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हिंदी साहित्य के कम होते पाठक

हिंदी का लेखक होने की अपनी मुश्किलें हैं। इसके पाठक लगातार कम हो रहे हैं। हम सब अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, वे अंग्रेजी के पाठक बनते जा रहे हैं। हिंदी उनके लिए बस बोलचाल और...

हिंदी साहित्य के कम होते पाठक
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 05 May 2024 09:03 PM
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हिंदी का लेखक होने की अपनी मुश्किलें हैं। इसके पाठक लगातार कम हो रहे हैं। हम सब अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, वे अंग्रेजी के पाठक बनते जा रहे हैं। हिंदी उनके लिए बस बोलचाल और मनोरंजन की भाषा है। पढ़ने वालों की एकाग्रता घट रही है। दिल बहलाने या भटकाने के इतने साधन हैं- मसलन यह स्मार्टफोन ही- कि एक लय में पढ़ना लगभग असंभव हो चुका है। तो, किसी भी कृति का वास्तविक प्रभाव लगातार खंडित होता रहता है। अनपढ़ लोगों की कद्र बढ़ रही है। हालांकि यह प्रवृत्ति पहले से थी, लेकिन पहले शिक्षक या लेखक या पत्रकार होना भी सम्मान की बात थी, अब सारा सम्मान इस एक बिंदु पर टिक गया है कि आपके पास पैसे कितने हैं?
हिंदी का समाज किसी बड़ी लड़ाई के लिए प्रस्तुत नहीं है। वह सामाजिक न्याय, समानता, लोकतंत्र आदि मूल्यों को कुछ कौतुक से देखता है। लोकतंत्र का मतलब उसके लिए बस चुनाव में वोट डाल आना है। समानता की लड़ाई यूटोपिया हो चुकी है। ऐसे में, हिंदी के लेखक के हिस्से भी न कोई सामाजिक संघर्ष दिखता है और न वह विचार, जिसके लिए वह कोई लंबी लड़ाई लड़ने को तैयार हो। जब बड़े युद्ध नहीं बचते, तो वह छोटी-छोटी निजी लड़ाइयों में लिप्त मिलता है। हिंदी का लेखक अपनों की राजनीति का भी मारा है। संविधान ने हिंदी को राजकाज की भाषा तो बनाया, रोटी और रोजगार की भाषा नहीं बनाया। तो, हिंदी की हैसियत इस देश में बची नहीं। वह अंग्रेजी के सामने दबी रहती है। कभी समाजवादी लोग हिंदी के लिए लड़ते थे, अब कोई लड़ने वाला नहीं है। लिहाजा, हिंदी का लेखक वह आत्मविश्वास ही अर्जित नहीं कर पाता कि अपने लिए कभी कुछ मांग सके, अपना शोषण भी रोक सके। पत्रिकाएं उसे पारिश्रमिक नहीं देतीं, प्रकाशक उसे रॉयल्टी नहीं देते और समाज उसका इतना भी साथ नहीं देता कि वह ठीक से खड़ा हो सके।
हिंदी इन दिनों वीभत्स सांप्रदायिकता की भाषा बनाई जा रही है। इस भाषा का सबसे लोकप्रिय वक्ता वह शख्स है, जो झूठ बोलता है, नफरत फैलाता है और आक्रामक बहुसंख्यकवाद का पोषण करता है। इस लोकप्रिय अविचार से लड़ने वाले जो विचार थे, वे सांगठनिक तौर पर भी कमजोर हैं और सांस्कृतिक तौर पर भी हिंदी से दूर। कुल मिलाकर, हिंदी का लेखक अपने समाज का बेचेहरा प्राणी है, जिसे कोई पहचानता नहीं। इस विज्ञापनबाज दुनिया में वह किसी तरह अपनी किताब छपवाकर कुछ संकोच के साथ घूमता रहता है कि किसे बताए कि उसने क्या लिखा है?
प्रियदर्शन, टिप्पणीकार

पाठकों की यह बेकद्री ठीक नहीं
हिंदी के लेखक और प्रकाशक अपने पाठकों से कुछ निराश लगते हैं। उन्हें यह लगता है कि पाठक अनपढ़ होता जा रहा है, उसमें एकाग्रता की कमी आती जा रही है और समझ का भी कुछ अभाव। गोया हिंदी साहित्य का सृजन करने वाले खुद को ही पढ़ा-लिखा, एकाग्र और समझदार घोषित कर रहे हैं। मुझे लगता है, पाठक की इतनी बेकद्री किसी काल में न हुई होगी। जबकि, हिंदी का लेखक यदि अपने आप को इतना निरीह समझता है, तो यह उसकी कमजोरी है, इसमें पाठक का कोई दोष नहीं है।
मैं स्वयं को एक धुरंधर पाठक समझती हूं, लेकिन मेरी यह मजबूरी है कि मुझ तक किताबें नहीं पहुंच पातीं। हिंदी साहित्य केवल दिल्ली या मुंबई का महानगरीय लेखन या पाठन नहीं है। आप महानगर में बैठकर लेखन करते हैं, महानगरों में ही साहित्य के बड़े आयोजन होते हैं, यहां तक कि अपनी किताबें बेचने के लिए पुस्तक मेले भी आप महानगरों में ही लगाते हैं और चाहते हैं कि आपका पाठक पूरे देश से आपको पढ़े। यह तो पाठक के साथ ज्यादती है। क्या लेखक ने कभी यह जानने की कोशिश की कि छोटे शहरों में उसकी पुस्तक की उपलब्धता क्या है? क्या सभी किताबें ऑनलाइन उपलब्ध हैं? पिछले दिनों मैंने एक किताब मंगाई। उसके मूल्य को विक्रेता ने मार्कर से छिपा दिया था। किताब का मुद्रित मूल्य कितना है, हमसे कितना लिया गया, यह भरोसा कैसे हो?
लेखक का किताब लिख देना और प्रकाशक का किताब छाप देना, यहीं पर कर्तव्यों की इतिश्री मान ली जाती है। यह सोच लिया जाता है कि सर्दियों में होने वाले दिल्ली पुस्तक मेले की फैशन परेड ने आपकी पुस्तकों को लोगों तक पहुंचा दिया। प्रकाशकों ने सम्मिलित तौर पर क्या कभी यह महसूस किया कि छोटे शहरों में, जहां आपके पाठक ज्यादा उपलब्ध हैं, उन तक किताब किस तरह पहुंचाई जाए? ऑनलाइन किताब मंगवाकर अक्सर पछताना पड़ता है। इन बातों पर यदि हिंदी का लेखक गौर नहीं करेगा, तो भविष्य में और पिछड़ेगा। इन दिनों पायरेटेड किताबों पर भी खूब चिंता जताई जाती है। यह लेखक व प्रकाशक के स्तर पर तो जायज हो सकती है, पर पाठक, जिसे पढ़ने की भूख है, उसका क्या? उसे तो किताब जहां से मिलेगी, वह वहां से लेकर पढ़ेगा। यदि पायरेसी का बाजार उसके सामने खुला हुआ है और प्रकाशक उस तक नहीं पहुंच पा रहा, तो यह पाठक की गलती नहीं है। मांग और पूर्ति के नियम से ही साहित्य का बाजार भी चलेगा, यह बात तो ध्यान में रखनी ही होगी।
तूलिका शर्मा, टिप्पणीकार