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गांधी किसी फिल्म के मोहताज नहीं

पिछले कुछ वर्षों में इस देश में फिल्म को इतिहास समझने वाली एक खास पीढ़ी पैदा हो चुकी है। उसको लगता है कि जो फिल्म में दिख रहा है, वही असल में देश का इतिहास है। इन दिनों एक बार फिर फिल्म के नाम पर...

गांधी किसी फिल्म के मोहताज नहीं
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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 02 Jun 2024 10:39 PM
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पिछले कुछ वर्षों में इस देश में फिल्म को इतिहास समझने वाली एक खास पीढ़ी पैदा हो चुकी है। उसको लगता है कि जो फिल्म में दिख रहा है, वही असल में देश का इतिहास है। इन दिनों एक बार फिर फिल्म के नाम पर गांधीजी की चर्चा जोरों पर है। कहा गया है कि महात्मा गांधी को गांधी फिल्म आने के बाद लोग जान सके। मगर सच यही है कि सन् 1982 में आई इस फिल्म से दशकों पहले दांडी मार्च का आयोजन करके गांधी पूरी दुनिया में एक बड़े राजनीतिक स्टार बन चुके थे। यहां तक कि लंदन में जब चार्ली चैपलिन उनसे मिलने आए, तो लोग चैपलिन की जगह गांधी को देखने टूट पडे़। अमेरिकी अखबारों के शीर्ष पत्रकार उनकी राजनीति को समझने में हफ्तों लगाते थे! गांधी टाइम पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर भी दिखाई दिए थे। तो, यह थी दुनिया में गांधी की लोकप्रियता।
दरअसल, इन दिनों गांधी को कमतर आंकने की एक सुनियोजित साजिश चल रही है। जिस इंसान ने अपने जीवन के बेशकीमती 40 साल इस देश की आजादी की लड़ाई में झोंक दिए, जिसने महज अपनी लाठी के बल पर हिन्दुस्तान को आजाद करा दिया, जिसकी वेशभूषा महज एक धोती रही, उसका इस तरह अपमान गले नहीं उतरता। कहा गया कि मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला को लोग गांधी से ज्यादा जानते हैं, जबकि ये दोनों तो गांधी को ही अपना आदर्श मानते थे। इसी तरह, महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन भी महात्मा गांधी से काफी ज्यादा प्रभावित थे। कहना यह भी गलत नहीं होगा कि रवींद्रनाथ टैगोर का वह महात्मा, जो अपने आखिरी दिनों में इस दुनिया में हिंसा से निराश था, मौत के बाद पूरी दुनिया का महात्मा बन गया। जब अपने यहां लोग आजादी और नई सत्ता का स्वागत कर रहे थे, तब महात्मा गांधी ने खुद को अकेला कर लिया और नोआखाली से दिल्ली तक भाग-भागकर उन्होंने मनुष्यता को बचाने का काम किया। लिहाजा, यह विडंबना ही है कि जिस देश की आजादी गांधीजी ने अंग्रेजों से लड़कर जीती, उसी देश के लोग राजनीतिक चेतना के स्तर पर इतने विपन्न हो चुके हैं कि वे कभी गांधी की प्रतिमा की लाठी तोड़ देते हैं, कभी चश्मा, तो कभी प्रतिमा ही खंडित कर देते हैं। 
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी किसी व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि यह एक चेतना का नाम है। वह हमारे देश के महात्मा हैं, हमारे राष्ट्रपिता हैं और हम उनसे हर दिन कुछ न कुछ नया सीख सकते हैं। इसलिए गांधीजी को महज फिल्मों तक सीमित करना गलत होगा। गांधी पूरी दुनिया के थे, हैं और रहेंगे।
जयप्रकाश नवीन, टिप्पणीकार

एक वक्तव्य से इतना आहत क्या होना
जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की आवाज उठा रहे थे, उस समय वह दरभंगा राज के शासक महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह के नियमित संपर्क में थे। गांधीजी और महाराज का नियमित पत्राचार हुआ करता था और महाराज उन्हें प्रचुर आर्थिक सहायता भी पहुंचा रहे थे। दरभंगा महाराज भारत के पहले ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार को सार्वजनिक पत्र लिखकर दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ हो रहे रंगभेद का विरोध किया था। क्या कभी कांग्रेस व कांग्रेसी इतिहासकारों ने इस तथ्य से आपको परिचित कराया? हमारे पाठ्यक्रमों में इस महत्वपूर्ण पक्ष को क्यों शामिल नहीं किया गया?
महात्मा गांधी को नहीं जानना या उनके बारे में पूरी जानकारी न होना अपराध नहीं है। गांधी के दर्शन से सहमति-असहमति हमारा निजी विचार है और यदि कोई उनके विचारों से सहमत नहीं है, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह व्यक्ति समाजद्रोही है। कोई भी विचारधारा शत-प्रतिशत समावेशी नहीं हो सकती और कोई भी व्यक्ति संपूर्णता में दोषों से मुक्त नहीं हो सकता, तो फिर महात्मा गांधी कैसे अपवाद हो गए? महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानना ही पड़ेगा, यह क्या तुगलकशाही है! जो लोग भारत को माता का दर्जा देते हैं और देवी स्वरूप उसकी पूजा करते हैं, वे आपसे सवाल तो पूछेंगे कि भला कोई व्यक्ति भारतमाता का पिता हो सकता है क्या? मगर आप जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले व्यक्ति को गोडसेवादी कहना शुरू कर देते हैं।         
जिस भारत का अध्यात्म और जीवन-दर्शन हमें देवताओं और अवतारों की भी आलोचना का अधिकार देता है, वहां आप महात्मा गांधी के मूल्यांकन पर रोक लगा देते हैं। आप भगवान राम का मूल्यांकन कर सकते हैं, उन पर आरोप लगा सकते हैं, लेकिन महात्मा गांधी को आलोचना से परे मानते हैं। असल में, गांधीजी आपके ‘पॉलिटिकल बुलेटप्रूफ’ हैं, जिनका इस्तेमाल आप सिर्फ अपने बचाव के लिए करते हैं। गांधीजी तो कांग्रेस का विघटन कर देना चाहते थे। आप तो गांधीवादी हैं, तो कर दीजिए कांग्रेस का विघटन। देखा जाए, तो अकेले महात्मा गांधी ही इस देश के विचार और समाज सुधारक नहीं थे। मगर ब्रांड महात्मा को स्थापित करने के लिए दूसरी पुण्यात्माओं को इतिहास से बाहर नहीं आने दिया गया या फिर उनके बारे में झूठी बातें फैलाई गईं। उदाहरणस्वरूप,आपने सावरकर के साथ क्या किया? बेशक, गांधीजी में कई गुण थे, जो उन्हें भारतीय इतिहास का अद्भुत पुरुष बनाता है, लेकिन उन पर सवाल भी कम नहीं थे। सो, प्रधानमंत्री के एक वक्तव्य पर इतना आहत मत होइए।
विजय देव झा, टिप्पणीकार