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अपने जायके के लिए जीव-हत्या अनुचित

इन दिनों शाकाहार बनाम मांसाहार की बहस फिर से तेज हो गई है। कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि प्रकृति ने हर किसी के लिए आहार शृंखला तय कर रखी है, जिसमें एक जीव दूसरे को खाता है। चूंकि यह प्रकृति द्वारा...

अपने जायके के लिए जीव-हत्या अनुचित
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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानFri, 21 Jun 2024 09:22 PM
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इन दिनों शाकाहार बनाम मांसाहार की बहस फिर से तेज हो गई है। कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि प्रकृति ने हर किसी के लिए आहार शृंखला तय कर रखी है, जिसमें एक जीव दूसरे को खाता है। चूंकि यह प्रकृति द्वारा तय नियम है, इसलिए हमें मांसाहार को लेकर दुराग्रह नहीं पालना चाहिए। मगर ऐसा कहते हुए वे भूल जाते हैं कि धरती के तमाम जीवों में एकमात्र मनुष्य ही ऐसा है, जिसमें सोचने-समझने और हालात के अनुकूल खुद को ढालने की अद्भुत क्षमता है। जब मनुष्य अन्य तमाम जीवों से श्रेष्ठ है, तो उसे क्यों ऐसी आहार शृंखला अपनानी चाहिए, जिसकी बुनियाद किसी दूसरे जीव की जान हो। हमें अपने जीवन में न्यूनतम हिंसा का पालन करना चाहिए। कुछ मांसाहारी तो ईश्वर के नाम पर मांसाहार को उचित ठहराते हैं। मगर भक्ति के नाम पर किसी की प्राण-शक्ति को नष्ट कर देना पापपूर्ण ही है, क्योंकि ईश्वर को उन्हीं द्वारा रचित जीव का जीवन अर्पित करके भला कैसे खुश किया जा सकता है? जीवन देना निश्चित तौर पर ईश्वर का काम है, लेकिन किसी के प्राण बचाना तो हमारे हाथ में है। अगर जीव का अंत तय है, तो उसकी मौत होगी ही, लेकिन उसे हम अपने हाथों से क्यों मारें? जब तक संभव है, उसकी रक्षा क्यों न करें? किसी एक प्राणी के जीवन की भी हम रक्षा कर सके, तो हमें करनी ही चाहिए। इसीलिए, जितनी जल्दी हो, हमें शाकाहार अपना लेना चाहिए। मांसाहार को छोड़ देना मानव समाज के लिए बेहतर होगा।
सौरभ, टिप्पणीकार


शाकाहार चुनिए
ओशो ने मांसाहार और शाकाहार पर बहुत सटीक बातें कही हैं। उन्होंने कहा है कि फल और सब्जियां रंगदार और खुशबूदार होती हैं, वे आपको मोहक लगती हैं, जबकि मांस देखने में भद्दा और बदबूदार होता है। किसी फल के बगीचे में चले जाएं, तो मन खिल जाता है। एक-दो फल तोड़कर खाने का मन करता है, वहीं किसी बूचरखाने में चले जाएं, तो अच्छा-खासा स्वस्थ मन भी खराब हो जाए। फल या सब्जी तोड़ने या काटने पर आपको कोई ग्लानि नहीं होती, उनकी पीड़ा, उनका रोना-चीखना आपको सुनाई या दिखाई नहीं देता, वहीं किसी पशु की हत्या करना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। इसलिए देखा जाए, तो प्रकृति ने आपकी इंद्रियों को ऐसा बनाया है कि जिह्वा के अलावा बाकी सभी इंद्रियां मांसाहार के खिलाफ हैं। इससे आपको समझना चाहिए कि प्रकृति आपको क्या इशारा कर रही है? इस इशारे को समझकर ही अपना भोजन चुनें।
कमलेश कुमार, टिप्पणीकार

मांसाहार की निंदा का कोई तुक नहीं
मांसाहारी, शाकाहारी, वीगन इत्यादि की तरह भविष्य में शायद कोई और प्रजाति भी आएगी और उसका नामकरण भी इन्हीं की तरह हो जाएगा। इंसान फिर अपने आपको एक नए समूह का सदस्य घोषित कर देगा। साथ ही खुद के श्रेष्ठ होने का तमगा भी खुद लगा लेगा, क्योंकि उसके हिसाब से नया तमगा पुराने तमगों से बेहतर है, जबकि कुदरत का सिस्टम तमगों पर नहीं, बल्कि संतुलन पर चलता है। इसके लिए उसका अपना जैविक सिस्टम है, जिसमें दखल देकर इंसान अपना सिस्टम बनाने की कोशिश में लगा रहता है। यह इंसान की प्रकृति है। इसके लिए वह नाना प्रकार के तर्क-कुतर्क देकर खुद को सही साबित करने की कोशिश करता रहता है। मगर ऐसा करते हुए वह भूल जाता है कि कुदरत उससे पहले भी थी और बाद में भी होगी। उसे समझना चाहिए कि जिसका स्वभाव मांसाहार से जुड़ा है, वह मांसाहारी ही होगा, जिसका शाकाहार से, वह शाकाहारी होगा और जिसका वीगन से जुड़ा है, वह वीगन रहेगा। इसमें अच्छा या बुरा होने जैसा कुछ नहीं। सभी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुरूप अपने खान-पान का चयन करते हैं। इंसान के अलावा कोई भी अन्य जीव मांसाहारी, शाकाहारी या वीगन होने का अभिमान नहीं पालता और न ही किसी दूसरे को नीचा दिखाने की चेष्टा करता है। कुदरत ने किसी भी जीव को अपने पर निर्भर नहीं रखा, बल्कि वह शृंखलाओं द्वारा दूसरे प्राणियों पर निर्भर है। खान-पान प्रकृति का नियोजन है। यहां एक जीव ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दूसरे का भोजन है। जैविक चक्र इसके बिना पूरा नहीं होता। इसलिए हमेशा अपने स्वभाव में रहो। मांसाहारी हो, तो मांस खाने में कोई बुराई नहीं और शाकाहारी हो, तो शाकाहार खाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। वीगन हो, तो फूल-पत्तियों से कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। हमेशा अपने शरीर के स्वभाव, उसकी जरूरत और अपने उपार्जित संस्कारों के अनुरूप खान-पान का चयन करें। किसी खास तमगे में पड़कर अपने स्वभाव को विकृत न करें। 
वहाब, टिप्पणीकार


मिथ्याभिमान
यह बात गलत है कि देश में शाकाहारियों की संख्या ज्यादा है, क्योंकि आंकड़ों के मुताबिक, हर दो में से एक भारतीय न सिर्फ मांसाहार पसंद करता है, बल्कि हफ्ते में एक बार जरूर खाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 57.3 फीसदी पुरुष और 45.1 प्रतिशत महिलाएं सप्ताह में कम से कम एक बार मांसाहार का सेवन करते हैं। इसलिए शाकाहारी मिथ्याभिमान में जीना बंद करें और मांसाहारी को न कोसें।
समीर, टिप्पणीकार