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प्रेरणादायी फिल्में ही दिशा दिखाएंगी

जहां हर तरफ एनिमल फिल्म का ‘हाइप’ बना हुआ है, उसमें 12वीं फेल जैसी मास्टर पीस मूवी दबकर रह गई, क्योंकि इस फिल्म में उत्तेजक दृश्य नहीं है, दो-चार किसिंग सीन भी नहीं हैं, पर जो 12वीं फेल में है...

प्रेरणादायी फिल्में ही दिशा दिखाएंगी
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 07 Jan 2024 11:52 PM
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जहां हर तरफ एनिमल फिल्म का ‘हाइप’ बना हुआ है, उसमें 12वीं फेल जैसी मास्टर पीस मूवी दबकर रह गई, क्योंकि इस फिल्म में उत्तेजक दृश्य नहीं है, दो-चार किसिंग सीन भी नहीं हैं, पर जो 12वीं फेल में है, वह शायद ही एनिमल में हैया यूं कहें कि वह था ही नहीं। मनोज शर्मा की जीवनी पर आधारित 12वीं फेल फिल्म को आज के युवा वर्ग को एक बार नहीं, बल्कि कई-कई बार देखना चाहिए। उसे देखना चाहिए कि कैसे 12वीं की परीक्षा में नकल न कर पाने से एक लड़का फेल होता है, मगर मध्य प्रदेश के चंबल से डीएसपी बनने का सपना लिए वह निकल पड़ता है। उस लड़के को बस इतना मालूम होता है कि डीएसपी बनने के लिए पीसीएस (पब्लिक सर्विस कमिशन) की तैयारी करनी पड़ती है। और, जब उसे पता चलता है कि डीएसपी से भी बड़ा कोई पद होता है, जिसको पाने के लिए यूपीएससी (यूनियन पब्लिक सर्विस कमिशन) की परीक्षा पास करनी होती है, तो वह खाली हाथ अपनी अड़ियल सोच के साथ निकल पड़ता है मुखर्जी नगर की गलियों की ओर, जहां पर वह अपने संघर्षों की पटकथा लिखता है। 
पुस्तकालय में एक छोटी सी नौकरी और फिर उसके बाद आटा चक्की की दुकान में काम करते हुए अपने आखिरी और चौथे प्रयास में हिंदी माध्यम से वह आईपीएस बनता है, जिसके संघर्षों में उसकी प्रेमिका श्रद्धा का साथ फिल्म को अलग स्तर पर ले जाता है। फिल्म के एक दृश्य में जब श्रद्धा कहती है, ‘तुम कहते थे न मनोज कि अगर मैं आई लव यू बोल दूं, तो तुम मेरे लिए दुनिया पलट दोगे, तो मनोज जाओ, अब पलट दो दुनिया।’ या फिर इंटरव्यू से पहले का वह दृश्य, जब श्रद्धा के पत्र को मनोज पढ़ता है, जिसमें लिखा होता है- ‘मनोज, तुम चाहे आईपीएस अफसर बनो या फिर आटा चक्की में काम करो, मैं जिंदगी तुम्हारे साथ ही बिताना चाहती हूं। विल यू मैरी मी मनोज...?’ श्रद्धा का वह किरदार देखने के बाद लगता है कि ऐसी पसंदीदा स्त्री तो हरेक नौजवान की जिंदगी में होनी चाहिए, जिसके लिए कोई मनोज पूरी दुनिया को पलट दे या पलटने का साहस दिखाए।  
रिजल्ट आने से पहले की म्यूजिक बैकग्राउंड के साथ चल रही अटल बिहारी वाजपेयी जी की पंक्तियां कितनी मानीखेज हैं- टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी, अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।... आंसू न बहाऊंगा, सिर्फ मुस्कराऊंगा, कह देना भाग्य से मैं कल लौट आऊंगा। 
श्वेता तिवारी, राजनेत्री 

प्रोत्साहन चाहिए, तो फिल्मों से बचिए
12वीं फेल  को एनिमल  से बीस बताया जा रहा है। मगर यह तर्क मेरे गले नहीं उतरता। एनिमल  कोई साधारण फिल्म नहीं है। यह बॉलीवुड के सड़े हुए जेहादी इको सिस्टम पर करारा प्रहार है। यह उस दुरभिसंधि को उसी की भाषा में करारा जवाब है। इस फिल्म को देखकर समझ में आता है कि विजुअल मीडियम का क्या मतलब है और ऐसी फिल्में बडे़ परदे पर ही क्यों देखनी चाहिए? कहा जा रहा है कि 12वीं फेल  से कुछ खास करने का प्रोत्साहन मिलता है, लेकिन अगर वाकई आपको प्रोत्साहित ही  होना है, तो ऐसी फिल्मों से बचना चाहिए। फिल्में देखकर आप बस एक-दो दिन तक सफल होने का जज्बा पाल सकेंगे, फिर पुराने ढर्रे पर लौट आएंगे। सफल होने का जुनून अगर अपने अंदर पैदा करना है, तो फिल्म देखने के बजाय विफल लोगों की जीवनियां पढ़िए। उनकी जीवनियां आपको जरूर प्रोत्साहित करेंगी। इससे आप यूपीएससी जैसी परीक्षा भले पास न कर पाएं, लेकिन एक सफल और नेक इंसान जरूर बन जाएंगे। इसलिए, 12वीं फेल जैसी फिल्मों के आकर्षण में आने से बचें। ऐसी फिल्में आपको राह से भटका सकती हैं। रही बात एनिमल  की, तो सिनेमा मनोरंजन का माध्यम है और इस पैमाने पर यह फिल्म पूरी तरह से खरी उतरती है। 
सौरभ, टिप्पणीकार 

आधा सच का महिमामंडन 
12वीं फेल  जैसी फिल्में प्रोत्साहित कम करती हैं और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ ज्यादा करती हैं। सरकारी नौकरी का ख्वाब असंख्य युवाओं के जीवन को बर्बाद कर रहा है। इस मृगतृष्णा से जितनी जल्दी युवा बाहर आ सकें, उतना ही बेहतर है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जब आप मनोज शर्मा जैसे किसी लड़के को छांटकर महिमामंडित करते हैं, तो एजुकेशन सिस्टम की बुनियादी समस्याओं को दुरुस्त करने की लड़ाई को कमजोर करते हैं। हो सकता है, कोई बेहतर प्रतिभाशाली परीक्षार्थी आरक्षण व्यवस्था, गरीबी और अन्य समस्याओं के बावजूद यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा पास कर ले, लेकिन यह सबके लिए आसान नहीं होता। इस तरह के महिमामंडन से कई लोग खुद का गलत आकलन कर लेते हैं और इस तथ्य को भूल जाते हैं कि मुकाबले में फिटेस्ट ही सर्वाइव कर पाते हैं, जबकि ऐसी प्रेरणा सबके पास होती है। फिर यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि परदे के पीछे की कहानी कोई नहीं जानता कि फलां गरीब को किसका साथ मिला था या कैसे संयोगवश परिस्थितियां उसके अनुकूल हो गई थीं। यह पता होना चाहिए कि मोटिवेशनल स्पीच में बताया गया सच दरअसल आधा ही होता है, तिस पर फिल्मों की तो खैर बात ही छोड़िए। 
हरिदत्त शर्मा, टिप्पणीकार  

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