फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन साइबर संसारआग से निपटने की न तैयारी, न दृष्टि

आग से निपटने की न तैयारी, न दृष्टि

उत्तराखंड के पहाड़ों पर आग धधकी हुई है। अकेले कुमाऊं क्षेत्र में पांच सौ से भी अधिक जगहों पर दावानल का कहर बरपा है। आसपास के शहरों-गांवों की हवा में इस कदर धुआं घुल चुका है कि लोग बीमार पड़ रहे हैं...

आग से निपटने की न तैयारी, न दृष्टि
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 08 May 2024 08:18 PM
ऐप पर पढ़ें

उत्तराखंड के पहाड़ों पर आग धधकी हुई है। अकेले कुमाऊं क्षेत्र में पांच सौ से भी अधिक जगहों पर दावानल का कहर बरपा है। आसपास के शहरों-गांवों की हवा में इस कदर धुआं घुल चुका है कि लोग बीमार पड़ रहे हैं। अभी जो घट रहा है, उसकी आशंका पहले से ही थी, क्योंकि जंगलों का सुलगना इस साल जनवरी में ही शुरू हो गया था। यह और बात है कि हमेशा की तरह इस बार भी किसी ने समय रहते इसकी सुध नहीं ली। पिछले कुछ बरसों से यह सामान्य सा घटनाक्रम हो चुका है कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाने वाला पर्यटक सीजन शुरू होता है और जंगल जलना शुरू हो जाते हैं। प्रकृति के विनाश का दायरा हर वर्ष पिछले साल से अधिक बड़ा होता जाता है। पांच साल पहले ठीक इन्हीं दिनों में कुमाऊं इलाके में चार सौ हेक्टेयर क्षेत्र के जंगल जले थे। इस साल अभी ही यह क्षेत्रफल दोगुना बताया जा रहा है।
पहाड़ों में इस मौसम में आग लगना आम है। सदियों से यह होता है कि चारे के लिए अच्छी घास उगाने की नीयत से जंगलों में फैली हुई चीड़ की सूखी पत्तियों को नियंत्रित रूप से जलाया जाता था। इस आग को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग ने बाकायदा पतरौल और अगलैन जैसे पदों पर लोगों की नियुक्ति कर रखी है। समूचा डिपार्टमेंट इस बात को सुनिश्चित करता था कि हर साल अप्रैल-मई-जून में लगने वाली इस आग से कम से कम नुकसान हो। उत्तराखंड बनने के बाद जंगल में लगने वाली आग से निपटने के लिए अलग से बाकायदा एक विभाग भी बनाया गया। मगर अपने उद्देश्य में वह कितना सफल रहा है, यह सबको दिखाई देता है। हमसे पहले की पीढ़ियां इस आपदा से साल-दर-साल सलीके से लड़ती रहीं। इधर के वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि लंबी-चौड़ी अफसरशाही, नेतागिरी, अखबारबाजी और सोशल मीडिया के बावजूद हालात बिगड़ते चले गए!
दरअसल, हमने एक समुदाय के रूप में सोचना और काम करना बंद कर दिया है। हम एक जिम्मेदार और सभ्य समाज के रूप में रहना भूल चुके हैं। सरकार के पास तमाम संसाधन हैं, लेकिन उसके पास न कोई तैयारी है, न कोई दृष्टि। एक जमाने में आग बुझाने का काम सरकार और जनता, दोनों का साझा होता था। अब दोनों के बीच कैसी दूरी है, बताने की जरूरत नहीं। विकास और वैज्ञानिक प्रगति का आलम यह है कि हमेशा की तरह हर कोई इस बार भी बारिश का ही इंतजार कर रहा है। उसी का सहारा है, हमेशा की तरह!
अशोक पांडे, टिप्पणीकार

उत्तराखंड के वन अपनी वनस्पतियों और जैव-विविधता के कारण विश्व धरोहर की हैसियत रखते हैं। इस कारण, इसके संरक्षण के लिए विश्व के तमाम हिस्सों से आर्थिक सहायता भी मिलती रहती है। ऐसे में, यह कहना कि सरकारी नीतियों के कारण वनाग्नि की घटनाएं थम नहीं रही हैं, गलत होगा। आखिर क्यों कोई अपनी उस संपदा को खुद ही नष्ट करेगा, जो उसके लिए कई संभावनाओं के द्वार खोलती हो? अलबत्ता, सरकार ने तो वनों के लिए अलग से मंत्रालय और विभाग बनाए हैं, ताकि इनका उचित संरक्षण हो सके। इन विभागों में अरबों-खरबों रुपये आते हैं, जिनका इस्तेमाल वनों के संरक्षण में किया जाता है। कुछ लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि वन विभाग भले कभी सरकार की आय का एक बड़ा स्रोत था, लेकिन आज ये सब बरबादी के कगार पर पहुंच गए हैं, मगर यदि ऐसे आरोपों में दम होता, तो भारत में वन क्षेत्रों के विस्तार या हरियाली बढ़ाने पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। असल में, दिक्कत चंद स्वार्थी लोगों से है। वे सरकारी विभागों में भी पदासीन हैं और समाज की स्थानीय संस्थाओं में भी। वे हमारे संसाधनों को लूट रहे हैं। जब-तब इन पर नकेल जरूर कसी जाती है, लेकिन कानूनी-छिद्रों का फायदा उठाकर ये बच निकलते हैं और फिर से अपनी नापाक मंशा को पूरा करने में जुट जाते हैं। अभी ही दावाग्नि की एक वजह कुछ लोगों द्वारा मौज-मस्ती के लिए जंगलों में आग लगाया जाना है! मजाक-मजाक में किया गया कोई काम कितना भारी पड़ सकता है, यह हम देख ही रहे हैं। अच्छी बात है कि सरकारी तंत्र ऐसे लोगों पर कानूनी दबिश बढ़ा रहा है, जिसका अच्छा नतीजा ही निकलेगा। 
सुमन, टिप्पणीकार

स्वार्थी लोगों की करतूत
आजकल उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों के अनेक वन क्षेत्र आग की लपटों से धधक रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हम देवभूमि में रहने वाले लोग यज्ञ-पुराण का आयोजन करने और देश-देशांतर में आस्था व श्रद्धा के लिए पूजनीय माने जाते हैं, लेकिन कुछ दुष्टात्मा प्रकृति और प्रवृत्ति के लोग हमारे ही बीच में रहते हैं। आगजनी जैसा कुकृत्य करने वालों के बारे में पता होने के बावजूद कुछ लोग इसलिए चुप्पी साध जाते है, क्योंकि यह माना जाता है कि जहां आग लगती है, वहां पर घास की पैदावार अधिक हो जाती है और मवेशियों के चारे के लिए घास की परेशानी नहीं रहती। मगर हमें इन सबसे ऊपर उठना होगा, क्योंकि नुकसान कहीं अधिक है।
 विष्णु प्रसाद सेमवाल, टिप्पणीकार