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यह हमारी पुरानी अयोध्या नहीं

अयोध्या को जो लोग पहले से जानते हैं, उनको पता होगा कि बीते एक दशक में यहां क्या कुछ बदला है? हम सबके प्यारे रामलला, जो पहले टेंट में रहा करते थे, अब महलनुमा मंदिर में रहने लगे हैं। मंदिर के नजदीक ही..

यह हमारी पुरानी अयोध्या नहीं
Monika Minalहिन्दुस्तानSun, 09 Jun 2024 08:06 PM
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अयोध्या को जो लोग पहले से जानते हैं, उनको पता होगा कि बीते एक दशक में यहां क्या कुछ बदला है? हम सबके प्यारे रामलला, जो पहले टेंट में रहा करते थे, अब महलनुमा मंदिर में रहने लगे हैं। मंदिर के नजदीक ही इतनी सारी आर्थिक गतिविधियां चलने लगी हैं कि भक्तों के साथ-साथ आसपास के लोगों को भी पर्याप्त लाभ मिल रहा है। यहां भक्तों का भारी संख्या में आना स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने का काम कर रहा है। इतना ही नहीं, यहां विकास-कार्यों को भी काफी गति दी गई है। सड़कों में सुधार हुआ है और बुनियादी ढांचे पहले से बेहतर हुए हैं, फिर भी लोगों को सरकार का कामकाज पसंद नहीं आया, जो बिल्कुल ही समझ से परे है। इससे यही लग रहा है कि यह पुरानी अयोध्या नहीं है। ऐसा इसलिए भी लगता है, क्योंकि फैजाबाद ही नहीं, जिस निर्वाचन-क्षेत्र का अयोध्या हिस्सा है, आसपास की तमाम सीटों पर एनडीए गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा है। यह ठीक है कि चुनाव में किसी को हार, तो किसी को जीत मिलती है और जनता के मत का हमेशा सम्मान होना चाहिए, लेकिन लोगों को भी यह सोचना चाहिए कि जो पार्टी उनके हितों में काम कर रही है, वे उसे प्रोत्साहित करें। इससे पार्टियों का मनोबल बढ़ता है और वे जनता के हित में कहीं अधिक गंभीरता से काम करती हैं। जब जनता काम करने वाले नेताओं को प्रोत्साहित नहीं करेगी, तो फिर जनहित के काम कोई क्यों करेगा? देखा जाए, तो इस बार यहां के मतदाताओं ने एक बड़ी गलती कर दी है। उनको उसी दल के उम्मीदवारों को संसद भेजना चाहिए, जो यहां अनवरत काम कर रहा है। इसलिए, आज यदि ‘बायकॉट अयोध्या’ जैसी मुहिम चल रही है, तो मुझे गलत नहीं जान पड़ता। अयोध्यावासी इसी के हकदार हैं। उनको अपनी गलती का एहसास होना चाहिए।
कुणाल शर्मा, टिप्पणीकार
बहिष्कार अनिवार्य
अयोध्या का निस्संदेह बहिष्कार होना चाहिए। मेरा तो यही मानना है कि आप अयोध्या बेशक जाएं, लेकिन अपनी गाड़ी से। खाना-पीना अपने पास रखें, स्थानीय दुकानदारों से कुछ न खरीदें। मंदिर प्रांगण में जाकर रामलला के दर्शन कीजिए, अपने जनपद या गांव से लाया हुआ चढ़ावा चढ़ाइए और वापस लौट जाइए। अगर कुछ दान देना चाहते हैं, तो दान-पेटी में ही दीजिए, किसी स्थानीय ब्राह्मण को मत दीजिए। मंदिर प्रांगण से बाहर किसी भी प्रकार का आर्थिक लेन-देन न करें। जो खता अयोध्यावासियों ने इस चुनाव में की है, उसकी सजा उनको मिलनी ही चाहिए। 
पंकज कुमार सिंह, टिप्पणीकार

चुनावी नतीजों से अपना आपा न खोएं
अयोध्या के चुनाव परिणाम को लेकर अनेक आतुर प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। इनमें से अधिकांश निराधार, अवमाननापरक और कुंठा से भरी हुई हैं। निंदा और प्रशंसा, दोनों ही भावों से अयोध्या का तिरस्कार न केवल अविवेकपूर्ण, अपितु अपराध भी है। भूलोक की प्रथम पुरी यह विश्वविश्रुता अयोध्या ही है, जिसने धर्मविग्रह पुत्र को प्रकट किया, उसे तपाकर मर्यादा पुरुषोत्तम का गौरव दिया और राजा राम के रूप में मानव-चेतना में अनंत काल के लिए अमर कर दिया। 
ये अयोध्यावासी ही हैं, जिन्होंने अपने राम के लिए असह्य दुख सहे, त्याग किए और जिनको अपना कहकर श्रीराम ने अपने को बहुमानित समझा। यही अयोध्या है और यही श्रीराम का नाम, जिसने भारत देश को सारे समीकरणों और अनुमानों के पार कल्पनातीत शक्ति व सत्ता का बल दिया और इस लोकतांत्रिक राजनीति की चंचल चालों के बीच तीसरी बार पुन: बहुमत दिया है। यही अयोध्या है, जिसको केंद्र में रखकर भारत देश अपनी स्वायत्तता, संप्रुभता और खोया हुआ स्वाभिमान पुन: प्राप्त कर रहा है। इसी अयोध्या की रज में विश्व का श्रेष्ठतम कहलाने वाला नेता साष्टांग कर जाता है। मगर यह अयोध्या किसी राजनीतिक दल, किसी राजनेता अथवा किसी एक घटना से परिभाषित नहीं होती। इसने अपने राम को वन जाते देखा है, इसने धर्मधुरंधर महाराज दशरथ को बिलख-बिलखकर देह-त्याग करते देखा है। इसने अपने राम के लिए 14 वर्षों तक दु:साध्य तप किया है और फिर उनको घर लौटाकर सिंहासनाधिरूढ़ किया है, उनका विरुद गान किया है।
अयोध्या किसी के हारने या जीतने से उसकी या परायी नहीं हो जाती। यह बस उनकी है, जो श्रीराम के हैं। यह अपने सत्य की प्रतिष्ठा के लिए अपने राम को भी वन भेज देती है, क्योंकि इसका नाम ही सत्या है। इसको अभिशप्त और धोखेबाज कहने वाले अपरिपक्वबुद्धि इसका नाम भी ठीक से न जानते होंगे, इसलिए किसी आवेग में आकर आप आपा न खोयें। राजनीति की क्षणभंगुर उठापटक को देखकर सनातन अवधारणाओं को लांछित न करें। श्रीराम और भगवती सीता की कल्पित कथाओं और तुकबंदियों के छल से मनुष्यता की राजधानी का अपमान न करें। इस बीच कुछ लोग अपनी कुंठाएं व्यक्त करने लगे हैं कि सही मुहूर्त में प्रतिष्ठा न होने का दुष्परिणाम है यह। ऐसी निराधार बातें केवल आपकी, अपितु रामत्व की मर्यादा के भी प्रतिकूल है। सकृत प्रनामु किहें अपनाये...  वाली उदारकीर्ति वाले प्रभु को मुहुर्त से परिभाषित करने से बचें। आपकी यह ‘सियासी वफादारी’ न केंद्र की सरकार को पसंद आएगी और न राज्य सरकार को।
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण, गुरु