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स्वच्छ धरती की दिशा में एक जरूरी कदम

संयुक्त अरब अमीरात की मेजबानी में कॉप-28 की शुरुआत हो गई है। ऐसे आयोजनों से हमारी उम्मीदें बढ़ती हैं। ऐसे ही चंद मौकों पर दुनिया के नेता जुटते हैं और धरती को साफ-सुथरा बनाने की दिशा में अपनी...

स्वच्छ धरती की दिशा में एक जरूरी कदम
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 03 Dec 2023 10:26 PM
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संयुक्त अरब अमीरात की मेजबानी में कॉप-28 की शुरुआत हो गई है। ऐसे आयोजनों से हमारी उम्मीदें बढ़ती हैं। ऐसे ही चंद मौकों पर दुनिया के नेता जुटते हैं और धरती को साफ-सुथरा बनाने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हैं। जिन लोगों को लगता है कि ऐसे आयोजन सफल नहीं होते, उन्हें पहले जलवायु परिवर्तन संबंधी बैठकों का इतिहास जान लेना चाहिए। कॉप-3 में क्योटो प्रोटोकॉल पर सहमति बनी, तो कॉप-8 में गरीब देशों की विकास-जरूरतों व जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने हेतु प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की आवश्यकता पर बल दिया गया। कॉप-16 में कैनकन समझौता किया गया और हरित जलवायु कोष, प्रौद्योगिकी तंत्र व कैनकन अनुकूलन ढांचे की स्थापना की गई, तो कॉप-21 में पेरिस समझौता हुआ, जिसमें वैश्विक तापमान-वृद्धि को पूर्व औद्योगिक समय से दो डिग्री सेल्सियस नीचे रखने और इसे बाद में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई। ये तमाम काम बिना बैठकों के संभव नहीं हुए हैं। 
दरअसल कॉप-28, यानी कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज-28, जलवायु को लेकर संयुक्त राष्ट्र की 28वीं बैठक है। इसमें सभी सदस्य देशों की सरकारें इस बात पर चर्चा करेंगी कि जलवायु परिवर्तन को रोकने और भविष्य में इससे मिलने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह की तैयारियां की जाएं। इस तरह की बैठकों में कई वैश्विक संस्थाएं भी शामिल होती हैं, जिनके सुझावों को पर्याप्त अहमियत दी जाती है। ऐसी बैठकों में सलाह-मशविरा से ही रास्ता निकलता है, जिसमें सभी की सहभागिता व सहमति होती है।
आरोप यह भी लगाया जाता है कि ऐसी बैठकों में फैसले तो ले लिए जाते हैं, पर उन पर अमल नहीं किया जाता। इस आरोप को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन सच यह भी है कि ऐसी बैठकों से ही जागरूकता फैलती है और सरकारों पर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ने और धरती को स्वच्छ बनाने का दबाव पड़ता है। बेशक, कुछ सरकारें शिद्दत से काम नहीं कर रहीं, पर सभी को एक ही तराजू से नापना ठीक नहीं होगा। कई देश पर्यावरण सुधारने को लेकर गंभीरता से काम कर रहे हैं और उनको देखकर उन देशों पर दबाव पड़ रहा है, जो जलवायु परिवर्तन को लेकर उतनी गंभीरता नहीं दिखाते। ऐसे देशों को कॉप जैसी बैठकों में परोक्ष रूप से अपमानित भी होना पड़ता है, क्योंकि कई संस्थाएं उनके खिलाफ बैठक-स्थल के आसपास प्रदर्शन करती रहती हैं। इसलिए, हमें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए और ऐसी बैठकों की सफलता की कामना करनी चाहिए।
दिव्यांशु, टिप्पणीकार

 

कागजी कार्रवाई से नहीं सुधरेगी आबोहवा

भूमंडलीय परिवेश में मान्य सीमा से अधिक फेरबदल का अर्थ है, आगे खतरा है। प्राणी जगत की सलामती के लिए वायुमंडल के संघटकों का संतुलन अनिवार्य है। पिछले कुछ वर्षों से मानवीय कुचेष्टाओं के कारण वैश्विक तापमान में असाधारण वृद्धि का सिलसिला गंभीर मंथन का विषय है। जलवायु परिवर्तन की परिणति तापमान-वृद्धि तक सीमित नहीं है। अन्य विकृतियां भी पृथ्वी के सभी भूभागों में अकाल, ध्रुवीय इलाकों में बर्फ का पिघलना, तूफान, सुनामी आदि के रूप में दिख रही हैं। समुद्री जलस्तर में वृद्धि से जल-जीवन तो डांवाडोल होता ही है, कई समुदाय भी विस्थापन को मजबूर होते हैं।
पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देशों ने तय किया था कि वे तापमान में वृद्धि को नियंत्रित करेंगे, मगर कई ऐसी रिपोर्ट हैं, जो कहती हैं कि इस दिशा में नाममात्र का प्रयास ही किया गया है। औद्योगिकीकृत देशों के क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते की सीमित सफलता के मूलत: दो कारण रहे। पहला, अनुकूल संरचनात्मक ढांचे निर्मित नहीं किए गए, बल्कि ऐसा सोचा ही नहीं गया। और दूसरा, इसमें सामाजिक भागीदारी की कल्पना नहीं की गई। ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के दौर में ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियों से बिना लोक-सहभागिता के नहीं निपट सकते। घरेलू सामान का फिर से उपयोग, मोटर वाहन व बिजली की कम खपत का अभ्यास, वृक्षारोपण जैसी अनेक युक्तियों से कार्बन उत्सर्जन को घटाना सहज है, और बड़े एलानों के साथ इन उपायों को प्रोत्साहित करना लाभकर रहता, पर दुर्भाग्य से इस दिशा में काम नहीं किया जा रहा। बेशक, हम बड़ी बैठकें कर लें, लेकिन जब तक व्यावहारिक उपायों पर अमल नहीं किया जाएगा, ऐसे प्रयास निरर्थक साबित होंगे।
यह समझना होगा कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार कोयला, लकड़ी, तेल जैसे जीवाश्मों को घरेलू कार्यों, परिवहन, बिजली उत्पादन आदि के लिए जलाना है। पृथ्वी का मौजूदा तापमान पिछले सवा दो सौ वर्षों में डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है और यह सिलसिला थम नहीं रहा। पेरिस समझौता का लक्ष्य है कि 2030 तक उत्सर्जन आधे तक सीमित रह जाए, और 2050 तक यह शून्य स्तर पर टिक जाए। शून्य उत्सर्जन का अर्थ है, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इतना कम हो, जितना पेड़-पौधे और समुद्र सहज अवशोषित कर लें, ताकि मानव-जाति सुरक्षित रहे। ऐसे में, यदि हम अब भी संभल जाएं, तो यह लक्ष्य पाया जा सकता है, मगर कागजी कार्रवाइयों से हमें ऊपर उठना होगा। दुखद है कि बड़े देश इसके लिए जरूरी इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे।
हरीश बड़थ्वाल, टिप्पणीकार 

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