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आडवाणी भारत रत्न के सही दावेदार

लालकृष्ण आडवाणी उन चंद राजनेताओं में शुमार हैं, जो विचारधारा को जीने वालों में से एक हैं। आजकल ऐसा राजनेता मिलना बेहद मुश्किल है। बड़े-बड़े आदर्श व सिद्धांत बघारने वाले नेताओं की हमारे देश में कोई कमी..

आडवाणी भारत रत्न के सही दावेदार
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 06 Feb 2024 12:01 AM
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लालकृष्ण आडवाणी उन चंद राजनेताओं में शुमार हैं, जो विचारधारा को जीने वालों में से एक हैं। आजकल ऐसा राजनेता मिलना बेहद मुश्किल है। बड़े-बड़े आदर्श व सिद्धांत बघारने वाले नेताओं की हमारे देश में कोई कमी नहीं, लेकिन आडवाणी ऐसे नहीं रहे हैं। भले उनकी विचारधारा से किसी की असहमति रही हो, लेकिन उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और वह अपने विचार पर कायम रहे। उन्होंने राम मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया और उसे पूरा करने के लिए वह अथक प्रयास करते रहे। उसी का प्रतिफल है कि आज रामलला अपने यथास्थान पर पुनस्र्थापित हो पाए। भले ही यह सफलता कानूनी लड़ाई के जरिये मिली। वैसे एक बार उन पर भ्रष्टाचार का भी आरोप लगा, पर इससे बरी होने तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने की जो उन्होंने मिसाल पेश की, वह मौजूदा परिदृश्य में अतुलनीय है। यद्यपि वह आरोप राजनीति से प्रेरित था। लिहाजा, ऐसे आदर्श मानकों को व्यावहारिक जीवन में उतारने वाले आडवाणी जी को भारत रत्न से नवाजने का मतलब साफ है कि लोक-जीवन में शुचिता का स्थान आज भी बरकरार है। उनके इस सम्मान को राजनीतिक चश्मे से देखना अन्याय के बराबर होगा।
मुकेश कुमार मनन, टिप्पणीकार

एक युगद्रष्टा नायक
खुद के बोए बीज को अपने जीते जी वटवृक्ष बनते हुए देखना किसी-किसी के ही भाग्य में होता है। आडवाणी जी ऐसे ही लोगों में से एक हैं, जिन्होंने भाजपा को दो सांसदों वाली पार्टी से अपने दम पर 302 तक पहुंचते देखा, और आज यह पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। आडवाणी जी नींव का वह पत्थर भी हैं, जिनकी बुनियाद पर आज समस्त सनातनियों के आन, बान और शान का प्रतीक श्रीराम मंदिर गर्व से सीना ताने खड़ा है। उन्होंने मंडल की महीन तलवार से जातियों में बांट-छांट दिए हिंदू समाज को रामनामी धागे से कुशलतापूर्वक जोड़ा और उनको एकजुट किया। उन्होंने साजिश के तहत नख-दंत और श्रीहीन कर दिए गए हिंदू समाज को अपनी रथयात्रा के माध्यम से पुन: जागृत किया। हालांकि, जेहादी जिन्ना को सेक्युलर कहना, कांधार-कारगिल की असफलता और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के लिए आसानी से तैयार न होना उनकी कुछ कमजोरियां रहीं, लेकिन कुछ आरोप तो देवों पर भी हैं, आडवाणी जी फिर भी इंसान हैं। वास्तव में, आडवाणी जी एक युगद्रष्टा, कुशल संगठनकर्ता, श्रेष्ठ गुरु, ईमानदार राष्ट्रवादी और देश के सच्चे रत्न हैं। उनको भारत रत्न मिलने की बहुत-बहुत बधाई।
 आशा विनय सिंह बैस, टिप्पणीकार

इस चयन में झलक रही राजनीति
लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिया जाना एक पूर्णत: राजनीतिक फैसला है। ऐसे समय में, जब देश में कट्टरता मुखर हो रही है, संविधान प्रदत्त व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष की जगह एक धर्म विशेष पर केंद्रित किया जा रहा है, तब 90 के दशक में रथयात्रा के जरिये पूरे देश में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले लालकृष्ण आडवाणी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देना एक राजनीतिक दल के विचार को देश की भावना के ऊपर स्थापित करने का प्रयास है। इतना ही नहीं, हम सबने देखा ही है कि कैसे आडवाणी की उनकी अपनी ही पार्टी की सरकार ने लगातार उपेक्षा की। उनकी बेचारगी कई सार्वजनिक आयोजनों में स्पष्टता से दिखी भी। गुजरात में उनकी संसदीय सीट से लोकसभा प्रत्याशी न बनाने के साथ-साथ उनके निकटस्थ सहयोगियों को धीरे-धीरे सत्ता और संगठन में हाशिये पर डाला गया। ऐसे में, जब आम चुनाव करीब है, तब लगता यही है कि पुराने काडर की उदासीनता व नाराजगी को दूर करने के लिए उनको भारत रत्न दिए जाने का फैसला किया गया है। पुराने लोग इसलिए भी नाराज थे, क्योंकि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा में उनको आने नहीं दिया गया, जबकि राम मंदिर को लेकर उनके आंदोलन को भला कौन भूल सकता है? इन सभी नकारात्मक चर्चाओं पर विराम लगाने और आम चुनाव को लेकर अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए ही यह एलान किया गया है।
बीते वर्षों में यह दिखा है कि सरकारी मशीनरी की कार्यशैली एक वर्ग विशेष की मान्यताओं को विशेष संरक्षण देने की है। इससे जहां एक ओर बहुसंख्यक समाज में अपने धार्मिक आयोजनों को लेकर उग्रता बढ़ी है, तो दूसरी ओर अन्य धार्मिक मान्यताओं के वर्गों में संविधान-प्रदत्त समानता के अधिकार को लेकर संशय बढ़ा है। दुर्भाग्य से, यह धारणा आडवाणी जी को भारत रत्न दिए जाने से और गहरी होती दिखती है। उनका पूरा जीवन सिर्फ एक ऐसे विचार के लिए समर्पित रहा, जो भारत की धर्मनिरपेक्ष भावना के ठीक उलट है। उनका संगठन शायद ही अन्य मान्यताओं वाले समूहों के साथ समावेशी व्यवहार का इच्छुक है। चूंकि आडवाणी का समावेशी व्यक्तित्व न होने के कारण वह देश के जनमानस में ग्राह्य नहीं हैं, इसलिए उनको भारत रत्न दिया जाना नागरिकों पर इस फैसले को थोपने जैसा है। आज जब विपरीत विचारों के बीच सहमति बनाने की जरूरत है, तब बतौर जिम्मेदार नागरिक लालकृष्ण आडवाणी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की शायद ही सराहना की जा सकती है।
मणेन्द्र मिश्रा ‘मशाल’, टिप्पणीकार 

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