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अब साहित्य अपने ध्येय की ओर बढ़ रहा

साहित्य उसे कहते हैं, जिसमें सबका हित निहित हो। सबका साथ, सबका विकास। सुरसरि सम सब कहं हित होई। इस साहित्य की परिभाषा ही वामपंथियों ने बदल दी थी। जो भी देश-समाज-सनातन का अहित करने वाला हो...

अब साहित्य अपने ध्येय की ओर बढ़ रहा
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 19 Feb 2024 10:27 PM
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साहित्य उसे कहते हैं, जिसमें सबका हित निहित हो। सबका साथ, सबका विकास। सुरसरि सम सब कहं हित होई। इस साहित्य की परिभाषा ही वामपंथियों ने बदल दी थी। जो भी देश-समाज-सनातन का अहित करने वाला हो, उसे साहित्य कह दिया जाता था। जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिलने से साहित्य भी अब अपने ध्येय की ओर बढ़ रहा है। ज्ञानपीठ का इससे अधिक सम्मान और कुछ नहीं हो सकता था। ज्ञानपीठ भारतीय साहित्य जगत का एक प्रतिष्ठित पुरस्कार है। स्वामी जी धर्मगुरु होने के साथ-साथ शिक्षाविद, संस्कृत-विद्वान, बहुभाषाविद, कवि, लेखक, टीकाकार, दार्शनिक, संगीतकार, गायक, नाटककार और कथा-कलाकार हैं। उनकी रचनाओं में कविताएं, नाटक, शोध-निबंध, टीकाएं, प्रवचन और अपने ग्रंथों पर स्वयं सृजित संगीतबद्ध प्रस्तुतियां सम्मिलित हैं। वह कई साहित्यिक कृतियों की रचना कर चुके हैं। स्वामी जी के साथ ही उर्दू दुनिया के जाने-माने शायर, गीतकार और कवि गुलजार को यह सम्मान देने की घोषणा की गई है। इसका मतलब है कि एक तरफ उर्दू, तो दूसरी तरफ संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान को यह सम्मान देकर गंगा-जमुनी तहजीब की पुनस्र्थापना की गई है। इसमें भी स्वामी जी का इसलिए सम्मान ज्यादा है, क्योंकि उन्होंने अपनी दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दिया। दिव्यांग विश्वविद्यालय स्थापित करके उन्होंने शिक्षा की अलख जगाई। वास्तव में, उनके सामने तो हर पुरस्कार तुच्छ है, क्योंकि स्वामी जी ने शैक्षिक जगत और आध्यात्मिक जगत को एक किया है। उनकी अद्भुत मेधा प्रणम्य है। उनका अमूल्य मार्गदर्शन सदैव समाज को मिलता रहे, यही उम्मीद है।
रामतीर्थ यादव, टिप्पणीकार


उचित चयन
बाल्यकाल में वेद कंठस्थ करने, अब तक 200 से अधिक पुस्तकें  लिखने और कई भाषाओं के विद्वान तुलसी पीठाधीश्वर पद्म विभूषण स्वामी रामभद्राचार्य को भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ मिलने पर धर्मनगरी में खुशी की लहर है। नेत्रहीन होते हुए भी उन्होंने कई भविष्यवाणियां कीं, जो सत्य साबित हुईं। कहा जाता है कि विश्व का पहला दिव्यांग विश्वविद्यालय स्थापित करने का श्रेय स्वामी जी को ही है। इसे राज्य सरकार ने अपने अधीन ने लिया है, पर स्वामी जी ही इसके कुलाधिपति हैं। इनकी पुस्तकों का विमोचन पिछले साल चित्रकूट आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुलसीपीठ में किया था। इसलिए ज्ञानपीठ ने देर से ही सही, लेकिन उचित फैसला लिया है। 
विनय प्रसाद, टिप्पणीकार

यह चर्चिल को साहित्य का नोबेल मिलने जैसा
ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। संविधान की आठवीं अनुसूची में जिन-जिन भाषाओं को शामिल किया गया है, उनमें से किसी भाषा के लेखक इस पुरस्कार के लिए चुने जा सकते हैं। विजेताओं के चयन की प्रक्रिया जटिल बताई जाती है और कहते हैं कि यह कई महीनों तक चलती है। इस प्रक्रिया का आरंभ न्यास को प्रस्ताव मिलने से होता है। यह प्रस्ताव विश्वविद्यालय, पाठक, आलोचक, किसी भाषा के लिए गठित संस्था, कोई भी भेज सकता है। हर भाषा की एक परामर्श समिति होती है, जिसमें तीन विद्वान सदस्य होते हैं। परामर्श समिति बस उन्हीं लेखकों पर विचार नहीं करती, जिनके नाम प्रस्तावित हुए हैं, बल्कि वह किसी भी लेखक पर विचार करने को स्वतंत्र है। परामर्श समिति अपनी संस्तुति प्रवर समिति को भेजती है, जो विजेता का चयन करती है। इस वर्ष रामभद्राचार्य को संस्कृत और गुलजार को उर्दू साहित्य के लिए ज्ञानपीठ दिया गया है। संस्कृत में मेरी गति नहीं है, रामभद्राचार्य की कृतियों को कभी देखा भी नहीं है। अनुवाद भी नहीं पढ़ा है। फिर भी, मेरा मन कहता है कि उन्हें ज्ञानपीठ वैसे ही दिया गया है, जैसे चर्चिल को साहित्य के लिए नोबेल दिया गया था।
सच्चिदानंद सिंह, टिप्पणीकार


ज्ञानपीठ का गिरता स्तर
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार गुलजार और रामभद्राचार्य को मिला है। गुलजार को तो छोड़िए, लेकिन रामभद्राचार्य को यह सम्मान देने का औचित्य समझ में नहीं आता, क्योंकि उनके साहित्यिक अवदान के बारे में शायद ही कोई कुछ खास जानता है। ऐसे इंसान को पुरस्कार देने के बाद अब बचता क्या है? विनोद कुमार शुक्ल और हिंदी के अनेक बड़े लेखकों की उपेक्षा करते हुए इस तरह का निर्णय हताश करने वाला है। जिन विनोद कुमार शुक्ल को अंतरराष्ट्रीय पेन पुरस्कार मिल चुका है, वह भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए, तो यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। शुक्ल जी ने अपनी उत्कृष्ट रचनात्मकता से पिछले चार दशकों से अधिक समय से हिंदी और हिंदीतर दुनिया को चमत्कृत किया है। उनकी अनूठी कविताओं और दो उपन्यासों- नौकर की कमीज और दीवार में एक खिड़की रहती थी, का भारतीय साहित्य में विरल स्थान है, उन जैसे अन्य महत्वपूर्ण रचनाकारों की उपेक्षा करके रामभद्राचार्य को पुरस्कृत करना अपमानजनक है। जिस भारतीय ज्ञानपीठ ने दशकों तक विभिन्न भारतीय भाषाओं के उत्कृष्टतम लेखकों को पुरस्कृत करके अपनी प्रतिष्ठा बनाई थी, उसे भी आखिर इस दौर से गुजरना पड़ा। 
विष्णु नागर, टिप्पणीकार 

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