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कहानियों और किरदारों का कोलाज हीरामंडी

हीरामंडी  एक ऐसी सीरीज है, जो उस चकाचौंध में आपसे एक ही चीज मांगती है और वह है धैर्य। अगर आप अधीर होकर, मन में पूर्वाग्रह लेकर बैठेंगे देखने, फिर तो कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा। हीरामंडी  में कई किरदार...

कहानियों और किरदारों का कोलाज हीरामंडी
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 12 May 2024 09:55 PM
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हीरामंडी  एक ऐसी सीरीज है, जो उस चकाचौंध में आपसे एक ही चीज मांगती है और वह है धैर्य। अगर आप अधीर होकर, मन में पूर्वाग्रह लेकर बैठेंगे देखने, फिर तो कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा। हीरामंडी  में कई किरदार हैं और हर किरदार की एक कहानी है। इसको देखकर मुझे जो सबसे पहली बात समझ आई, वह यह कि चाहे तवायफों का जीवन हो या किसी अन्य पेशे से जुड़ा जीवन, सबकी अपनी दुश्वारियां हैं और सबकी अपनी चुनौतियां हैं।
हीरामंडी  में मल्लिका जान (मनीषा कोइराला) ने रेहाना आपा (सोनाक्षी सिन्हा) का कत्ल कर दिया, क्योंकि रेहाना ही उस शाही महल की साहेब थी। कत्ल क्यों किया, कैसे किया, इसे सीरीज देखकर समझा जाना चाहिए। इस कत्ल के बाद मल्लिका जान ही बन गई साहेब और पूरी कहानी के केंद्र में कमोबेश वही रही। बावजूद इसके कहानी में केवल एक ही नायिका है, ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसके समानांतर कई कहानी चल रही है, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम व उस आंदोलन में तवायफों की भूमिका को भी रेखांकित करने का प्रयास ठीक-ठाक किया गया है। कई कहानी, हर कहानी में कई किरदार, हर किरदार का अपना अलग चल रहा जीवन, प्रेम, नफरत, राजनीति, सत्ता की लड़ाई, सब कुछ है हीरामंडी  में। कहानी के भीतर कहानी, किरदार के भीतर कई किरदार और यह सब आपसे मांगता है केवल और केवल धैर्य।
हालांकि, एक-दो नहीं, बल्कि कई तरह की कमियां हैं इसमें। पहली, किरदार निभाने के लिए चुने गए कलाकार। कुछ चुनाव अच्छे हैं, तो कुछ औसत। भाषा को लेकर भी बहुत झोल है इसमें। 1930 के दशक में उर्दू खालिस रही होगी और जब उर्दू लाहौर की हो, तो क्या ही कहना। फिर, कोठों को संजय लीला भंसाली ने महल बना दिया है, हालांकि पहले एपिसोड को छोड़ दें, तो बाकी में कोठों की भव्यता में कमी लाई गई है। पुरुष किरदारों का अभिनय भी मुझे प्रभावी नहीं लगा। संभव है, स्त्री-केंद्रित सीरीज और विषय है, तो जान-बूझकर पुरुषों को ‘फेडेड’ रखा गया हो, कुछेक अपवाद हैं। रही बात सेट की, तो ‘लार्जर दैन लाइफ’ संजय लीला भंसाली का मोटो और यूएसपी, दोनों है। अपने किरदारों को भव्य दिखा देने में भी कौशल तो लगता ही है। हां, विषय का रिसर्च अच्छा है। बहरहाल, हीरामंडी  देखते हुए मुझे चमकीला  का एक डायलॉग बार-बार याद आ रहा था कि जब अशांति, हताशा और निराशा अपने चरम पर हो, तो लोगों में मनोरंजन की भूख और बढ़ने लगती है। हीरामंडी को उसके विषय के कारण एक बार  जरूर देखा जाना चाहिए।
रोहिणी कुमारी, शिक्षाविद्

भव्य सेट के अलावा कुछ खास नहीं इसमें
भंसाली साहब तो सेट और कॉस्ट्यूम्स दिखाने के लिए फिल्म बनाते हैं। कहानी बाद में ढूंढ़ी जाती है कि इस सेट पर कौन सी कहानी फिट बैठेगी? इस बार वेब सीरीज बना दी है। इतिहास से उन्हें ज्यादा सरोकार रहता नहीं है। भव्यता दिखाने के लिए ऐतिहासिक पात्र उठा लेते हैं, फिर अपनी मर्जी चलाते हैं। फिल्म इतिहास नहीं होती, यह मान लिया, मगर इतना भी कचरा नहीं किया जाता है फिल्म के नाम पर। जैसे, मस्तानी और काशी बाई को नचाना। उपन्यास उठाते हैं, तो उसमें पारो और चंद्रमुखी को नचा देते हैं। एक दर्शक के रूप में अखर तो जाता ही है। 
ऐसा ही हीरामंडी  देखते हुए महसूस हुआ। इतने करोड़ खर्च कर दिए सिर्फ भव्यता दिखाने में। तवायफों के ऊपर हमारे यहां इतनी सारी फिल्में बनी हैं। एक से बढ़कर एक। क्लासिक से लेकर मसाला तक, कि उनसे हीरामंडी  की तुलना होनी ही है। हर दूसरे सीन में किसी न किसी फिल्म की झलक है इसमें। गीत तक उसी तरह फिल्माए गए हैं, नजरिया की मारी  तो पूरा पाकीजा  से उठा लिया। भले ही यह प्रसिद्ध ठुमरी हो, पर वही क्यों रखनी है डायरेक्टर साहब? एक नृत्य जब प्यार किया तो डरना क्या  की तरह फिल्मा दिया गया। पाकीजा  फिल्म में मीना कुमारी अपने प्रेमी राजकुमार की शादी पर मुजरा करती हैं, लहूलुहान होने तक। अंत में उनकी खाला आकर राजकुमार के चचा जान बने अशोक कुमार से सवाल करती हैं और राज खोलती हैं कि यह तुम्हारी बेटी है। हुबहू वही दृश्य रच दिया। रिचा चड्ढा का मुजरा, अध्ययन सुमन की शादी और अंत में मनीषा का खुलासा। कोई नया दृश्य नहीं लिखा जा सकता था क्या इस प्रेम और बेवफाई को दर्शाने के लिए? मुझे तो आखिरी एपिसोड बनावटी ज्यादा लगा। जैसे हारे को हरिनाम। माने अब कुछ न बचा, तो चलो क्रांति कर लें। सिर्फ बिब्बो जान का किरदार सही लगता है, जो शुरू से अंग्रेजों के विरुद्ध बगावती सुर रखती है। हम देखेंगे  की नकल भी साफ दिखती है। रही बात अभिनय पक्ष की, तो जैसे इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया है। जो जितना निभा जाए, ठीक है। 
हीरामंडी की कहानी कितने उम्दा रूप में दिखा सकते थे, अगर सिर्फ भव्यता पर फोकस न करते। कुछ काम कहानी, किरदारों और अभिनय पर भी किया होता, तो बेहतर होता। छोटे बजट में फिर भी अच्छी कोशिश की जा रही है अच्छी कहानियां कहने की, वह भी नए ढंग से, पर बड़े निर्माता-निर्देशक आज भी सिर्फ भव्यता और पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। फिल्म-निर्माता भव्यता के बजाय लेखकों पर पैसा खर्च करें, तो कुछ बेहतर फिल्में सामने आ सकती हैैं।
निष्ठा, शिक्षाविद्