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जरूरत के हिसाब से भूमि उपयोग सही

इन दिनों देश के कुछ तबकों से यह आवाज उठ रही है कि भूमि-उपयोग बदलकर किसानों को छला जा रहा है। उनका आरोप है कि इससे देश को भी नुकसान उठाना होगा और यहां खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। मुझे लगता है...

जरूरत के हिसाब से भूमि उपयोग सही
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानSun, 04 Feb 2024 10:59 PM
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इन दिनों देश के कुछ तबकों से यह आवाज उठ रही है कि भूमि-उपयोग बदलकर किसानों को छला जा रहा है। उनका आरोप है कि इससे देश को भी नुकसान उठाना होगा और यहां खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। मुझे लगता है कि ऐसे आरोपों में कोई दम नहीं है। यह सही है कि कुछ जगहों पर भूमि-उपयोग को बदलकर कृषि भूमि को औद्योगिक या रिहायशी क्षेत्रों में बदला गया है, लेकिन ऐसा वहां की जरूरतों को देखकर किया गया है। हालांकि, इस काम में पूरा ध्यान रखा जाता है कि स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान न पहुंचे।
आखिर ऐसा करना क्यों जरूरी है? सबसे पहली बात, हम आबादी के मामले में विश्व के शीर्ष देश हैं। देश की जनसंख्या 140 करोड़ को पार कर चुकी है। इसमें एक बड़ी आबादी उस तबके की है, जिसके पास सिर छिपाने के लिए अपनी छत नहीं है। ऐसे लोगों के लिए स्वाभाविक ही जमीन की जरूरत है। चूंकि देश में कृषि भूमि पर्याप्त है, इसलिए उन जगहों का भूमि-उपयोग बदला गया है, जहां उतनी बड़ी मात्रा में खेती नहीं होती है। इससे न सिर्फ जरूरतमंदों को मकान मिल पा रहा है, बल्कि आस-पास के इलाकों का विकास भी हो रहा है। इससे शहरों पर आबादी के बढ़े दबाव को भी कम करने में मदद मिल रही है, क्योंकि भूमि-उपयोग को बदलने का यह काम आमतौर पर शहर के बाहरी हिस्सों में किया जाता है। इससे शहरों का भी जरूरी विस्तार होता है। 
एक बात और। खाद्यान्न संकट की बात कहना उचित नहीं है। आज हम इतना अनाज उगा रहे हैं कि दूसरे देशों को भी पर्याप्त मात्रा में निर्यात कर पाते हैं। यह 1960 के दशक का भारत नहीं है, जब खाद्यान्न के लिए हमें दूसरे देशों का मुंह ताकना पड़ता था। 21वीं सदी का भारत कृषि में ऐसी-ऐसी प्रौद्योगिकियों को अपना चुका है कि यहां खेती करना आसान हो गया है और उत्पादन भी पहले की तुलना में बढ़ गया है। अब तो ड्रोन से भी खेती के काम होने लगे हैं। इन सबके कारण हम इतना अनाज पैदा कर लेते हैं कि अगर कृषि की कुछ जमीनों का उपयोग बदल दिया जाए, तो हमारे अनाज भंडार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। देखा जाए, तो भूमि उपयोग को बदलने का फैसला गलत नहीं है। इसकी सराहना की जानी चाहिए। हां, इस काम में यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि स्थानीय पारिस्थितिकी को कोई नुकसान न पहुंचे। अगर इसका ख्याल रखा जा रहा है, तो भूमि उपयोग बदलने का विरोध उचित नहीं है।
रोशन कुमार, टिप्पणीकार

खेती की जमीनों को तो बख्श दीजिए
हाल के वर्षों में अपने देश में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इसके परिणामस्वरूप कृषि भूमि के रूपांतरण की प्रवृत्ति भी बढ़ गई है। आबादी के बढ़ते अनुपात के साथ भूमि का उपयोग लगातार बदला जा रहा है। इससे हमें कितना नुकसान हो सकता है, इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। उल्लेखनीय है कि कृषि भूमि भारतीय सभ्यता की हवा में घुली हुई है। किसी भी समय खाद्यान्न की मांग पूरी करने में कृषि ने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कहा तो यह भी जाता है कि जब राजा जनक के शासनकाल में अकाल पड़ा, तो उन्होंने खुद खेतों में हल चलाया। यह देखते हुए कि कृषि के विकास के साथ ही मानव बस्तियों की शुरुआत हुई, हम गांवों से कृषि भूमि रूपी कीमती संपत्ति छीन रहे हैं। ऐसी जमीनों पर स्वामित्व हासिल करने के लिए इनका उपयोग अनधिकृत रूप से बदला जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि भूमि का रूपांतरण न केवल भूमि के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि खाद्यान्न उत्पादन के असंतुलन को भी बढ़ाता है। इसलिए होना तो यही चाहिए कि कृषि भूमि के उपयोग को बदला ही न जाए। इसके लिए जो भी जरूरी कदम हों, वे जरूर उठाए जाने चाहिए। ऐसा करने से ही हम देश की खाद्यान्न जरूरतों को आगे भी पूरा कर सकेंगे। अन्यथा, फिर से हमें दूसरे देशों का दरवाजा खटखटाना पड़ सकता है।
फिर भी, यदि ऐसा करना आवश्यक ही है, तो हमें ऐसे तकनीकी उपायों पर अमल करना चाहिए, जो स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हों। इससे यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि खाद्यान्न के उत्पादन और उसकी मांग में असंतुलन न पैदा हो। खेती क्षेत्र में बदलाव के समय विशेष संवेदनशीलता भी बनाए रखनी होगी। खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए खेती से संबंधित क्षेत्रों में समर्थन और निरीक्षण की मात्रा में वृद्धि करना होगा। तकनीकी उन्नति के माध्यम से हम भूमि उपयोग को बदलने से होने वाले नुकसान की कुछ हद तक भरपाई कर सकते हैं, और अधिक से अधिक उत्पादन हासिल कर सकते हैं। इस दिशा में, स्वच्छता और जल संरक्षण के लिए नए तकनीकी समाधानों की खोज और प्रोत्साहन को महत्वपूर्ण मानना चाहिए। यह हमें प्रदूषण नियंत्रण, जल संचारण और संसाधन संरक्षण में भी मदद करेगा। कुल मिलाकर, यही कहना उचित होगा कि कृषि क्षेत्र का भूमि उपयोग नहीं बदलना चाहिए, लेकिन यदि यह करना बहुत जरूरी हो, तब इससे होने वाले नुकसान से बचने के लिए पर्याप्त उपाय भी करने चाहिए। 
अवनीश कुमार गुप्ता, टिप्पणीकार 

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