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Hindi News ओपिनियन साइबर संसारसुरक्षाकर्मियों का यह रवैया स्वीकार्य नहीं

सुरक्षाकर्मियों का यह रवैया स्वीकार्य नहीं

सांसद कंगना को थप्पड़ मारने वाली सुरक्षाकर्मी का वीडियो वायरल है, जिसमें वह कह रही है, जब कंगना ने गलत बयान दिया था, मेरी मां वहां (आंदोलन स्थल) पर बैठी थी। कंगना ने कहा था कि आंदोलन में शामिल महिलाएं.

सुरक्षाकर्मियों का यह रवैया स्वीकार्य नहीं
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Monika Minalहिन्दुस्तानMon, 10 Jun 2024 09:34 PM
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मैं भी किसान हूं, लेकिन किसी भी हिंसा या गैर-विधिक कार्य का समर्थन नहीं करता। जवानों को भावनात्मक रूप से कमजोर नहीं होना चाहिए, बल्कि कानून के मुताबिक अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। अगर किसी के गलत बयान से भावना को ठेस पहुंची है या किसी ने कोई अपराध किया है, तो ठेस पहुंचाने वाले या कथित अपराध करने वाले के विरुद्ध कानून के मुताबिक कार्रवाई की जा सकती है। सजा या दंड देने का काम न्यायालय का है, हम स्वयं किसी प्रकार का दंड या सजा नहीं दे सकते। अगर ऐसा करते हैं, तो कानून की नजर में हम स्वयं दंड के भागी हैं। फिर यह भी समझिए कि सुरक्षा बलों में तमाम धर्मों, जातियों, विचारधाराओं के लोग होते हैं, मगर उनके लिए वर्दी पहनने का एकमात्र पैमाना होता है, उनका भारतीय होना। ऐसे में, यदि कोई जवान किसी विपरीत विचार वाले लोग पर हमला करता है, तो इससे पूरे समाज में सुरक्षा बलों के प्रति अविश्वास पैदा होगा। सुरक्षाकर्मियों की पहुंच नेताओं के शरीर तक होती है, तो क्या जब कोई दक्षिणपंथी सुरक्षाकर्मी किसी विपरीत विचारधारा के नेता पर हमला करेगा, तब भी उसका यह कहकर बचाव किया जाएगा कि वह कर्मी उस नेता के बयान से नाराज था? बयानों के संदर्भ में नाराजगी का कोई अंत नहीं, इसलिए इस कृत्य को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसी तरह के विपरीत विचारों ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की बलि ली है, लिहाजा सुरक्षा बलों के लिए तय मानदंडों से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। 
परमेश्वर पिलानिया, टिप्पणीकार

कई तरीके हैं विरोध के
अभिनेत्री से सांसद बनी कंगना के विरोध में की जा रही टीका-टिप्पणियों से ऊपर उठने की जरूरत है। हिंसा इतनी हो या उतनी, उसके बीज का आकार एक ही तरह का होता है, जिसके बड़े होने में कोई वक्त नहीं लगता। सीआईएसएफ की सुरक्षाकर्मी एयरपोर्ट पर थप्पड़ जड़ने के लिए तैनात नहीं की गई थीं, बल्कि उनका कर्तव्य थप्पड़ जड़ने वालों को रोकना था। उस महिला सुरक्षाकर्मी के पास विरोध दर्ज करने के कई अन्य लोकतांत्रिक रास्ते थे, लेकिन उसने उन रास्तों पर गौर न करके हिंसा का सहारा लिया। ऐसी हिंसा का समर्थन करने वाले स्वयं के भीतर भी एक हिंसात्मक प्रवृत्ति का समर्थन कर रहे हैैं। हालांकि, यह घटना इतनी भी बड़ी नहीं कि उस महिला की तुलना इंदिरा या राजीव गांधी के हत्यारों से की जाए। असामान्य घटना जरूर है, मगर तुलना योग्य नहीं। इस नैरेटिव को छोड़ना ही उचित होगा।
राकेश भट्ट, टिप्पणीकार

नेताओं के बोल भी संयमित होने चाहिए 
सीआईएसएफ की महिला जवान ने नई-नई सांसद बनी एक अभिनेत्री को एयरपोर्ट पर थप्पड़ जड़ दिया, जो निंदनीय कृत्य है। वह जनता की चुनी हुई प्रतिनिधि हैं और उनके साथ ऐसा सुलूक नहीं होना चाहिए था। मगर सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जो कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं। सवाल है, आखिर महिला सुरक्षाकर्मी ने ऐसा क्यों किया? दरअसल, नेताओं या सेलिब्रिटी को संभलकर बोलना चाहिए। उनकी टिप्पणी ऐसी होनी चाहिए कि किसी के स्वाभिमान को ठेस न लगे। नेताओं को यह समझना चाहिए कि कोई अगर उनका विरोध करता है या सरकार के खिलाफ आंदोलन करता है, तो वह संविधान से हासिल अधिकारों के तहत ही करता है। बकौल मुंशी प्रेमचंद, ‘लोग कहते हैं, आंदोलन, प्रदर्शन, जुलूस निकालने से क्या होता है? इससे सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं।’ अभिनेत्री सांसद ने किसान आंदोलन के दौरान फिजूल टिप्पणी की थी। ऐसी टिप्पणी से स्वाभाविक ही उस महिला सुरक्षाकर्मी के स्वाभिमान को ठेस लगी और उसने प्रतिक्रिया में तमाचा मार दिया। इस घटना का सबक यही है कि नेताओं को सोच-समझकर बोलना चाहिए। हर किसी को गद्दार, देशद्रोही, आतंकवादी, खालिस्तानी आदि बता देना मुनासिब नहीं। वास्तव में, यह थप्पड़ ऐसी मानसिकता के ही खिलाफ है।
हेमा हरि उपाध्याय, टिप्पणीकार

मां का अपमान बर्दाश्त नहीं
सांसद कंगना को थप्पड़ मारने वाली सुरक्षाकर्मी का वीडियो वायरल है, जिसमें वह कह रही है, जब कंगना ने गलत बयान दिया था, मेरी मां वहां (आंदोलन स्थल) पर बैठी थी। कंगना ने कहा था कि आंदोलन में शामिल महिलाएं 100-100 रुपये लेकर धरने में बैठी हैं। उस वक्त किसान तीन काले कानूनों को लौटाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर आंदोलित थे, लेकिन उन पर तमाम गंदे कमेंट किए थे। तब किसानों की आवाज को किसी ने ध्वनि नहीं दी। मनदीप पूनिया जैसे पत्रकार को जेल की यात्रा करनी पड़ी। ये हालात कमोबेश हर आंदोलन के साथ हुए हैं। हर आंदोलन को हेकड़ी, हिकारत और क्रूरता से कुचला गया। आंदोलनकारियों और उनके समर्थन में बोलने वालों को मां-बहन की गालियां मिलीं। आम इंसान की चमड़ी नेताओं व ट्रोल्स की तरह मोटी नहीं होती। एक-एक गाली उसे दिल पर लगती है। उसकी गांठ स्थिर रह जाती है। अब इसका ‘पे बैक टाइम’ है। लोग पंजा खोलकर इंतजार कर रहे हैं। बेशक, हिंसा और कर्तव्यहीनता से मेरी असहमति है, लेकिन स्वाभिमान और हिम्मत को मेरा सलाम है। 
मनीष, टिप्पणीकार