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यह कविता साहित्यिक अपराध जैसी

इन दिनों सोशल मीडिया पर दिल्ली के एक महिला महाविद्यालय में आयोजित की जाने वाली भाषण प्रतियोगिता का पोस्टर वायरल है, जिसमें प्रतियोगिता का विषय लिखा गया है- अपनी जगह से गिरकर/ कहीं के नहीं रहते/ केश...

यह कविता साहित्यिक अपराध जैसी
Monika Minalहिन्दुस्तानThu, 22 Feb 2024 10:33 PM
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इन दिनों सोशल मीडिया पर दिल्ली के एक महिला महाविद्यालय में आयोजित की जाने वाली भाषण प्रतियोगिता का पोस्टर वायरल है, जिसमें प्रतियोगिता का विषय लिखा गया है- अपनी जगह से गिरकर/ कहीं के नहीं रहते/ केश, औरतें और नाखून...।  विवाद इसी विषय पर है, जो असल में एक कविता की पंक्ति है, जिसकी कवयित्री हैं अनामिका। अब आयोजक ने क्या सोचकर यह विषय रखा, यह तो वही जानते होंगे, लेकिन विवाद होने के बाद भाषण प्रतियोगिता स्थगित करने की भी खबर है, बावजूद इसके इस प्रकरण से साहित्यिक दुनिया में उथल-पुथल मच गई है। देखा जाए, तो यह कविता ही एक साहित्यिक अपराध है। इसमें जिस संस्कृत श्लोक का उल्लेख हुआ है, वह सही नहीं लिखा गया है। वह इस तरह से है- स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ता: केशा नखा नरा:। इति विज्ञाय मतिमान: स्वस्थानं न परित्यजेत्।।  इस श्लोक में कहीं भी औरत का जिक्र नहीं है। श्लोक के अनुसार, इसका अर्थ यह है कि स्थान-भ्रष्ट होकर या अपनी जगह से गिरकर केश, दांत, नाख़ून और मनुष्य शोभते नहीं, इसीलिए बुद्धिमान लोग अपना स्थान नहीं त्यागते। यहां स्त्री है, लेकिन वह मनुष्य में शामिल है। यही इस श्लोक का अर्थ अथवा भाष्य है। यदि अध्यापक इसका गलत अर्थ करते थे, तो इस बात का जिक्र या आभास कविता में कहीं होना चाहिए था, अन्यथा मूल कवि और कविता के साथ अन्याय होता है, और यह भी कहा जा सकता है कि संस्कृत स्त्री-विरोधी भाषा है। वैसे भी श्लोक को बदलना अपराध है। मुझे यहां वीरेन डंगवाल की एक कविता याद आती है- कुछ कद्दू चमकाए मैंने। अनामिका भी यहां अपना नारीवाद का कद्दू चमका रही हैं। आप कद्दू चमकाइए, पर किसी श्लोक की नाक तो चाकू से मत काटिए।
कृष्ण कल्पित, टिप्पणीकार

गिरता स्तर
कवयित्री अनामिका की कविता पर दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ा ताजा विवाद न सिर्फ लेखिका के, बल्कि विश्वविद्यालय के गिरते स्तर का भी संकेत है। लेखिका को कुछ हद अभिव्यक्ति की आजादी की छूट मिल सकती है, लेकिन कोई महाविद्यालय कैसे नारी-विरोधी विषय पर इस तरह भाषण-प्रतियोगिता आयोजित करवा सकता है? यह बताता है कि पुरुष वर्चस्ववादी कुंठा अब भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। जब भी पुरुषों को मौका मिलता है, वे महिलाओं को कुचलने का अवसर जाया नहीं होने देते। 
कीर्ति, टिप्पणीकार  

इसका भावार्थ न समझना दुर्भाग्यपूर्ण
साहित्य अकादेमी पुरस्कृत साहित्यकार अनामिका की एक कविता पर इन दिनों बेवजह का विवाद किया जा रहा है। इस कविता को यदि आप पूरा पढ़ेंगे, तो समझ सकेंगे कि इसमें कैसे उस संस्कृत शिक्षक पर कटाक्ष किया गया है, जो महिलाओं को बेहद तंग नजरिये से देखता है और पूरी कक्षा को उसी नजर से देखने की नसीहत देता है। अनामिका ऐसी ही एक कक्षा का दृश्यांकन अपनी इस कविता में करती हैं। इस कविता को पढ़कर आप यह साफ-साफ महसूस करेंगे कि लेखिका ने किस तरह बताया है कि शुरुआती उम्र में ही श्रेष्ठता बोध की ग्रंथि आपके भीतर रोप दी जाती है, जो आगे चलकर पुरुष वर्चस्ववादी समाज का मजबूत आधार बन जाती है। मगर अफसोस, इस भावार्थ को समझने में कई लोग नाकाम रहे और दिल्ली के एक महाविद्यालय के भाषण प्रतियोगिता के बहाने लेखिका और उसकी रचना पर हमलावर हो उठे। अब तो कई लोग इस कविता मेें संस्कृत श्लोक के गलत प्रयोग पर भी नाराजगी दिखा रहे हैं, जबकि अपनी बात रखने के लिए किया गया भाषायी बदलाव है यह, जिसका हक हर रचनाकार को होता है। 

यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि हम कितने संकीर्ण हो गए हैं। हमारी समझ का दायरा इतना संकुचित हो गया है कि हम किसी रचना की व्यापकता देख ही नहीं पाते। यही कारण है कि अनामिका जिस कविता में असहमति और प्रतिरोध की बात कह रही हैं, उसमें हम उनकी सहमति के संकेत देख रहे हैं। कितना एकहरापन है यह? इससे यह भी पता चलता है कि आभासी दुनिया कितनी तंग है। यहां समझ का निहायत अभाव है। मैंने यहां बड़े से बड़े लोगों को भी समझदारी के स्तर पर कंगाल देखा है। इसी कविता पर जिस तरह की टीका-टिप्पणी की जा रही है, वह बताता है कि लोगों ने पूरी कविता पढ़ी ही नहीं, सिर्फ शुरुआती तीन पंक्तियों से अपनी राय बना ली, और यह राय भी ऐसी, जो कविता की मूल भावना के बिल्कुल खिलाफ है। 
यह पूरा प्रकरण ही दुर्भाग्यपूर्ण है। मेरा मानना है कि इस विषय पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित की जा सकती थी। इसके पक्ष और विपक्ष में जब तर्क पेश किए जाते, तो मुमकिन है कि इस कविता का एक नया फलक हम सबके सामने खुलता। मगर ऐसा नहीं हो सका और एक अनावश्यक विवाद ने एक बड़ा अवसर हमारे हाथ से छीन लिया। अब यह उम्मीद ही की जा सकती है कि लोग इस कविता को पूरा पढ़ेंगे, और तब अपनी राय बनाएंगे। इससे सुधी पाठकों को भी काफी कुछ समझने का मौका मिलेगा।
    कमलकांत, टिप्पणीकार 

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