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अब भ्रष्टाचारियों की नैया पार नहीं होगी

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो यह मानते हैं कि सरकार उनकी है और वे कुछ भी कर सकते हैं। इस तरह की भ्रामक सोच भारतीय राजनीति का पतन कर रही है। इसकी...

अब भ्रष्टाचारियों की नैया पार नहीं होगी
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानThu, 01 Feb 2024 11:25 PM
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भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो यह मानते हैं कि सरकार उनकी है और वे कुछ भी कर सकते हैं। इस तरह की भ्रामक सोच भारतीय राजनीति का पतन कर रही है। इसकी शुचिता और पारदर्शिता को धूमिल कर रही है। पहले राजनीति का अर्थ लोगों की सेवा करना होता था, लेकिन बाद में यह अपने लोगों की सेवा का माध्यम समझी जाने लगी। बिहार और झारखंड जैसे राज्य तो इसमें सबसे ऊपर दिखते हैं। झारखंड में ही अभी जो घटनाक्रम हुआ है, क्या उससे यह धारणा नहीं बनती कि हेमंत सोरेन ने जरूर कुछ ऐसे कार्य किए हैं कि पहले उन्हें ईडी से ‘भागना’ पड़ा और जब उन पर दबिश बढ़ी, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर ईडी अधिकारियों के हाथों गिरफ्तार होना पड़ा। 
पड़ोसी राज्य बिहार का हाल भी इससे अलग नहीं है। वहां पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का भ्रष्टाचार खबरों में रहा है। उनके पुत्र तेजस्वी यादव व अन्य परिजन पर भी जमीन घोटाले के आरोप हैं। कहा जाता है कि जब ईडी ने तेजस्वी यादव से सवाल पूछे, तो वह भी संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। उन्होंने घोटाले के वक्त खुद के नाबालिग होने की बात कही। जब ईडी अधिकारियों ने पूछा कि करोड़ों की कंपनी कैसे बनाई, तो उन्होंने इस बारे में कोई जानकारी न होने की बात कही। जबकि लालू यादव के पास इतनी संपत्ति कैसे जमा हुई, यह कोई छिपा रहस्य नहीं है। वह तो भ्रष्टाचार के मामलों में जेल की हवा तक खा चुके हैं, इसलिए यह कयास गलत नहीं है कि देर-सबेर तेजस्वी यादव भी अपने पिता की तरह जेल में दिख सकते हैं। कुछ इसी तरह की कहानी देश के अन्य राज्यों में भी है, जहां मुख्यमंत्री और बड़े नेता ईडी के निशाने पर हैं, इसलिए मुमकिन है कि आने वाले दिनों में हम और भी कई नेताओं को कालकोठरी में देख सकते हैं। 
इन सब घटनाओं का स्पष्ट मतलब है कि अब भ्रष्टाचारियों की नैया पार होने वाली नहीं है। अगर ये लोग सोचते हैं कि ताकतवर होने के कारण कानून उन तक नहीं पहुंच सकता, तो ये मुगालते में हैं। अगर उन्होंने भ्रष्टाचार किया है, तो उन्हें अपने किए की सजा मिलेगी ही। भ्रष्ट आचरण से करोड़ों-अरबों की संपत्ति लूटने वाले नेतागण शायद नहीं जानते कि केंद्र में ऐसी मजबूत सरकार है, जो भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करती। इसीलिए तो जांच एजेंसियों को पूरी छूट मिली हुई है कि वे भ्रष्ट आचरण करने वालों को पकड़ें। दबाव मुक्त एजेंसियां अपने काम में जुटी भी हुई हैं।  
कांतिलाल मांडोत, टिप्पणीकार
विपक्ष को कमजोर करने की बड़ी साजिश
राजनीति का मतलब है, नीति-विशेष द्वारा शासन करना या विशेष उद्देश्य की प्राप्ति करना। इसमें जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत ही चरितार्थ होती है, जिसकी पुष्टि हालिया घटनाक्रम भी करते हैं। इसने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की खाई को काफी गहरा बना दिया है। गौर कीजिए, जहां-जहां विपक्षी पार्टियों की सरकार है, वहां-वहां ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाएं अपना जाल बिछा रही हैं। कुछ विश्लेषक तो यह भी कहते हैं कि जो नेता सत्तारूढ़ दल से समझौता कर लेता है, वह पाक साफ बन जाता है, यानी उस पर जांच एजेंसियां कोई कार्रवाई नहीं करतीं। इसका अर्थ है कि विपक्ष को कमजोर करने की एक बड़ी साजिश रची गई है। चुनावी समीकरण को देखते हुए यह संदेह गलत भी नहीं लगता। 
वैसे, झारखंड में जब से हेमंत सोरेन की सरकार बनी, तभी से षड्यंत्र के तहत उनको फंसाने की कोशिश शुरू हो गई थी। षड्यंत्रकारी यह भी नहीं चाहते हैं कि आदिवासी समुदाय से कोई मुख्यमंत्री बने और लोगों के हक-अधिकारों को धरातल तक पहुंचाए। यही वजह है कि यहां की पिछली सरकार के समय कई घोटाले हुए और आदिवासियों को सरकारी नीतियों से बाहर रखने का प्रयास किया गया। स्थानीय नीति, नियोजन नीति नहीं बनाई गई और न ही इस बात को लेकर कोई ठोस प्रयास किया गया। वोट की राजनीति करते हुए पिछली सरकार ने इस राज्य में बाहरी लोगों की आमद बढ़ा दी, जिससे जनसांख्यिकीय बदलाव की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, स्थानीय लोगों के हक में सेंधमारी की एक बड़ी वजह यह है कि मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से बहुत वाकिफ नहीं हैं। दक्षिण भारत में स्थानीयता को खत्म करने का कोई प्रयास इसलिए सफल नहीं होता, क्योंकि वहां जनता जागरूक है और वे खुलकर इसका विरोध करते हैं। उत्तर भारत में ऐसा नहीं है। यहां वोटों का समीकरण देखकर ही राजनीतिक षड्यंत्र रचा जाता है। अगर यहां के लोग अपनी लोकतांत्रिक चेतना जागृत कर लें और धर्म व जाति के आधार पर अपने विकास की सोचें, तो यहां भी राज्य सरकारों के खिलाफ कोई षड्यंत्र सफल नहीं हो सकता। इस बार जब फिर से पैर पर कुल्हाड़ी पड़ी है, तो क्या उम्मीद की जाए कि लोगों को होश आएगा? अगर ऐसा होता है और वे समझ जाते हैं कि झारखंड व यहां के लोगों को कौन कमजोर करके सत्ता पाने की लालसा संजो रहा है, तो यकीनन यहां भी किसी तरह का राजनीतिक षड्यंत्र सफल नहीं हो सकेगा।
ओमप्रकाश, टिप्पणीकार

 

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