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संविधान हर एक नागरिक की ताकत

अगर कोई आपको पकड़कर कहे कि चलो, तुम्हें अमुक नेता को खून देना है, तो आप उसे किस अधिकार से मना कीजिएगा? यही नहीं, अगर कोई अधिकारी कह दे कि आपकी किडनी निकालकर अमुक मरीज को लगा दी जाए...

संविधान हर एक नागरिक की ताकत
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानFri, 03 May 2024 10:13 PM
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अगर कोई आपको पकड़कर कहे कि चलो, तुम्हें अमुक नेता को खून देना है, तो आप उसे किस अधिकार से मना कीजिएगा? यही नहीं, अगर कोई अधिकारी कह दे कि आपकी किडनी निकालकर अमुक मरीज को लगा दी जाए, तो आपके पास ऐसी कौन सी ताकत है, जो यह करने से रोक सकती है। ऐसे तमाम आदेशों के खिलाफ जानते हैं आपकी ताकत क्या है? वह है, देश का संविधान। इसमें लिखी हमारे अधिकारों और कर्तव्यों की वे लाइनें, जो ऐसा हर काम करने से रोकती हैं। हमारे संविधान ने हमें दैहिक स्वतंत्रता दी है, इसलिए कोई भी, कभी भी खड़ा होकर हमारी नसों से खून नहीं निकलवा सकता, हमारी किडनी नहीं छीन सकता, हमारी गाड़ी नहीं उठवा सकता, हमारे भोजन को सीमित नहीं कर सकता, हमारे मनोरंजन पर पहरे नहीं बैठा सकता।
लोग संविधान को केवल आरक्षण जैसे विषय पर लाकर खत्म कर देते हैं। आरक्षण तो एक मामूली हिस्सा है, असली बात तो यह है कि हमारा संविधान हमें हमारे ढंग से जीने की आजादी देता है। अगर यह नहीं होगा, तो कोई भी ताकतवर आपको पकड़कर आपका खून चूस लेगा और कोई अधिकार न होने पर आप सिर्फ खून देंगे और रोएंगे। लिहाजा जरूरी है संविधान, इसीलिए बात हो रही है कि इसे बचा लो! आपको हमेशा लगता होगा कि आप बड़े ताकतवर हैं। आपको संविधान की जरूरत ही क्या है? संविधान हमारी जिंदगी में क्या ही रोल निभाता है? यह तो दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए है। मगर जब कभी आप कमजोर पड़ते हैं, किसी डॉक्टर के आगे, वकील के आगे, पुलिस के आगे, अधिकारी के आगे, दबंग के आगे, तब यही संविधान है, जो आपकी ताकत बनता है। यह सिर्फ कुछ पन्नों की किताब नहीं, इसकी अहमियत समझिए। इसीलिए जब कहा जा रहा है कि इसे बचाना है, तो इस बात को गंभीरता से लीजिए। संविधान नहीं रहेगा, तो सिर्फआरक्षण नहीं जाएगा, बल्कि बहुत कुछ जाएगा और नया क्या आएगा, आपको और हमें नहीं पता? इन संविधान के न होने पर पता नहीं यह फरमान भी जारी हो जाए कि हर दवा का पहला परीक्षण प्रत्येक परिवार के एक सदस्य पर होगा और आप देखते ही देखते चूहों की जगह ले लेंगे। संविधान है, इसलिए यह मनमानी तो नहीं हो सकती है।
लिहाजा, देश के संविधान का सम्मान कीजिए। इसके प्रति संवेदनशील बनिए। जब कोई कहे कि इसे हटा दिया जाएगा, बदल दिया जाएगा, तो सतर्क हो जाइए। यही उस नागरिक का धर्म है, जिसे संविधान ने एक मामूली इंसान से नागरिक बनाया है।
हफीज किदवई, टिप्पणीकार

संशोधन का मौजूदा विमर्श गलत नहीं
संविधान संशोधन का तात्पर्य संविधान में किसी प्रावधान को जोड़ने, बदलने या निरस्त करने की प्रक्रिया से है। संविधान संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यह सदैव एक जीवंत दस्तावेज बना रहे, ताकि अपने मौलिक सिद्धांतों और मूल्यों को बनाए रखते हुए बदलती परिस्थितियों को अपनाने में सक्षम हो। विश्व के किसी भी संविधान में परिवर्तन या संशोधन की प्रक्रिया को अपनाया जाना प्रगति का सूचक माना जाता है। किसी भी देश का संविधान कितनी ही सावधानी से क्यों न लिखा गया हो, किंतु मनुष्य की कल्पना शक्ति की सीमा होती है। भविष्य के हालात की कल्पना संविधान के निर्माण-काल में नहीं की जा सकती थी। अत: बदलती परिस्थितियों के कारण इसमें संशोधन वांछनीय हो जाता है।
आज जो लोग यह हल्ला कर रहे हैं कि सरकार संविधान बदल देगी, वे यह तथ्य बड़ी चालाकी से छिपा रहे हैं कि अब तक संविधान में सैकड़ों बार संशोधन हो चुका है। इतना ही नहीं, आपातकाल के दौरान तो संविधान का मूल चरित्र ही बदल दिया गया था। यहां तक कि इसकी प्रस्तावना में भी, जिसे बाबा साहब आंबेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है, बदलाव कर दिया गया। उल्लेखनीय यह भी है कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘हालांकि, हम इस संविधान को इतना ठोस और स्थायी बनाना चाहते हैं, जितना कि हम बना सकते हैं, फिर भी संविधान में कोई स्थायित्व नहीं है।... यदि आप इसे अपरिवर्तनशील और स्थायी बना देंगे, तो राष्ट्र की प्रगति को रोक देंगे।’
आज संविधान में बदलाव का विरोध वही लोग और दल कर रहे हैं, जो राष्ट्र की प्रगति को रोकना चाहते हैं। वे जीवंत और संगठित राष्ट्र की परिकल्पना के विरोधी हैं। सोचिए, संविधान में संशोधन नहीं होता, तो पिछड़ों को अपना अधिकार मिल पाता? दलितों को उनका हक मिलता? या, महिलाओं को उचित सम्मान मिलता? संविधान में संशोधन नहीं होता, तो जम्मू-कश्मीर को अपना हक नहीं मिलता, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक जैसी अमानवीय प्रथा से मुक्ति नहीं मिलती या महिला आरक्षण की राह सुनिश्चित नहीं होती। संविधान का अर्थ है, सबके लिए समान विधान, यानी सबके लिए समान नियम और कानून। संविधान बदलने का डर वही दिखा रहे हैं, जो भारत में हर जाति और मजहब के लिए अलग विधान चाहते हैं। वे ‘पर्सनल’ कानून के हिमायती हैं और मजहब को राष्ट्र से ऊपर रखना चाहते हैं, ताकि भारत कभी एक सशक्त राष्ट्र न बन सके। हमें ऐसे लोगों को पहचानकर उनको बेपरदा करना है।
आशा विनय सिंह बैस, टिप्पणीकार