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गांव में जो बचा है

स्वप्निल श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल सेPublished By: Naman Dixit
Mon, 11 Oct 2021 11:23 PM
गांव में जो बचा है

अक्सर कहा जाता है कि लोकजीवन बदल गया है। इसके साथ यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि शहरी जीवन भी अपेक्षाकृत अमानवीय हो गया है। समाज की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पूंजी और राजनीति ने जीवन का खेल बिगाड़कर रख दिया है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन का एक बहुपठित वाक्य याद आता है। उन्होंने कहा था- शहर रहने लायक नहीं रह गए हैं, शहरों को रहने लायक नहीं बनाया गया है।’ शहर अब गांव को निगल रहे हैं, वहां लकड़बग्घों की आमद हो रही है। फैज अहमद फैज का एक शेर है- वाइज (धर्मोपदेशक) है न जाहिद (तपस्वी) है नासेह (नीतिज्ञ) है न कातिल, अब शहर में यारों किस तरह बसर होगी... वह शहर क्या जहां कातिल न हो। ये कातिल आगे चलकर सियासतदां बनते हैं और हम पर हुक्म चलाते हैं। गांव भी पहले जैसे मासूम नहीं रह गए। 
अब जिंदगी की रफ्तार बहुत तेज होती जा रही है, कोई रुककर किसी का हाल नहीं पूछता। लोग बस भागते जा रहे हैं। तुलनाएं अक्सर खतरनाक होती हैं। शहरों में लगातार रहते हुए मैं उनके चरित्र को समझने में नाकाम रहा, ज्यादातर दुखद अनुभव ही नसीब हुए। गांवों के बारे में यह जरूर कह सकता हूं कि अभी वहां पर हरीतिमा और लोकगीत बचे हुए हैं।
 

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