फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन साइबर संसारबिना जाने-समझे उनकी होती आलोचना

बिना जाने-समझे उनकी होती आलोचना

एक इंसान, जिनकी जिंदगी पर, उनके रहन-सहन पर, उनके अंदाज पर हमेशा सवाल किए गए। उनकी खूबियों को दरकिनार करने की कोशिश रही। मगर अवाम की अथाह मोहब्बत के आगे ऐसी कोशिशें दम तोड़ती रहीं। उन्होंने धीरे-धीरे...

बिना जाने-समझे उनकी होती आलोचना
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 13 Nov 2023 11:28 PM
ऐप पर पढ़ें

एक इंसान, जिनकी जिंदगी पर, उनके रहन-सहन पर, उनके अंदाज पर हमेशा सवाल किए गए। उनकी खूबियों को दरकिनार करने की कोशिश रही। मगर अवाम की अथाह मोहब्बत के आगे ऐसी कोशिशें दम तोड़ती रहीं। उन्होंने धीरे-धीरे, तो कभी तेज-तेज देश को बुना। गुलामी की जंजीर तोड़ते ही निर्माण में लगे। अगर उनकी रखी नींव की बात करेंगे, तो डिस्कवरी ऑफ इंडिया से बहुत बड़ी-बड़ी किताबें लिखी जा सकती हैं। देश को डाकघरों की कतारें, बैंकों की इमारतें, आईआईटी, यूजीसी, संविधान, जल-थल-वायु सेनाओं का निर्माण, अस्पताल, छोटी-बड़ी इंडस्ट्री, स्कूल, यूनिवर्सिटी, अनाज, खेती, नहरें, सबमें काम किया। सबको गढ़ा, सबको बुना। यही नहीं, दुनिया के सामने गुटनिरपेक्षता जैसे सिद्धांत रखे। मीन-मेख निकालने वाले उनके कामों के अथाह ढेर में एकाध कमियां निकाल कुटिल मुस्कान के साथ बताते हैं, जबकि उनकी जिंदगी में, इस देश के अवाम ने उनके रहते किसी दूसरे की तरफ मुंह भी नहीं किया। 
जवाहरलाल नेहरू के आलोचकों से कोई गिला नहीं, पर समर्थकों से, उनकी परंपरा को लादने वालों से शिकवा है कि उन्होंने न नेहरू को पढ़ा है और न ही वे कुछ जानते हैं। वे तो नेहरू की लिखी किताबों के नाम भी नहीं जानते, काम तो बहुत दूर की चीज है। कोई नेहरू की बात करे, तो इनके पास उसे सुनने भर का भी वक्त नहीं। वह अभी भी बाल दिवस तक सीमित हैं, जबकि नेहरू एक युग को बुनकर जा चुके। आज जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है। अगर उनको महसूस करना है, तो उनका लिखा हुआ पढ़ना। उनके देखे ख्वाब देखना। उनकी तरह मेहनत करना। आजादी की लड़ाई में कोई अपने पूरे परिवार संग जेल गया, ऐसे उदाहरण नेहरू के सिवा कम ही हैं। लंबे वक्त तक जेल, कठोर सजाएं, उन सजाओं के बीच ऐसा श्रम, जिस पर देश मुस्कराए। गुजरात की जमीन पर जब कैद हुए, तो जेल परिसर में पेड़ लगाए, खेत जोते, और जब छोड़े गए, तो वहां एक पूरा बाग लग चुका था, जो अकेले नेहरू का करिश्मा था। इसी श्रम व जेल के बीच ऐसी किताबें लिखना, जिसका कोई तोड़ न तब था, न अब है। एक बार उनके संघर्ष और निर्माण को पढ़ना। तब देखना कि नेहरू क्या थे? आलोचक आलोचना करें, तब भी कम से कम उन्हें पढें़ तो? समर्थक लहालोट हों,पर समझें तो कि नेहरू क्या थे? कोई चाहे जितना नेहरू को को कुछ कहे, लेकिन दुनिया में आज भी बुद्ध, गांधी के बाद जो भारतीय दूसरे दिलों में सबसे ज्यादा रहता है, वह हैं जवाहरलाल नेहरू!
हफीज किदवई, टिप्पणीकार

मौजूदा दौर में वह प्रासंगिक नहीं जान पड़ते

हरेक व्यक्ति का एक समय होता है। उस समय वह जो फैसले करता है, मुमकिन है कि तात्कालिक परिस्थितियों में वे सही हों, लेकिन दीर्घकाल में वे गलत भी साबित हो सकते हैं। नेहरू के साथ यही हुआ है। वह कोई ईश्वरीय अवतार नहीं थे कि उनकी आलोचना नहीं हो सकती। वे कई मुद्दों पर विफल साबित हुए, जिसके कारण उनकी आलोचना होती रहती है। मिसाल के तौर पर, ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा। ऐसा करके उन्होंने देश को यह भरोसा दिया कि चीन हमारे साथ है, लेकिन वास्तव में बीजिंग क्या था, यह 1962 की जंग से हमें पता चल जाता है। हमें यह पता होना चाहिए कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के विचारों की प्रासंगिकता का पैमाना यह है कि उसके विचार मौजूदा समाज के एकीकरण, विकास और अस्तित्व के लिए कितने मायने रखते हैं। अगर वे मौजूं साबित हुए, तो वह व्यक्तित्व भी प्रासंगिक बना रहता है। मगर नेहरू यहां भी मात खाते दिखते हैं। स्पष्ट है, उनका नए सिरे से मूल्यांकन अनिवार्य हो गया है। अगर हम ऐसा कर सकें, तो यकीनन एक नई इतिहास दृष्टि से परिचित हो सकेंगे। 
हिमांशु, टिप्पणीकार


तुलना ठीक नहीं
महान व्यक्तियों की तुलना करते समय एक को आदर्श मानकर दूसरे को उसके विपरीत अथवा भिन्न होने के कारण महान या तुच्छ सिद्ध नहीं किया जा सकता। नेहरू, गांधी और सावरकर की तुलना जितने फूहड़ ढंग से प्राय: की जाने लगी है, उसमें यह तक नहीं देखा जाता कि वे तीनों एक-दूसरे के प्रति क्या भाव रखते थे। व्यक्ति के रूप में सावरकर जितने निस्पृह, समर्पित और सामाजिक क्रांतिकारी थे, उतने न तो गांधी थे, न ही जवाहरलाल नेहरू। पटेल अवश्य उनके निकट जान पड़ते हैं, मगर उनके बराबर नहीं। विचारक के रूप में गांधी और सावरकर की अपनी सीमाएं थीं। गांधी अपने को कांग्रेस और देश से ऊपर समझते थे, जबकि नेहरू देश को अपनी संपत्ति। दोनों ने अपनी राह में बाधक बनने वालों को गलत तरीकों से बाहर किया। सावरकर ने ऐसा कुछ नहीं किया। यहां तक कि अपनी मृत्यु के बाद किसी तरह के आयोजन, छुट्टी करने आदि को भी वर्जित कर दिया था। विचारक के रूप में यदि वह गलत थे और आज की व्यवस्था उन्हीं के आदर्शों के अनुसार चल रही है, तो हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत पहली बार विश्व में आत्म-गौरव के साथ खड़ा हुआ है। ऐसा आत्म-विश्वास तो उसे 15 अगस्त, 1947 को भी अनुभव न हुआ था।
भगवान सिंह, लेखक 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें