक जैसी अमेरिकी कंपनियों ने ट्रंप के फैसले का विरोध किया है। इस फैसले का बाकी दुनिया से ज्यादा खुद अमेरिका में ही विरोध हो रहा है।

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी बात अमेरिकी अर्थव्यवस्था और पेरिस समझौते तक ही सीमित नहीं रखा, अपने बड़बोलेपन में उन्होंने भारत और चीन को भी लपेट लिया। खासकर भारत को लेकर वे ज्यादा ही आक्रामक रहे। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषण करने वाला देश है और वह अपने कोयला उत्पादन को दुगना करने जा रहा है, जबकि हमसें यह उम्मीद की जा रही है कि हम उसे का करें। ट्रंप का यह भाषण उनके ज्यादातर पिछले भाषणों की तरह ही गलत धारणाओं पर आधारित था। दुनिया में सबसे बड़ा प्रदूषण फैलाने वाला देश चीन है और उसके बाद खुद उन्हीं के देश अमेरिका का नंबर आता है। तीसरे नंबर पर यूरोपीय संघ है और चौथे नंबर पर भारत है। चीन ही नहीं अमेरिका को भी देखें तो भारत बहुत पीछे। प्रति व्यक्ति प्रदूषण के हिसाब से देंखें तो भारत इस फेहरिस्त के सबसे पीछे वाले देशों में ही दिखाई देगा। दूसरा सच यह है कि भारत ने अपनी कईं कोल परियोजनाओं को रद्द कर दिया है। एक और सच यह है कि पेरिस समझौते में भारत ने प्रदूषण कटौती का जो वादा किया था, वह उससे कहीं ज्यादा करने जा रहा है। पेरिस समझौते से खुद को अलग करना अमेरिका का अपना फैसला हो सकता है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने जिस तरह से तथ्यों को पेश किया वह आपत्तिजनक है।

अच्छी बात यह है कि अमेरिका को छोड़ दुनिया के बाकी देश अभी भी अपने संकल्प पर कायम हैं। उन्हें अभी भी यकीन है कि वे धरती के बढ़ते तापमान में दो डिग्री सेल्शियस तक की कमीं ले आएंगे। यह पहले भी आसान नहीं था, पर अब अमेरिका के अलग हो जाने की वजह से और कठिन हो गया है। इन देशों के पास एक बड़ा मकसद है और यह उम्मीद कि अंत में समझदारी जीतेगी।
 

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  • Web Title:decision of trump