फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन साइबर संसारक्या रुक सकेगा राजनीतिक चंदे का खेल

क्या रुक सकेगा राजनीतिक चंदे का खेल

चुनावी चंदे का खेला नया नहीं है। हिन्दुस्तान अखबार के ही शनिवार के संस्करण में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने लिखा है कि दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि एक विधायक...

क्या रुक सकेगा राजनीतिक चंदे का खेल
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 18 Feb 2024 11:00 PM
ऐप पर पढ़ें

चुनावी चंदे का खेला नया नहीं है। हिन्दुस्तान अखबार के ही शनिवार के संस्करण में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओम प्रकाश रावत ने लिखा है कि दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि एक विधायक या सांसद अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत ही झूठ से करता है, क्योंकि चुनाव-खर्च को लेकर वह जो दस्तावेज चुनाव आयोग के पास जमा करता है, वह झूठ का पुलिंदा होता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि अपने यहां चुनाव अब इतना महंगा हो गया है कि प्रत्याशियों को किसी न किसी तरह से पैसों की जरूरत होती ही है। यही कारण है कि करोड़ों रुपये चुनावों में खर्च किए जाते हैं। सवाल है कि ये रुपये आखिर प्रत्याशियों के पास आते कैसे हैं? जाहिर है, राजनीतिक चंदा इसका बड़ा स्रोत है। जो जितना चंदा जुटाता है, वह चुनाव में उतना अधिक प्रभावी होता है। अब ये पैसे कोई यूं तो देगा नहीं। इसके बदले में विजेता उम्मीदवारों को चंदा देने वालों के हितों का ध्यान रखना होता है। मोदी सरकार इसी चक्र को तोड़ने का प्रयास कर रही थी। जाहिर है, यह उन दलों या नेताओं को रास नहीं आया, जिनकी पूरी राजनीति चंदे से जुटाए गए काला धन पर टिकी है। दुखद है, वे अपनी कुत्सित मंशा में सफल हो गए।
अपने देश में कई राजनेताओं का मूल मकसद किसी न किसी तरह से कुरसी हासिल करना और अपना स्वार्थ सिद्ध करना है। राजनीति में आकर वह पैसे कमाना चाहते हैं। इसके कारण वह हर तिकड़म अपनाते हैं, ताकि सत्ता उनके पास ही बनी रहे। अब सवाल यह है कि राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता कैसे लाई जाए? इसके लिए निश्चय ही हमें कोई न कोई विशेष व्यवस्था बनानी होगी। यह व्यवस्था ऐसी बने कि कोई आम मतदाता भी चाहे, तो किसी नेता की कमाई का स्रोत जान सके। अगर ऐसा कोई प्रयास हम कर सके, तो सुप्रीम कोर्ट की बातें जमीन पर कहीं अधिक प्रासंगिक हो सकेंगी। अन्यथा, राजनीतिक चंदा जुटाने के कई चोर दरवाजे अब भी हमारे देश में हैं। 
सवाल यह भी है कि क्या चुनावी चंदे का खेल रोका जा सकता है? अदालत की मंशा पर मैं कोई सवाल नहीं कर रहा। उसने सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर ही यह फैसला किया है, लेकिन हमारे देश में कानूनों और नियमों का कितना पालन होता है, यह भी सभी जानते हैं। ऐसे में, जरूरी था कि चंदे को लेकर खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग किए जाते, तभी देश को ज्यादा लाभ होता।
मोहित शर्मा, टिप्पणीकार

इससे बड़े दलों को मिलता रहा बड़ा लाभ
मुझे याद आता है वह समय, जब चुनावी बॉन्ड का एलान किया गया था। दावा किया गया था कि अब चुनावी चंदे में पारदर्शिता आएगी। बेनामी लोग अपने काला धन का उपयोग चंदे के रूप में नहीं कर सकेंगे, क्योंकि अब यह नकद नहीं, बल्कि बॉन्ड के रूप में सिर्फ भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खरीदा जा सकेगा। मगर उस समय से लेकर आज तक यह सवाल अनुत्तरित रह गया कि चंदा देने वाले लोग आखिर होते हैं कौन? सुप्रीम कोर्ट की नजर इस रहस्य पर गई और अपने फैसले से उसने तत्काल प्रभाव से चुनावी बॉन्ड रद्द कर दिया। जाहिर है, जिस बॉन्ड को परिणामदर्शी बताया गया था, उसी की पारदर्शिता शक के घेरे में थी। साथ ही, यह सूचना के अधिकार का भी हनन था, क्योंकि मतदाताओं को पता ही नहीं चल पाता था कि किसने किस दल को पैसे दिए और किस तरह से अपने लिए फायदा कमाया। चूंकि, एहसान चुकाने की हैसियत बड़ी पार्टियों में ही होती है, इसलिए इस बॉन्ड का बड़ा हिस्सा इन दलों के हिस्से में ही आया। छोटे दल मुंह ताकते रह गए। अच्छी बात है कि अब सर्वोच्च न्यायालय ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। उम्मीद है, अब एक ऐसी नई व्यवस्था बनाई जाएगी, जो वाकई पारदर्शी होगी और हमारे देश के लोकतंत्र का इकबाल और बुलंद कर सकेगी। 
जंग बहादुर सिंह, टिप्पणीकार


एक सही फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने हमेशा की तरह एक उचित फैसला सुनाया है। चुनावी बॉन्ड को लेकर आशंकाएं निर्मूल नहीं थीं। यह सही है कि काला धन रोकने और उद्योगपतियों पर राजनीतिक दबाव हटाने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई थी, लेकिन जिस तरह से इसके छिद्रों का लाभ उठाया जाने लगा, उससे इसको लाने का औचित्य सिद्ध नहीं हो पा रहा था। चूंकि शीर्ष अदालत ने अब न सिर्फ इसे निरस्त कर दिया है, बल्कि इसकी आड़ में जो दुराव-छिपाव किया जा रहा था, उसको भी सार्वजनिक करने की बात कही है, इसलिए उम्मीद है कि जल्द ही इस बॉन्ड की पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी। फिर भी, चुनावी चंदा एक बड़ा सवाल बना हुआ है, जिसको लेकर एक पारदर्शी व्यवस्था बनाने की सख्त जरूरत है। चूंकि अभी केंद्र में एक मजबूत सरकार है, इसलिए वह चाहे, तो ऐसी कोई योजना बना सकती है। पूर्व में भी इस सरकार ने कई सख्त फैसले लिए हैं, जिससे लोगों का काफी हित हुआ है। उम्मीद है कि इस बार भी ऐसा ही कुछ होगा।
स्वाति, टिप्पणीकार 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें