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पुरस्कारों से जुड़ी नियमावली में बदलाव जरूरी

साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार को लेकर विवाद स्वाभाविक है। इसकी नियमावली में आखिर कहां उल्लिखित है कि अंतिम तिथि के बाद प्रकाशित किताबों को ज्यूरी अनुशंसा करके पुरस्कार की रेस में शामिल कर सकती है...

पुरस्कारों से जुड़ी नियमावली में बदलाव जरूरी
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 23 Jun 2024 10:27 PM
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साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार को लेकर विवाद स्वाभाविक है। इसकी नियमावली में आखिर कहां उल्लिखित है कि अंतिम तिथि के बाद प्रकाशित किताबों को ज्यूरी अनुशंसा करके पुरस्कार की रेस में शामिल कर सकती है? जब ज्यूरी के पास यह विशेषाधिकार है ही नहीं, तो वह कैसे पुरस्कार की दौड़ में किताबों को शामिल कर रही है? ज्यूरी के इस मनमानेपन को अकादेमी रोक क्यों नहीं रही? यह बतलाता है कि अकादेमी भी कहीं-न-कहीं इसमें संलिप्त है। प्रश्न यह भी है कि आवेदन के लिए अंतिम तिथि का नियम क्यों रखा गया है? अगर नियम रखा गया है और आवेदन के बाद किसी भी लेखक की किताब, चाहे लेखक खुद भेजता हो या प्रकाशक, उसे क्यों माना जाए? क्या यह भेजी गई प्रविष्टियों और लेखकों के साथ अन्याय नहीं है? मान लें, किसी युवा लेखक की पुस्तक तय तिथि के बाद आती है। वह पुस्तक अपने विधा और विषय में बेहद महत्वपूर्ण, समय-समाज सापेक्ष और वैचारिक है, किंतु लेखक की पहुंच न प्रकाशक तक है, न ज्यूरी में बैठने वाले किसी सदस्य तक। तब उस प्रतिभावान युवा लेखक और उसकी रचना की गुणवत्ता का क्या होगा? दूसरी बात यह भी है कि अगर तय तिथि तक भेजी गई रचनाओं को आगे की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया, तो सकारण उसका लिखित प्रमाण भी हो! 
इतना ही नहीं, जब नियमावली में अनुशंसा का प्रावधान ही नहीं है, तब ज्यूरी द्वारा अनुशंसित पुस्तक पर अकादेमी विचार होने क्यों देती है? अगर प्रथम और द्वितीय चरण की समितियों से अनुशंसा लेनी है, तो सर्वप्रथम नियमावली में संशोधन होना चाहिए। संशोधन के बाद प्रथम और द्वितीय चरण की समितियों की अनुशंसा उसी तिथि तक स्वीकार करना चाहिए, जिस तिथि तक लेखक और प्रकाशक का आवेदन स्वीकार किया जाता है। बाद में अनुशंसा स्वीकार करना अकादेमी द्वारा गोरखधंधे को स्वीकार करना है। हां, अगर लेखक-प्रकाशक के साथ-साथ उसी पुस्तक को प्रथम और द्वितीय चरण की समितियों ने भी अनुशंसित किया है, तो अकादेमी द्वारा किसी एक के आवेदन या अनुशंसा को हटा देना चाहिए। 
पुरस्कार की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए तय तिथि के बाद प्रकाशित रचना को अगले वर्ष के लिए विचार करना चाहिए, न कि उसी वर्ष के लिए। ज्यूरी द्वारा अनुशंसा का प्रावधान पहले नियमावली में कर लिया जाए, उसके बाद अनुशंसित किताब को पुरस्कार की रेस में शामिल किया जाए। यह पारदर्शी प्रकिया होगी। मगर वर्तमान नियमावली में यह प्रावधान नहीं है। उम्मीद है, मौजूदा नियमावली में बदलाव होगा और पुरस्कार प्रक्रिया पारदर्शी होगी।
कुमार सुशांत, टिप्पणीकार

नियमों से अंजान लोग खड़े करते विवाद
साहित्य अकादेमी द्वारा दिए जाने वाले सम्मानों और पुरस्कारों को लेकर होने वाले विवाद कोई नई बात नहीं। इस बार भी अगर भाषा सम्मान और युवा पुरस्कार को लेकर हंगामा मचा हुआ है, तो कोई हैरानी नहीं हो रही। भाषा सम्मान आमतौर पर उन अध्येता या लेखक को दिया जाता है, जिन्होंने गैर-मान्यता प्राप्त भाषा के उत्थान को लेकर कोई बड़ा काम किया हो, या फिर जिनका मध्यकालीन कविता पर उल्लेखनीय काम हो। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने मध्यकालीन हिंदी कवियों- कबीर और जायसी पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का काम किया है। इसके अलावा भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं। ऐसे में, भाषा पुरस्कार के लिए उनके नाम पर विवाद क्यों? इसी तरह, हिंदी में गौरव पांडेय को युवा पुरस्कार दिए जाने पर भी विवाद चल रहा है। कुछ लोगों का तर्क है कि यह पुरस्कार पार्वती तिर्की, अदनान काफिल या विहाग वैभव में से किसी को मिलना चाहिए था। यहां भी ध्यान देने वाली बात है कि पुरस्कार मात्र एक है, लेकिन वैकल्पिक नाम तीन-तीन सुझाए जा रहे हैं। वैसे, साहित्य अकादेमी के अन्य भाषायी पुरस्कारों को लेकर भी विवाद होते रहे हैं। जब हिंदी कवयित्री अनामिका को पुरस्कार मिला था, तब भी विवाद से स्वर सुनाई दे रहे थे और जब बद्री नारायण को पुरस्कार देने की घोषणा हुई, तब भी कई तरह के सवाल उठाए गए थे।
अक्सर ऐसे विवाद वे लोग उठाते हैं, जिन्हें अकादेमी की नियमावली की जानकारी नहीं होती। साहित्य अकादेमी की ज्यूरी के समक्ष एक साथ कम से कम चार किताबें और अधिकतम कितनी भी किताबें विचार के लिए रहती हैं। ज्यूरी के सदस्य सर्वसम्मति या बहुमत से उनमें से किसी एक पुस्तक को पुरस्कार के लिए चुनते हैं, जिनको वे सर्वोत्कृष्ट मानते हैं। साहित्य के सामान्य पाठकों को भी पता है कि हर व्यक्ति का अपना-अपना पाठबोध होता है और अपनी-अपनी समझ के मुताबिक वे किसी पुस्तक के बारे में अपना मत बनाते हैं। कई बार तो ज्यूरी के सदस्य भी मानते हैं कि अमुक पुस्तक पुरस्कृत किए जाने लायक है, लेकिन एक ही पुरस्कार देने और बहुमत की विवशता के कारण उन्हें किसी एक पुस्तक पर निर्णय लेना पड़ा। 
यहां यह भी समझना चाहिए कि साहित्य अकादेमी एक स्वायत्त संस्था है और इसमें अकादेमी के अधिकारी केवल प्रक्रिया के संचालन में हिस्सा लेते हैं। पुरस्कार के निर्णय में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं होता, फिर भी आरोपों का ठीकरा साहित्य अकादेमी पर ही फोड़ा जाता है। आमतौर पर इस तरह के विवाद वही पैदा करते हैं, जिनको पुरस्कार नहीं मिलता। साहित्य अकादेमी साहित्यकारों की मान्य संस्था है, कृपया इसके सम्मान के साथ न खेलिए।
शिव कुमार शिवम, टिप्पणीकार 

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