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महिला क्रिकेटरों का कहीं जिक्र नहीं

बधाई तो बनती है! राधा यादव बनीं प्लेयर ऑफ द सीरीज। बात बांग्लादेश में खेली गई पांच मैचों की ट्वंटी-20 क्रिकेट शृंखला की है, जिसमें भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने बांग्लादेश की टीम को 5-0 से पराजित कर...

महिला क्रिकेटरों का कहीं जिक्र नहीं
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 15 May 2024 10:51 PM
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बधाई तो बनती है! राधा यादव बनीं प्लेयर ऑफ द सीरीज। बात बांग्लादेश में खेली गई पांच मैचों की ट्वंटी-20 क्रिकेट शृंखला की है, जिसमें भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने बांग्लादेश की टीम को 5-0 से पराजित कर दिया। इस शृंखला में कुल 10 विकेट लेकर हीरो बनीं राधा यादव, जिनको आखिरी मुकाबले में प्लेयर ऑफ द मैच का खिताब भी मिला। मगर इन सबमें मुख्य बात यह है कि पुरुष खिलाड़ियों की एक जीत पर हर तरफ से बधाइयों का तांता लग जाता है, लेकिन इन महिला क्रिकेटरों की ऐतिहासिक जीत को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। यह वाकई शोचनीय मसला है। खैर, इतनी जल्दी कहां समाज में कोई बदलाव आता है। यहां बेटियां हर रोज खुद को साबित करने में लगी हैं। देखते हैं, कब तक हमारा समाज इस बात को मानता है!
आर्यन रनवी, टिप्पणीकार

उनको भी पूरा सम्मान मिले 
बेहतरीन खेल दिखाया भारत की बेटियों ने बांग्लादेश में। पांच मैचों की सीरीज में उन्होंने सभी मैच भी जीते व क्रिकेटप्रेमियों के दिल भी। मगर यह चिंतनीय विषय है कि हमारे देश के क्रिकेटप्रेमियों का इस ओर ध्यान नहीं गया। यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि अभी देश में आईपीएल चल रहा है, लेकिन क्या जितना प्रेम हम पुरुष क्रिकेटरों से करते हैं, उतना ही स्नेह महिला खिलाड़ियों को भी नहीं मिलना चाहिए? आखिर उनकी जीत भी तो राष्ट्र की जीत है और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती धमक का संकेत है! एक सच्चा क्रिकेटप्रेमी यह नहीं देखता कि जीतने वाला खिलाड़ी महिला है या पुरुष। अगर उस खिलाड़ी ने देश का नाम रोशन किया है, तो उसे हाथोंहाथ लिया जाना चाहिए। मगर महिला क्रिकेटरों को यह नसीब नहीं हुआ। कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि देश अभी आम चुनाव में व्यस्त है, इसलिए इस ओर ध्यान नहीं गया। मगर हम देख रहे हैं कि आईपीएल मैचों के दर्शकों की संख्या करोड़ों में है और मीडिया में भी उसे पूरी जगह मिल रही है। इस पूरे मामले में बीसीसीआई का रवैया समझ से परे नजर आया। उसने ऑनलाइन लाइव कमेंट्री के अलावा कुछ नहीं किया, जबकि इस सीरीज में आशा शोभना का ऐतिहासिक डेब्यू हुआ, हरमनप्रीत कौर ने अपना 300वां अंतरराष्ट्रीय मैच खेला, शेफाली वर्मा ने 100वां अंतरराष्ट्रीय मैच खेला और शेफाली व स्मृति मंधाना की जोड़ी महिला टी-20 मैच में भारत के लिए दो हजार रनों की साझेदारी करने वाली पली जोड़ी बनी। साफ है, हर मोर्चे पर महिला खिलाड़ियों की अनदेखी की गई, जो कतई उचित नहीं है।
सुजीत कुमार, टिप्पणीकार

पुरुष खिलाड़ियों के समान सुविधा
यह सही है कि भारत में लंबे समय से महिला खिलाड़ियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किए जाने की बातें कही जाती रही हैं, लेकिन बीते कुछ समय से लैंगिक समानता लाने के कई प्रयास किए गए हैं, जो सराहनीय हैं। इनमें सबसे जरूरी प्रयास समान वेतन का है, जिसकी घोषणा करते हुए बीसीसीआई के सचिव ने कहा था, हम अनुबंधित बीसीसीआई महिला क्रिकेटरों के लिए समान वेतन की नीति लागू कर रहे हैैं। अब पुरुष और महिला क्रिकेटरों के लिए मैच फीस समान होगी, क्योंकि लैंगिक समानता के एक नए युग में भारतीय क्रिकेट प्रवेश कर रहा है। इसी तरह, ‘वीमेंस प्रीमियर लीग’, यानी डब्ल्यूपीएल की शुरुआत भी महिला क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए काफी फायदेमंद साबित हुई है। डब्ल्यूपीएल का आगाज पिछले वर्ष हुआ था और इस साल फरवरी-मार्च में इसका दूसरा संस्करण खेला गया। इसका एक बड़ा फायदा यह हुआ है कि इसने देश की महिला क्रिकेटरों के सपने को नए पंख दिए। अब कई खिलाड़ी मैदान में उतर रहे हैं और उनको प्रदर्शन के हिसाब से उचित पारिश्रमिक भी मिल रहा है। 
रही बात बांग्लादेश शृंखला की, तो देश में आईपीएल और आम चुनाव साथ-साथ चल रहे हैं। किसी भी अन्य क्रिकेट शृंखला से महत्वपूर्ण आईपीएल के मैच माने जाते हैं, इसी तरह आम चुनाव भी पांच साल में एक बार होने वाला सबसे अहम आयोजन है। ऐसे में, यह आरोप गलत है कि मीडिया महिला खिलाड़ियों की अवहेलना कर रहा है। हां, इन दोनों आयोजनों के मुकाबले उनको कम सुर्खियां मिल रही हैं, क्योंकि मीडिया में जगह की भी एक सीमा होती है। रही बात बीसीसीआई की, तो संस्था के सचिव ने खुद कहा है कि देश में महिला क्रिकेट जोर-शोर से बढ़ रहा है और ऐसा नहीं है कि इसे पुरुषों के मुकाबले कम तवज्जो मिल रही है। अलबत्ता, बीसीसीआई ने अपना ज्यादा ध्यान महिला क्रिकेट पर लगाया है और यह उसकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर है, क्योंकि इसका स्तर पुरुष खेल के समान ऊंचा करना है। यही कारण है कि महिला खिलाड़ियों की मैच फीस भी बढ़ाई गई है और उनकी कमाई भी अब पहले के मुकाबले ज्यादा हो रही है। इसीलिए सिर्फ एक शृंखला से किसी संस्था को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता। परिस्थिति के मुताबिक फैसले लिए जाते हैं। हां, अभी महिला खिलाड़ियों के लिए माहौल कुछ अलग है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उनको कोई कमतर आंका जा रहा है। इसलिए इस मसले पर बेजा विलाप नहीं होना चाहिए।
सुष्मिता, टिप्पणीकार