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अब नए-नए तरीकों से ठगे जाते लोग

लगता है, इन दिनों ठगी के नए-नए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट का उदाहरण तो सामने है ही, जिसमें जालसाज गिरफ्तारी का डर दिखाकर सामने वाले के बैंक खाते को खाली कर देते हैं। बेशक, पुलिस ऐसे...

अब नए-नए तरीकों से ठगे जाते लोग
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 27 May 2024 09:38 PM
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लगता है, इन दिनों ठगी के नए-नए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट का उदाहरण तो सामने है ही, जिसमें जालसाज गिरफ्तारी का डर दिखाकर सामने वाले के बैंक खाते को खाली कर देते हैं। बेशक, पुलिस ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रयासरत है, लेकिन फिलहाल लगता यही है कि पुलिस डाल-डाल तो अपराधी पात-पात हैं। डिजिटल अरेस्ट ठगी तो ऑनलाइन माध्यम से की जाती है, ऑफलाइन भी अपराधियों ने मानो ठगी के नए पैंतरे ढूंढ़ लिए हैं, जिसका एक भुक्तभोगी मैं भी हो सकता था। 
दरअसल, तीन दिन पहले अनुराग शर्मा नामक एक हट्ठा-कट्ठा नौजवान, जो पढ़ा-लिखा और सभ्य दिख रहा था, मेरे घर आया और बताया कि पड़ोस की जमीन उसकी है और अगले दिन यहां भूमि पूजन तय है। चूंकि, पानी की व्यवस्था करने के लिए उसे मोटर लाना है और वह अकेले है, इसलिए उसने मुझसे गुजारिश की कि मेरे घर का कोई सदस्य उसके साथ चले, ताकि वह मोटरसाइकिल पर उसे पीछे बिठाकर मोटर ला सके। मैंने अपने ड्राइवर को उसके साथ भेज दिया। कुछ देर बाद वह अकेले लौटकर आया और कहा कि कुछ पैसे कम पड़ गए हैं और उसके माता-पिता बस आने ही वाले हैं, इसलिए बतौर कर्ज मैं वह रकम, जो करीब 14,000 रुपये थी, उसे दे दूं। मेरे इनकार करने पर उसने अपने तथाकथित माता-पिता को फोन लगाया, ताकि मैं उस पर भरोसा कर सकूं। मेरे बार-बार इनकार के बाद वह यह कहते हुए लौट गया कि वह दूसरे से कर्ज लेकर दुकान पर जाएगा और मोटर लेकर आएगा। शक होने पर मैंने अपने घरेलू कर्मी को उस जमीन पर भेजा, लेकिन वहां तो कोई काम नहीं हो रहा था। जाहिर है, वह मुझे बेवकूफ बना रहा था, इसलिए मैंने झट अपने ड्राइवर को फोन किया। उसने बताया कि उस व्यक्ति ने उसे किसी पार्क में बैठा रखा है। मैंने उसे फौरन घर लौटने को कहा और इस तरह मैं ठगी से सुरक्षित बच गया।
इस घटना का जिक्र मैंने इसलिए किया, ताकि लोगों को यह जानकारी हो सके कि मासूम दिखने वाला शख्स भी कितना शातिर हो सकता है। बाद में पता चला कि इस तरह की ठगी इन दिनों बढ़ गई है। स्पष्ट है, अब अपराधी नए-नए तरीकों से सामने वाले को बेवकूफ बनाने और उनसे रुपये ऐंठने की कोशिश में हैं। ऐसे में, पुलिस-प्रशासन की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक काम यह भी किया जा सकता है कि आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए पुलिस-प्रशासन द्वारा विशेष अभियान चलाया जाए। अगर ऐसा हो सका, तो अपराधों पर लगाम लग सकती है।
    एस सी गौड़, सेवानिवृत्त अधिकारी

पुलिस ऐसे अपराधियों को रोकने में सक्षम
यह अपने देश की संस्कृति बन गई है कि जहां कहीं आपराधिक वारदात होती है, वहां पुलिस-प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, मानो सारी गलती पुलिस वालों की ही हो। शायद ही कोई यह समझना चाहता है कि किस दवाब में पुलिस वाले अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। सच तो यह है कि अपने देश में जितनी आबादी है और जिस हिसाब से आपराधिक घटनाएं घटती हैं, उसे रोकने के लिए पर्याप्त पुलिसबल नहीं है। फिर भी, पुलिस वाले दिन और रात का भेद मिटाकर तत्पर रहते हैं और अपराध रोकने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। यही कारण है कि अपराधी अपराध के नए-नए तरीके अपनाते रहते हैं। मगर पुलिस भी खुद को कहीं अधिक दक्ष बनाती रहती है और अपराधियों की गरदन तक पहुंचने में कामयाब होती रहती है।
यकीन न हो, तो दो दिन पहले की ही खबर देखिए। उत्तराखंड पुलिस ने उन तीन लोगों को धर दबोचा, जो क्राइम ब्रांच के नकली अधिकारी बनकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर ठगते थे। पूछताछ के दौरान उन्होंने बताया कि किस तरह वे मुंबई क्राइम ब्रांच के अधिकारी बनकर लोगों को मनी लॉ्ड्रिरंग, ड्रग्स तस्करी में शामिल होने का भय दिखाकर डराते थे और फर्जी नोटिस भेजकर धोखाधड़ी करते थे। इस तरह की कार्रवाई अन्य राज्यों की पुलिस भी कर रही है और उनको सफलता भी मिल रही है। वैसे भी, अपराधी यदि अपने पैंतरे बदल रहे हैं, तो इसका एक अर्थ यह भी है कि पुलिस वाले उनके पुराने पैंतरे सफल नहीं होने दे रहे।
आम लोगों को संभवत: इस बात की भी जानकारी नहीं है कि पुलिस वाले सिर्फ अपराध रोकने के लिए तत्परता नहीं दिखाते, बल्कि लोगों को ईमानदारीपूर्वक जागरूक भी करते रहते हैं। ठगी के नए-नए तरीकों की जानकारी देते हुए पुलिस जहां-तहां पोस्टर आदि लगवाती है और आम लोगों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाती है। असल में, दिक्कत यह है कि लोग पुलिस वाले से अधिक अपेक्षा पाल लेते हैं, इसलिए यदि उनको जरा भी मुश्किल पेश आती है, तो वे पुलिसकर्मियों को कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। वास्तव में, पुलिस वाले भी आम इंसान ही होते हैं। उनसे भी कुछ चूक हो सकती है, लेकिन हमें पुलिस को घेरने से पहले उसके काम के चरित्र और दबाव को समझना चाहिए। वैसे भी, पुलिस-प्रशासन पर सिर्फ आरोप लगा देने से अपराध को काबू में नहीं लाया जा सकता। आम लोग और प्रशासन आपस में मिलकर ही अपराधियों पर दबिश बना सकते हैं। पुलिस तो इसके लिए तत्पर है। सवाल है कि आम लोग कितने तैयार हैं?
दिवाकर पांडेय, टिप्पणीकार 

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