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यह सियासी दलों की नीतियों का आईना

चुनाव घोषणापत्र अब काफी अहमियत रखते हैं। ये एक तरह से नैतिक दस्तावेज हैं, जिनको पार्टियां वोटरों को सौंपती हैं। राजनीतिक दल इससे बंधे होते हैं। देखा जाए, तो घोषणापत्र राजनीतिक दलों के...

यह सियासी दलों की नीतियों का आईना
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानThu, 23 Nov 2023 11:08 PM
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चुनाव घोषणापत्र अब काफी अहमियत रखते हैं। ये एक तरह से नैतिक दस्तावेज हैं, जिनको पार्टियां वोटरों को सौंपती हैं। राजनीतिक दल इससे बंधे होते हैं। देखा जाए, तो घोषणापत्र राजनीतिक दलों के इरादों, उद्देश्यों या विचारों का प्रतिबिंब होता है, इसलिए इसका महत्व काफी ज्यादा है। कुछ लोग इसे अब अप्रासंगिक मान रहे हैं, लेकिन यदि घोषणापत्र जारी ही नहीं किए जाएंगे, तो भला मतदाता कैसे समझ सकेंगे कि कौन सी पार्टी उनके लिए अगले पांच वर्ष में क्या करने जा रही है? यह राजनीतिक दलों की विचारधारा, नीतियों अथवा कार्यक्रमों का आईना होता है, इसलिए इसे जारी भी किया जाना चाहिए और प्रचारित भी।
एक तर्क यह भी दिया जाता है कि घोषणापत्रों से जनता को लुभाने की कोशिश होती है। इनमें उनके हितों की बातें बढ़ा-चढ़ाकर की जाती हैं, ताकि वे खास राजनीतिक दल के प्रति आकर्षित हो सकें। इसी कारण राजनीतिक दल भी ऐसे-ऐसे वायदे घोषणापत्रों में कर देते हैं, जिनको हकीकत की जमीन पर उतारना मुश्किल जान पड़ता है। बेशक, ऐसी बातें तब सही जान पड़ती हैं, जब यह दिखने में आता है कि राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद घोषणापत्र पर अमल नहीं कर रहे, लेकिन किसी एक दल की गलती की सजा सभी पार्टियों को देना गलत होगा। आज भी कई ऐसे दल हैं, जो प्रासंगिक वायदे ही घोषणापत्र में करते हैं। वे अपनी उन्हीं नीतियों और कार्यक्रमों की चर्चा करते हैं, जो उनके लिए करना आसान होता है, इसीलिए तो सत्ता में आने के बाद रसोई गैस के सिलेंडर के दाम भी कम किए जाते हैं और बिजली बिल में सब्सिडी भी दी जाती है। युवाओं को रोजगार देने के वायदे पूरे होते हुए हमने पिछले दिनों देखा है। जब वायदे पूरे हो रहे हैं, तो फिर घोषणापत्र को अप्रासंगिक कहने का भला क्या मतलब है?
वास्तव में, चुनाव घोषणापत्र जनता के लिए एक संदर्भ दस्तावेज या बेंचमार्क के रूप में काम करता है कि राजनीतिक दल आखिर चाहता क्या है? राजनीतिक दलों की विचारधाराओं, नीतियों और कार्यक्रमों की तुलना करके मतदाता यह तय कर सकते हैं कि उन्हें अपनी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किस सियासी पार्टी को वोट देना चाहिए। बेशक, 1952 से ही अपने देश में चुनाव होते रहे हैं और शुरुआती दिनों में प्रमुख दल अपनी विचारधाराओं और कार्यक्रमों को घोषणापत्र के माध्यम से सार्वजनिक करते थे, लेकिन यह अब सबकी जरूरत है। हमें इसको इसी रूप में देखना चाहिए और इस पर पूरा भरोसा करना चाहिए।
देव्यांश, टिप्पणीकार 

इसका कोई वायदा पूरा नहीं किया जाता
भारतीय राजनीति में घोषणापत्र जारी करने का रिवाज उतना ही पुराना है, जितना आम चुनाव। हर चुनाव में दावेदार दल अपनी घोषणाएं करते हैं। उम्मीद की जाती है कि पार्टी सत्ता में आएगी, तो अगले चुनाव तक घोषणापत्र के दो पाटों के बीच उसकी गतिविधियां चलती रहेगी। मगर क्या वास्तव में ऐसा होता है? कदाचित नहीं। सच यही है कि चुनाव से पहले इन घोषणापत्रों में बड़े-बड़े वायदे किए जाते हैं, लेकिन बाद में उनको कोई देखता तक नहीं। घोषणापत्र का कोई महत्व ही नहीं रह जाता। इसे सिर्फ एक नेता सहजता से स्वीकार किया करते थे, जो थे चौधरी चरण सिंह। वह प्राय: कहा करते थे कि घोषणापत्र को कौन पढ़ता है? तब इसे एक मजाक माना जाता था। मगर जैसे-जैसे समय बीता है, चौधरी चरण सिंह सच साबित हुए है। आज घोषणापत्र रस्म अदायगी से ज्यादा अहमियत नहीं रखते। 
राजस्थान का विधानसभा चुनाव इसका ज्वलंत उदाहरण है। यहां घोषणापत्रों को योजनाओं से जोड़ा जा रहा है। यहां हर गारंटी को धोखा बताया जा रहा है। कांग्रेस ओपीएस को लेकर रणनीति बना रही है, तो भाजपा अपने संकल्प पत्र के मिथ्या न होने की बात कह रही है। उसका दावा है, कांग्रेस की गारंटी छलावा मात्र है। राहुल गांधी के ‘भारत माता कौन है’ वाले बयान पर भड़की विपक्षी पार्टी ने कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है। भाजपा के संकल्प पत्र में महिला सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। नौजवानों को सरकारी नौकरियां देने, सभी गरीब परिवारों की छात्राओं को पीजी तक नि:शुल्क गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने का संकल्प भी लिया गया है। भाजपा आशावादी है और वह कांग्रेस की गारंटी को जनता से धोखा और झूठ का पुलिंदा बता रही है। उधर, कांगे्रस भी पीछे नहीं है। वह भी घोषणापत्र के बहाने भाजपा पर हमलावर है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों का क्या नतीजा निकलता है, यह तो तभी पता चलेगा, जब 3 दिसंबर को जनादेश सामने आएगा। मगर इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर घोषणापत्र की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह तय है कि जनता को लुभाने के लिए राजनीतिक दल घोषणापत्र जारी करते हैं, लेकिन उसमें व्यावहारिक बातें होनी चाहिए। जनता से ऐसे वायदे नहीं किए जाने चाहिए, जो पहली नजर में ही झूठे नजर आएं। इस पर निर्वाचन आयोग को ध्यान देना होगा। उसे यह देखना होगा कि कहीं घोषणापत्र जनता को धोखा देने के माध्यम तो नहीं बन रहे हैं? खैर, यह जब होगा, तब होगा, पर अभी तो ये सिर्फ कागजी दस्तावेज जान पड़ते हैं, जिन पर शायद ही अमल किया जाए।
कांतिलाल मांडोत, टिप्पणीकार 

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