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2 जनवरी, 2021|4:32|IST

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फिर नक्सली आतंक

न वक्त उनके साथ है और न हालात। फिर भी छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक नक्सलवादी इतनी वारदात तो कर ही ले रहे हैं कि टेलीविजन और अखबारों की सुर्खियां बटोर सकें। सरकार का कहना है कि ये वामपंथी अतिवादी तकरीबन हर जगह परास्त हो चुके हैं या हो रहे हैं, इसलिए एक तरह से अब वे अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। बेशक, यही शायद सच भी है। अभी कुछ ही सप्ताह पहले नक्सली आतंकवादियों ने जिस तरह से छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ जवानों की हत्या की, या पिछले तीन दिनों से झारखंड में जो हो रहा है, वह तो यही बताता है। ये ऐसी घटनाएं नहीं हैं, जिन्हें उनकी किसी बड़ी रणनीति से जोड़कर देखा जा सके। मसलन, सोमवार को उन्होंने बोकारो में रेल पटरियों को उड़ा दिया। यह वह रेल लाइन है, जिसे ग्रैंड कार्ड कहा जाता है, जो दिल्ली को हावड़ा से जोड़ती है। इस इलाके और देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण रेल लाइन है। इसे उड़ाकर नक्सलवादियों ने सरकार को थोड़ा सा नुकसान भले ही पहुंचाया हो, लेकिन ज्यादा नुकसान क्षेत्र और देश की जनता को ही पहुंचाया है। यही बात हम उन वाहनों के बारे में भी कह सकते हैं, जिन्हें सोमवार को गिरीडीह में जला दिया गया, और बोकारो के उस रेलवे स्टेशन के बारे में भी कही जा सकती है, जिसे तीन दिन पहले जला दिया गया था। ऐसी कार्रवाइयों से नक्सलवादी सरकारी संपत्ति और सरकारी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाने के अलावा कोई लक्ष्य नहीं साधते। न तो यह उनके वर्ग-शत्रुओं के खिलाफ उठा कोई कदम है, और न ही किसी आदर्श की ओर बढ़ने का कोई रास्ता।

छत्तीसगढ़ और झारखंड में पिछले काफी समय से नक्सलवादियों का एक ही एजेंडा दिख रहा है- विकास का विरोध और उसे रोकने की वे कोशिशें, जो नाकाम रही हैं। छत्तीसगढ़ में केंद्रीय रिजर्व पुलिस के जिन जवानों की नक्सलवादियों ने हत्या की, वे वहां सड़क निर्माण परियोजना की सुरक्षा के लिए ही गए थे। इस परियोजना का नक्सलवादी विरोध कर रहे थे, क्योंकि इसका अर्थ होगा, उनके सुरक्षित क्षेत्र का खत्म हो जाना। कुछ महीने पहले ही नक्सलवादियों ने बस्तर के जंगलों में एक प्राचीन मंदिर की पुरातात्विक महत्व की मूर्ति को सिर्फ इसलिए तोड़ा कि उसकी जानकारी मिलने के बाद पुरातत्व विभाग के लोग ही नहीं, पर्यटक तक वहां पहुंचने लगे थे। यही चीज अब झारखंड में दोहराई जा रही है। वहां सरकार ने ‘मोमेंटम झारखंड’ नाम का अभियान चलाया है, जिसके तहत वह निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कई योजनाएं बना रही है। वे निवेश के लिए जमीन हासिल कर सकें, इसकी बाधाओं को दूर करने के लिए संथाल परगना काश्तकारी कानून और छोटानागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन किया जा रहा है। नक्सलवादी निवेश और इन संशोधनों का विरोध कर रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने बंद का आयोजन किया है। हिंसा की ताजा घटनाएं इसी बंद के दौरान हुई हैं।

आपत्ति विरोध या बंद के आयोजन से नहीं है। ये हमेशा से लोकतंत्र का हिस्सा रही हैं, लेकिन इस विरोध और बंद का इस तरह से हिंसक हो जाना किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। खासतौर पर जिस तरह से रेल की पटरियों को तोड़ा गया, वह तो पूरी तरह से एक आतंकवादी कार्रवाई ही है। इसलिए इसे करने वाले लोगों और संगठनों से उसी तरह का बर्ताव करना होगा, जिस तरह का आतंकवादियों से होना चाहिए। ताजा घटनाएं यह भी बताती हैं कि हम यह मानकर चुप नहीं बैठ सकते कि नक्सलवादी अब परास्त हो रहे हैं। परास्त हो रहे आतंकवादी कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं, इसलिए यह सुरक्षा और सतर्कता, दोनों को बढ़ाने का समय है।