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मतदान अनिवार्य करने मेें क्या हर्ज

आम चुनाव के चार चरण पूरे होने के बाद कुल 543 सीटों में से 379 पर मतदान संपन्न हो गया है। अब 164 सीटों पर मतदान बाकी है, जो शेष बचे तीन चरणों में पूरे होंगे। ये चुनाव भी गुजरे चरणों की तरह...

मतदान अनिवार्य करने मेें क्या हर्ज
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 14 May 2024 11:13 PM
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आम चुनाव के चार चरण पूरे होने के बाद कुल 543 सीटों में से 379 पर मतदान संपन्न हो गया है। अब 164 सीटों पर मतदान बाकी है, जो शेष बचे तीन चरणों में पूरे होंगे। ये चुनाव भी गुजरे चरणों की तरह शांतिपूर्वक निपट जाएंगे और सभी की निगाहें 4 जून पर लग जाएंगी, जब मतगणना का कार्य होगा और 18वीं लोकसभा के गठन का रास्ता साफ हो जाएगा। मगर सवाल यह है कि इस बार पिछले आम चुनाव के मुकाबले कम मत क्यों डाले जा रहे हैं? मतदान के प्रति लोगों में क्यों उदासीनता आ रही है? क्या इसे दूर करने की गंभीर कोशिशें हो रही हैं? खबरों की मानें, तो अब तक हर तीन में से एक मतदाता मत नहीं डाल रहा। अब इसकी मूल वजह क्या है, यह तो गहन अध्ययन से ही पता चल सकेगा, लेकिन इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए चुनाव आयोग को सख्त कदम उठाने चाहिए। दरअसल, कई लोगों में यह सोच घर कर रही है कि उनके एक वोट से आखिर होगा क्या? यह प्रवृत्ति खतरनाक है, क्योंकि हर एक वोट की कीमत है। अगर वोट नहीं डाले जा रहे, तो समझिए लोकतंत्र में हम अपनी अनास्था प्रकट कर रहे हैं। ऐसे में, मतदान को कानूनी रूप से अनिवार्य करने वाली व्यवस्था अपनाने में भला क्या हर्ज है? तभी आम लोगों की सहभागिता चुनाव में बढ़ेगी और वास्तव में एक बहुमत वाली सरकार हम देख सकेंगे। हमें अब अनिवार्य मतदान जैसी व्यवस्था की ओर बढ़ना ही चाहिए।
विभूति बुपक्या, टिप्पणीकार

कई देशों में यह व्यवस्था
अनेक देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है और यह विचार नया नहीं है। सबसे पहले 1893 में बेल्जियम ने इसे स्वीकार किया, जिसके बाद 1914 में अर्जेंटीना में और 1924 में ऑस्ट्रेलिया में इसकी व्यवस्था की गई। आज ऐसी व्यवस्था 30 से भी अधिक देशों में है। उनका सीधा तर्क है कि जिस आजादी या मताधिकार को हजारों बलिदान के बाद प्राप्त किया जाता है, उसके प्रति जब जागरूकता न हो, तो शासन या राज्य को ऐसा प्रावधान करना चाहिए कि जो मतदान में लगातार हिस्सा लें, उनको बढ़ावा दिया जाए और जो जान-बूझकर मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं होते, उनके लिए दंड की व्यवस्था हो। यह नहीं भूलना चाहिए कि संसदीय लोकतंत्र की आत्मा है मतदान, जिसके कारण शासन या सत्ता सामने आती है और उसके द्वारा लिए गए तमाम निर्णयों से न केवल वे लोग, जिन्होंने मतदान किया है, बल्कि जिन्होंने मत नहीं डाला है, वे भी समान रूप से प्रभावित होते हैं।
सरफराज अहमद, टिप्पणीकार

मतदाताओं में बेवजह तनाव बढ़ेगा
यह सच है कि इस बार पिछले चुनाव जैसा उत्साह लोगों में नहीं दिख रहा, पर इसकी वजह सिर्फ यह नहीं कि लोगों का मतदान के प्रति आकर्षण कम हो गया है। कुछ लोग बेशक मतदान के दिन छुट्टी का आनंद लेना पसंद करते हैं, पर एक बड़ी आबादी घंटों लाइन में लगकर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करती है। इसकी पुष्टि मतदान प्रतिशत से भी होती है। इसलिए, मतदान की बाध्यकारी व्यवस्था मतदाताओं में बेवजह का तनाव पैदा कर सकती है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस बार चुनाव में मुद्दों का अभाव है। सत्ता पक्ष के पास नया कहने को कुछ नहीं है, जबकि विपक्ष रटे-रटाए वायदे कर रहा है। बढ़ती गरमी भी एक बड़ी वजह है। कई बुजुर्ग इसलिए मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंच पा रहे, क्योंकि वे शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं और स्थानीय तंत्र ने उनको मतदान केंद्र तक पहुंचाने की विशेष व्यवस्था नहीं की। अगर उनके लिए चुनाव आयोग ने कोई व्यवस्था कर रखी है, तो वह लोगों की जानकारी में नहीं है, यह भी तंत्र की निष्क्रियता ही है। मतदान प्रक्रिया को अत्याधुनिक तकनीक से जोड़ने की भी जरूरत है। ऑनलाइन वोटिंग जैसी व्यवस्था अब अपने देश में की जानी चाहिए, क्योंकि ऑनलाइन रहने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
बहरहाल, अगर हम कुछ विकल्पों पर गौर करें, तो अनिवार्य मतदान जैसे प्रावधानों से दूर रहकर भी मतदान-प्रतिशत में उल्लेखनीय सुधार कर सकते हैं। मसलन, एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था अपनाना, जिस पर देश भर में गंभीर विमर्श चल भी रहा है। मतदान की अवधि को कम करना (इस बार भी करीब दो महीने की यह प्रक्रिया है, जिसे घटाकर 15 दिन किया जाना चाहिए), गांव-मोहल्लों में जागरूकता कैंप लगाना, चुनावी ड्यूटी में लगे कर्मचारियों-अधिकारियों की तरह मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए मतदाताओं को साधन उपलब्ध कराकर भी हम मतदान-प्रतिशत बढ़ा सकते हैं।
यह समझना होगा कि कानूनी डंडे से हम सभी को चुनावी-प्रक्रिया से नहीं जोड़ सकते। जब तक अपने अंतस से वे इससे नहीं जुड़ेंगे, तब तक मतदान-प्रक्रिया से वे दूर रह सकते हैं। इसीलिए, मतदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के नए-नए उपायों पर हमें गौर करना चाहिए। चुनाव आयोग यदि इन सबकी तरफ ध्यान देता है, तो इसके दूरगामी असर दिख सकते हैं और मुमकिन है कि 2029 के आम चुनाव में मतदान-प्रतिशत में काफी ज्यादा उछाल देखने को मिले। मगर क्या आयोग अपना हाथ बढ़ाएगा? अभी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता।
महिमा सिंह, टिप्पणीकार 

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