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Hindi News ओपिनियन साइबर संसारहार से घटक दलों में बढ़ेगी एकजुटता

हार से घटक दलों में बढ़ेगी एकजुटता

विधानसभा चुनावों के नतीजों, विशेष तौर पर राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार के बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक को निशाना बनाया जाने लगा है। कहा जा रहा है कि अब इस महागठबंधन के दिन लद गए हैं...

हार से घटक दलों में बढ़ेगी एकजुटता
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानWed, 06 Dec 2023 11:08 PM
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विधानसभा चुनावों के नतीजों, विशेष तौर पर राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार के बाद ‘इंडिया’ ब्लॉक को निशाना बनाया जाने लगा है। कहा जा रहा है कि अब इस महागठबंधन के दिन लद गए हैं और इनमें दरारें आ गई हैं। इसके लिए अखिलेश यादव या ममता बनर्जी या नीतीश कुमार जैसे नेताओं के बयानों या कथनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जबकि, असलियत इसके विपरीत है। कांग्रेस को लेकर सपा अध्यक्ष के पहले के बयानों का उल्लेख करने वाले लोग शायद यह भूल गए हैं कि चुनाव नतीजों के बाद अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि हाल के चुनावों के जो परिणाम आए हैं, उनसे विपक्षी गठबंधन और मजबूत होगा, और यह नतीजा भाजपा के लिए परेशानी का विषय होना चाहिए। उनके मुताबिक, जनता बदलाव के लिए इच्छुक है, और मुमकिन है कि 2024 में वह परिवर्तन के लिए वोट करे। इतना ही नहीं, नीतीश कुमार ने भी बयान जारी करके स्पष्ट कर दिया कि वह किसी अन्य कारणवश 6 दिसंबर की ‘इंडिया’ प्रस्तावित बैठक में शामिल नहीं हो रहे थे, इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि इस महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है। अलबत्ता, उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब विपक्षी नेताओं को आपस में बातचीत तेज कर देनी चाहिए, ताकि इस गठबंधन को और मजबूती दी जा सके।
क्या इन सबसे कहीं भी यह संकेत मिलता है कि ये नेतागण ‘इंडिया’ ब्लॉक को लेकर उत्साहित नहीं हैं? जाहिर है, एक खास मंशा के तहत ‘इंडिया’ में दरार का नैरेटिव बनाया जा रहा है, ताकि मतदाताओं को भ्रमित किया जा सके। ऐसे में, विपक्षी नेताओं के सामने चुनौती यह है कि वे किस तरह से इस नैरेटिव का मुकाबला करते हैं और मतदाताओं को अपने पक्ष में बनाए रखने में कामयाब होते हैं?
इसके लिए जाहिर तौर पर कुछ काम करने होंगे। सबसे पहले, विपक्ष के सभी नेतागण जल्द से जल्द बैठक करें और अपनी एकजुटता को कहीं अधिक मजबूती से जनता के सामने रखें। इसके बाद उन सबको जनता के मुद्दों पर कहीं अधिक आक्रामक होकर केंद्र को घेरना होगा। इसके लिए किसानों की आमदनी, रोजगार की समस्या, महंंगी होती शिक्षा जैसे मुद्दों पर उनको जनता के बीच जाना चाहिए। अगर वे ऐसा करने में सफल रहे, तो 2024 का रण उनका हो सकता है। इसकी उम्मीद इसलिए भी की जा सकती है, क्योंकि हालिया विधानसभा चुनावों में भी जहां एक प्रदेश में कांग्रेस को जीत मिली है, तो बाकी राज्यों में उसे अच्छा-खासा मत-प्रतिशत हासिल हुआ है। इन सबका फायदा आम चुनाव में हो सकता है।
मुन्ना चौधरी, टिप्पणीकार

विपक्षी गठबंधन में दिखने लगी दरारें
हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जिस औंधे मुंह गिरी है, उसका नुकसान सिर्फ राहुल गांधी को नहीं, बल्कि पूरे विपक्षी महागठबंधन को होना तय है। अब अन्य दलों के नेताओं को कांग्रेस पर हमलावर होने का मौका मिलेगा, जिससे इनके बीच की दरारें और स्पष्ट हो जाएंगी। ऐसा शुरू भी हो गया है, क्योंकि इन नतीजों को कोई ‘कांग्रेस की हार’ बता रहा है, तो कोई ‘नेहरू-गांधी परिवार के अहंकार’ का नतीजा। स्थिति यह हो गई है कि महागठबंधन की प्रस्तावित बैठक भी आनन-फानन में रद्द करनी पड़ी, क्योंकि विपक्ष के कई नेताओं ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया था। ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें ऐसी किसी बैठक का न्योता नहीं मिला है। यह संकेत है कि महागठबंधन में अंदर ही अंदर खींचतान चल रही है, जिसे हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने और उजागर कर दिया है। अब मतदाता भी यह समझने लगे हैं कि इन राजनीतिक दलों के नेताओं में एकराय नहीं है और ये सभी अपनी ढपली अपना राग बजाते रहेंगे। ऐसे में, ये भला कैसे अच्छी सरकार का भरोसा मतदाताओं को दे सकेंगे?
कई विपक्षी दलों की यह शिकायत थी कि हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद राहुल गांधी का रवैया बदल गया है। यहां तक कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद से उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बराबर खड़ा किया जाने लगा था। कांग्रेस का यह अति-उत्साह महागठबंधन पर भारी पड़ा। इसी अति-आत्मविश्वास के कारण उसने मध्य प्रदेश में सपा, आप जैसे दलों के साथ कोई समझौता नहीं किया, जिसके बाद अब इन दलों ने खुलकर कांग्रेस को निशाने पर लेना शुरू कर दिया है। अरविंद केजरीवाल तो कहने भी लगे हैं कि आम आदमी पार्टी ही अब उत्तर भारत में मुख्य विपक्षी दल है, क्योंकि उसके पास दो विधानसभाओं में बहुमत है। इस सबने न सिर्फ कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है, बल्कि ‘इंडिया’ ब्लॉक की राह में कांटे भी बो दिए हैं। अब साफ-साफ दिख रहा है कि ये नेता भाजपा से नहीं, अपने में ही उलझ रहे हैं और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। इससे भाजपा और विशेषकर पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह के लिए राहें आसान हो जाती हैं। अब तो यही लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निर्विवाद रूप से तीसरी बार भी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। विपक्षी नेताओं का वैचारिक द्वंद्व और उनका गिरता मनोबल ‘इंडिया’ ब्लॉक के लिए चुनावी हार की पटकथा लिख रहे हैं।
विमल कुमार, टिप्पणीकार 

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