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प्रधानमंत्री का अभी कोई विकल्प नहीं

चलो मान ली तुम्हारी बात कि एनडीए नहीं आ रहा है अबकी बार, लेकिन यह तो बता दो कि आ कौन रहा है? किसके प्रधानमंत्री बनने के ख्याल से गुदगुदी हो रही है? राहुल गांधी? ममता बनर्जी? अरविंद केजरीवाल? अखिलेश...

प्रधानमंत्री का अभी कोई विकल्प नहीं
Monika Minalहिन्दुस्तानThu, 16 May 2024 11:14 PM
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चलो मान ली तुम्हारी बात कि एनडीए नहीं आ रहा है अबकी बार, लेकिन यह तो बता दो कि आ कौन रहा है? किसके प्रधानमंत्री बनने के ख्याल से गुदगुदी हो रही है? राहुल गांधी? ममता बनर्जी? अरविंद केजरीवाल? अखिलेश यादव? तेजस्वी यादव? पी विजयन? या फिर एमके स्टालिन? इनमें से कौन है, जो प्रधानमंत्री बनने के लायक है? अब यह न कहना कि कोई आसमान से टपकेगा? यह सोचकर खुश हो जाना एक बात है कि भाजपा की सरकार नहीं बन रही, लेकिन तब यह भी सोचना होगा कि बनेगी किसकी? और, क्या उस सरकार के मौजूदा नेताओं में देश चलाने की काबिलियत है? सच कहूं, तो भारतीय राजनीति में इस स्तर की विकल्पहीनता शायद पहली बार है, जब एक भी चेहरा नहीं दिखता, जिसकी प्रधानमंत्री के तौर पर कल्पना की जा सके!  इसलिए तरस आता है उन लोगों पर, जो मोदी विरोध में लहालोट हो रहे हैं, क्योंकि वे सिर्फ मोदी को हटाने तक सोच पा रहे हैं, बनेगा कौन उनकी जगह- इसका जवाब किसी के पास नहीं है। यही दुर्भाग्य है इस देश का! लोकतंत्र का! भारतीय राजनीति में मौजूदा विकल्पहीनता पर इस टिप्पणी को मेरी ‘व्यक्ति और पार्टी भक्ति’ के तौर पर मत देखिए। मेरा किसी पार्टी से कोई लगाव या दुराव नहीं है। मगर ‘व्यक्ति विरोध’ के नाम पर अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर नहीं रह सकता। सच तो यही है कि आज ‘ब्रांड मोदी’ ‘ब्रांड बीजेपी’ से बड़ा हो चुका है। अब यह आपकी मर्जी है कि आप इसे मानें या न मानें।
विवेक सत्य मित्रम, टिप्पणीकार

असाधारण कार्यकाल
पिछले दस साल बेमिसाल रहे हैं और पूरी दुनिया ने भारत का लोहा माना है। इन वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश अभूतपूर्व विकास का साक्षी बना है। इतना कि ‘अब मोदी का कोई विकल्प नहीं’ विपक्षी दलों के नेताओं के दिलो-दिमाग पर भी हावी हो चला है। ऐसा विश्वास है देश की जनता का अपने प्रधानमंत्री पर। निराशा से आशा की ओर बढ़ते कदम! आज समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के कल्याण की चिंता देश कर रहा है। गांधीजी का भी तो यही सपना था। जन-कल्याण की योजनाओं में भ्रष्टाचार रुका है। अब सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में राशि जा रही है और बीच में कमीशन या कट आदि पर प्रभावशाली तरीके से रोक लगी है। स्पष्ट है, नेतृत्वहीन, दिशाहीन और नीतिहीन नेतृत्व से निकलकर देश अब सशक्त हाथों में है, इसलिए आज नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प ही नहीं दिखता।
सागरिका चौधरी, टिप्पणीकार

विकल्पहीनता की स्थिति कभी नहीं रहती
दो दशक पहले की बात है। भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी अपनी सरकार के लिए जनादेश मांग रहे थे। तब ‘इंडिया शाइनिंग’, यानी भारत उदय एक ऐसा नारा बन चुका था, जो हर कोई दोहराता दिख रहा था। चुनावी हवा वाजपेयी के पक्ष में दिख रही थी। तमाम विमर्शों में यही कहा जा रहा था कि वाजपेयी साहब फिर से सरकार बना रहे हैं, क्योंकि उनके सामने विपक्ष का कोई चेहरा नहीं है। मगर उस कथित विकल्पहीनता की स्थिति में भी भाजपा की हार हुई और सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए गठबंधन सरकार बनाई। उस वक्त प्रधानमंत्री बनाए गए डॉ मनमोहन सिंह, जिनके नाम की कोई चर्चा न तो चुनाव से पहले हो रही थी और न नतीजों के बाद। ऐसी कथित राजनीतिक विकल्पहीनता का गवाह हम आपातकाल के बाद भी बन चुके हैं। यह वह दौर था, जब इंदिरा गांधी का कोई विकल्प नहीं बताया जाता था। ‘इंडिया इज इंदिरा ऐंड इंदिरा इज इंडिया’ जैसे जुमले गढ़े जा रहे थे। मगर 1977 के चुनाव में अपनी परंपरागत रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा और राज नारायण जैसे नेता ने उनको चुनावी मात दे दी।
स्पष्ट है, भारतीय राजनीति ऐसी घटनाओं की भी साक्षी है, जब चुनावी विश्लेषकों ने विकल्पहीनता का राग अलापा और जनादेश उनकी सोच के बिल्कुल विपरीत आया। जनता ने किसी न किसी में विकल्प ढूंढ़ ही निकाला। वास्तव में देखा जाए, तो यह दुनिया कभी विकल्पहीन हो ही नहीं सकती। भारतीय मतदाताओं ने भी इसे वक्त-वक्त पर साबित किया है। इसीलिए, अभी जो लोग विकल्पहीनता का राग अलाप रहे हैं, वे जरा भारत का राजनीतिक इतिहास पढ़ने की जहमत उठाएं। बेशक अभी वे राहुल, अखिलेश, ममता या अन्य नेताओं को मोदी का विकल्प न मान रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई दूसरा खड़ा नहीं हो सकता। विकल्पहीनता की बात कहकर दरअसल वे शासकीय विफलताओं को नजरंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे कुतर्कों और झूठ का भी सहारा लेने से नहीं हिचकिचाते। मेरा यही मानना है कि ‘विकल्प’ जैसे खूबसूरत-सम्मोहक और भारी भरकम शब्द की ओट में चालाकी या बेवकूफी करने के बजाय लोगों को सच का सामना करना चाहिए। उनको यह समझना चाहिए कि असलियत में बदलाव ही विकल्प है। अगर आप बदलाव के समर्थक हैं, तो आपको विकल्प दिखेगा, और यदि आप यथास्थिति के पक्षधर हैं, तो आप निरंतर विकल्पहीनता का ही विलाप करते रहेंगे। 
ज्योत्सना, टिप्पणीकार