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दिल खोलकर शादी का जश्न मनाइए

भारतीय समाज उत्सवप्रेमी है। यहां हर उपलब्धि पर जश्न मनाया जाता है। विवाह तो जीवन भर याद रखने वाली चीज है, तो भला इसकी रौनक क्यों कम हो। विशेषकर उत्तर भारत में विवाह के रस्म-रिवाज हर्षोल्लास के...

दिल खोलकर शादी का जश्न मनाइए
Amitesh Pandeyहिन्दुस्तानFri, 01 Dec 2023 10:36 PM
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भारतीय समाज उत्सवप्रेमी है। यहां हर उपलब्धि पर जश्न मनाया जाता है। विवाह तो जीवन भर याद रखने वाली चीज है, तो भला इसकी रौनक क्यों कम हो। विशेषकर उत्तर भारत में विवाह के रस्म-रिवाज हर्षोल्लास के साथ पूरे किए जाते हैं। घर का वातावरण संगीतमय रहता है और हर तरफ खुशियां ही खुशियां दिखती हैं। ऐसे में, अगर कोई शादी के मौकों पर पर्याप्त खर्च करता है, तो उसे गलत कैसे ठहराया जा सकता है? यह सही है कि पहले न कोई वेडिंग प्लानर होता था, न कोई स्टेज डेकोरेटर। यहां तक कि कोई इवेंट मैनेजर भी नहीं। काफी सादगी से सब कुछ संपन्न हो जाता था। मगर अब दौर बदल चुका है। लड़के-लड़की फिल्म-टीवी में दिखने वाले विवाह के सपने देखने लगे हैं। वेन्यू, स्टेज, सजावट, मेहंदी, संगीत, हल्दी आदि सभी चीजों पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। यहां तक कि दुल्हन का लहंगा या जेवरादि का भी खास ख्याल रखा जाता है। यह ठीक है कि चादर के बराबर ही पैर पसारने चाहिए, लेकिन अगर किसी के पास पर्याप्त संपत्ति है, तो वह ऐसे मौकों को यादगार क्यों न बनाए?
इस पूरे प्रकरण का आर्थिक पक्ष भी है। महंगी शादियों के कारण ही इस मौसम में ऑटोमोबाइल क्षेत्र में खरीदारी बढ़ जाती है, जिसका परोक्ष रूप से देश की अर्थव्यवस्था को लाभ होता है। शादी के लिए दोनों पक्ष कपड़े और जेवर की भी खूब खरीदारी करते हैं। भाड़े की गाड़ियों की मांग बढ़ जाती है, जिससे स्थानीय बाजार को लाभ मिलता है। डीजे, साउंड-लाइट, बैंड बाजा, केटरिंग, फोटोग्राफर, ड्रोन उड़ाने वाले तकनीशियन, टेंट हाउस, मेरिज गार्डन, बग्घी-घोड़ा, इवेंट मैनेजर, ड्रांस ग्रुप, फ्लावर डेकोरेशन, आतिशबाजी करने वाले- सभी लोगों की मांग बढ़ जाती है। महंगी शादियों से ही इनके घरों में दो-चार पैसे आते हैं, जिनसे इनका गुजारा आसान हो जाता है। क्या किफायती अथवा सादगी से होने वाले आयोजनों से इन लोगों को यह लाभ मिल सकता है?
मेरा स्पष्ट मानना है कि दिल खोलकर जश्न मनाना चाहिए। देखा जाए, तो ये जश्न ही हमें ऊर्जावान बनाते हैं। एक दिन का जश्न काफी दिनों की खुराक बन जाता है। हां, यह बात जरूर है कि किसी को महंगी शादियों के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, और हर किसी की इच्छा का सम्मान करना चाहिए, लेकिन किसी की व्यक्तिगत सोच को पूरे समाज पर थोपना भी गलत होगा। जो लोग महंगी शादियों का ख्वाब देखते हैं, उन्हें अपने सपने पूरे करने का हक मिलना चाहिए। शेष लोग तो अदालत में भी सामान्य विवाह रच सकते हैं। 
सौम्या, टिप्पणीकार

दिखावे की मानसिकता हमें डूबो देगी
नामचीन लोगों, यानी सेलेब्रिटीज की शादियों को भर-भर के मीडिया कवरेज मिलता है। ग्रैंड पार्टी टाइप सब कुछ। डेस्टिनेशन वेडिंग। हल्दी-मेहंदी पर धुआं-गुलाल के बीच खिलखिलाते इलीट टाइप गेस्ट्स। दस हजार का एक वेडिंग कार्ड। हैवी डिजाइनर लहंगा। दूल्हे की शेरवानी। ब्ला-ब्ला-ब्ला... इन सबको देखकर सबसे ज्यादा चौंधियाता है मिडिल क्लास, यानी मध्य वर्ग। अपनी शादियों में अपने पारंपरिक रिवाजों को भूलकर हम इन सेलेब्रिटीज की नकल पर उतर आते हैं। प्री-वेड शूटिंग से लेकर वरमाला के समय के रटे-रटाए डांस स्टेप्स तक, जिसमें कई बार न तो दूल्हा सहज रह पाता है, और न दुल्हन। बॉलीवुड की नकल और दिखावटी भव्यता का प्रदर्शन कर हम अपनी शादियों को अपने कई उन रिश्तेदारों के लिए भी असहज कर देते हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। यह  तथाकथित ‘ग्रैंड सेलिब्रेशन’ उन पर जाने-अनजाने एक मानसिक दबाव बना देता है। मेहंदी-हल्दी का ड्रेस कोड पूरा करना, तेज संगीत में अपने आप को स्थिर रख पाना, बुफे सिस्टम बैंक्वेट में सहजता से खाना खा पाना- यह सब समाज के उस तबके के लिए बिल्कुल भी सहज नहीं है, जो अभी आर्थिक लड़ाई ही लड़ रहा है। बेशक, हर लड़की, हर लड़का अपनी शादी को यादगार बनाना चाहता है, लेकिन उसके कई अन्य तरीके हो सकते हैं। बॉलीवुड की अंधाधुंध नकल से ही शादियां यादगार नहीं बनतीं। एक दिन की चकाचौंध के पीछे हम बहुत कुछ खो देते हैं। आज के प्रगतिशील जोड़ों को आपस में बात करनी चाहिए। तरीके बदलने चाहिए। ट्रेंड के पीछे भागने से बहुत कुछ छूट जाता है। क्या पता, हमारी-आपकी कोई शुरुआत ही नया ट्रेंड बन जाए!
अमन आकाश, टिप्पणीकार
कर्ज लेकर भोज कैसा
कर्ज लेकर शादी का महंगा आयोजन करने, चमकदार बड़े-बड़े टेंट लगाने, बारात के लिए 40-50 गाड़ियों की व्यवस्था करने, ढोल-ताशे बजाने आदि बेहिसाब खर्च करने से कोई आपको धनाढ्य नहीं समझ लेगा। एक दिन शेरवानी पहनकर और घोड़े पर बैठकर नकली राजा बनने के लिए हो सकता है कि आपको वर्षों तक सिर पटककर काम करना पड़े। इसलिए, विवाह समारोह को सामान्य रखें। दिखावटी दुनिया से बाहर आना और हकीकत का सामना करना जरूरी है। ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत  की मानसिकता से बाहर निकलें। चार्वाक का यह दर्शन अब किसी काम का नहीं कि अगर अपने पास साधन न हो, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिए।
श्याम, टिप्पणीकार 

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