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परिणाम के करीब होते एग्जिट पोल

बुद्धिजीवी पत्रकारों और मतदाताओं का मिजाज पढ़ने वालों का समूह हर मतदान-केंद्र, हर निर्वाचन-क्षेत्र और हर मतदाता व उसकी भावनाओं से बहुत करीब से जुड़ा होता है, जिसके लिए वह परिश्रम भी करता है। उसकी इस...

परिणाम के करीब होते एग्जिट पोल
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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 03 Jun 2024 11:05 PM
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बुद्धिजीवी पत्रकारों और मतदाताओं का मिजाज पढ़ने वालों का समूह हर मतदान-केंद्र, हर निर्वाचन-क्षेत्र और हर मतदाता व उसकी भावनाओं से बहुत करीब से जुड़ा होता है, जिसके लिए वह परिश्रम भी करता है। उसकी इस मेहनत पर विश्वास करना लाजिमी है। नेताओं या राजनीतिक पार्टियों के विश्लेषण अपने हितों के मद्देनजर होते हैैं। तभी तो ज्यादातर नेता अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा कही गई बातें ही दोहराते हैं। अत: हम कह सकते हैं कि एग्जिट पोल के परिणाम भले ही एग्जेक्ट न निकलें, पर उसके करीब जरूर होते हैं। मसलन, हाल के चुनावी एग्जिट पोल पर यदि हम नजर डालें, तो उनमें जिस-जिस दल की सरकार बनने की बात कही गई, नतीजे कमोबेश उसी के अनुरूप आए, भले सीटें कुछ ऊपर-नीचे हुईं। इसीलिए इस बार भी माना जा रहा है कि एग्जिट पोल देश का सही मूड बता रहे हैं और विपक्ष अपने लिए इसमें बहुत उम्मीदें न देखे। वास्तव में, एग्जिट पोल में अलग-अलग समूहों का मन टटोला जाता है। चूंकि अपने यहां मतदान काफी हद तक एक सामूहिक कर्म ही है, इसलिए मतदान के दिन किसी भी समूह की बहुतायत आबादी किसी खास प्रत्याशी के पक्ष में गोलबंद दिखती है। यही कारण है कि एग्जिट पोल काफी हद तक सच के करीब होते हैं।
शकुंतला महेश नेनावा, टिप्पणीकार

सटीक होते पूर्वानुमान
एग्जिट पोल के ज्यादातर नतीजे अगर वास्तविक परिणाम से मेल खा जाते हैं, तो इसके पीछे शायद वह शोध अध्ययन काम करता है, जिसे अंजाम देने वालों को ‘सेफॉलोजिस्ट’ कहा जाता है। सवाल उठता है कि उनके अनुमान आखिर सटीक कैसे बैठते हैं, जबकि उनकी पहंुच कुछेक हजार मतदाताओं तक होती है? दरअसल, यह पूरी कवायद एक तरह से मनोवैज्ञानिक अध्ययन है, जो भारत जैसे देश में काफी आसान है, क्योंकि जाति, धर्म और लाभार्थी समूह के गुणा-भाग के दृष्टिगत हर राजनीतिक दल का अपना मतदाता समूह होता है। प्रबुद्ध वोटिंग हमारे देश में अब भी दूर है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि हमारा लोकतंत्र परिपक्व नहीं है या मतदाता परिपक्वता का परिचय नहीं देते हैं। बावजूद इसके एक सम्मोहन तो है ही जाति-धर्म का। अगर यह सम्मोहन न रहा होता, तो मतदाता मुखर नहीं होता। तब शायद पूर्वानुमान में लगी एजेंसियों के कार्य कठिन जरूर होते। स्पष्ट है, ऐसे पूर्वानुमानों को छद्म तरीके से मतगणना से ठीक पहले चलाना दरअसल मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने जैसा है, राजनीतिक दलों ने इस बार इन्हें अपने-अपने पक्ष में खूब दिखाया। 
मुकेश कुमार मनन, टिप्पणीकार

इससे पूरे देश का मूड नहीं जान सकते
आम चुनाव के अंतिम चरण के बाद तमाम न्यूज चैनलों और एजेंसियों ने अपने-अपने एग्जिट पोल जारी किए और यह अंदाजा लगाया कि इस बार किसकी सरकार बनने जा रही है? देश की बागडोर कौन संभालने जा रहा है? इन सवालों का सही-सही जवाब तो आज दोपहर तक पता चल जाएगा, लेकिन एग्जिट पोल पर इसलिए संदेह होते हैं, क्योंकि ये देश का जनादेश जानने के लिए अवैज्ञानिक तरीका अपनाते हैं। भारत गांवों का देश है, जहां शायद ही कोई एजेंसी सर्वेक्षण करने जाती है। वे तो शहर में ही कुछ लोगों से अपना सर्वेक्षण करा लेती हैं और अगर उनको जरूरत महसूस होती है, तो गांवों में टेलीफोन करके वहां की जनता का रुख जानने का प्रयास किया जाता है। ऐसा करते हुए एजेंसियां भूल जाती हैं कि मतदाता अब कहीं अधिक जागरूक हो चला है। वह यूं ही अपने मन की बात किसी एजेंसी को नहीं बताता। मगर एजेंसियां हैं कि मानती नहीं। इसका नुकसान टीवी चैनलों को होता है और जनता में उनका विश्वास कम होता है। एग्जिट पोल के झूठे साबित होने से दर्शकों का विश्वास समाचार चैनलों से खत्म होने लगता है। हर चुनाव में इस तरह की भविष्यवाणियां की जाती हैं और ज्यादातर बार ये गलत साबित हुई हैं। हां, कभी-कभी जनमत सर्वेक्षण सही भी हो जाते हैं, लेकिन उनको अपवाद ही माना जाना चाहिए। व्यापकता में उसे स्वीकार करना गलत होगा। वैसे भी, करोड़ों की जनसंख्या वाले देश में कुछेक हजार लोगों का रुझान लेकर आप सही अनुमान नहीं लगा सकते। इसलिए कहा जा रहा है कि लोकतंत्र में जनता का मूड किस करवट बैठेगा, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार


अवैज्ञानिक तरीका
जनमत सर्वेक्षण जुटाने का आधार क्या है? एजेंसियां चंद लोगों को कुछ समय के लिए नियुक्त करती हैं, उनको एक फॉर्म दिया जाता है और कहा जाता है कि जनता से फॉर्म भरवाया जाए। मगर ऐसे लोगों में से अधिकतर अपने मन की बातें ही फॉर्म में भरकर एजेंसी के दफ्तर में जमा कर देते हैं। एजेंसियां फोन का सहारा भी लेती हैं और चुनाव खत्म होते ही कुछ मतदाताओं को फोन करके उनके रुख को जानने का प्रयास करती हैं, मगर मतदाता जागरूक हो गए हैं, इसलिए वे फोन करने वाले की मानसिकता समझकर अपने रुख का इजहार करते हैं। इस तरह जनमत सर्वेक्षण में वैज्ञानिक तरीके का शायद ही पालन हो पाता है, इसलिए इनके नतीजों पर यकीन करना काफी कठिन माना जाता है। 
राजीव कुमार, टिप्पणीकार