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असली गुनहगार तो शिक्षा माफिया 

साल 2013 का वाकया है। यूपी पीजीटी (अंग्रेजी) की परीक्षा देने मैं कानपुर गई थी। तब प्रश्न पत्र में कुल 125 बहु-वैकल्पिक जवाब वाले सवाल थे। ओएमआर शीट, यानी उत्तर पुस्तिका पर रोल नंबर, नाम आदि बॉल पेन...

असली गुनहगार तो शिक्षा माफिया 
Monika Minalहिन्दुस्तानMon, 26 Feb 2024 11:12 PM
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साल 2013 का वाकया है। यूपी पीजीटी (अंग्रेजी) की परीक्षा देने मैं कानपुर गई थी। तब प्रश्न पत्र में कुल 125 बहु-वैकल्पिक जवाब वाले सवाल थे। ओएमआर शीट, यानी उत्तर पुस्तिका पर रोल नंबर, नाम आदि बॉल पेन से भरने थे और सही उत्तर के सामने बॉल पेन से पूरा गोला बनाना था। इससे पहले की परीक्षाओं में ओएमआर शीट में सही उत्तर पर एचबी पेंसिल से गोला लगाना होता था, लेकिन चूंकि नकल माफिया जिन अभ्यर्थियों से पैसा लिए होते, उनके गलत उत्तर रबड़ से मिटाकर सही उत्तरों पर पेंसिल से निशान लगा देते थे, लिहाजा पेंसिल के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। परीक्षा-कक्ष में मैंने देखा कि मेरे पास में कुछ हलचल हो रही है। मेरे करीब बैठा छात्र बगल वाले छात्र से अपनी उत्तर पुस्तिका बदल रहा था। तकरीबन एक घंटे में उसने पूरी उत्तर पुस्तिका भर दी और पुन: उस छात्र से अपनी पुस्तिका बदल ली। उस समय मुझे इस अदला-बदली का राज कुछ स्पष्ट समझ नहीं आया, लेकिन बाद में पता चला कि ऐसे लोग, जो पहले ही शिक्षक बन चुके हैं या कोचिंग सेंटर चला रहे हैं, वे अभ्यर्थियों से मोटी रकम लेकर उनके साथ फॉर्म भरते हैं, ताकि उन सभी का रोल नंबर आसपास रहे और उत्तर पुस्तिका का यह खेल करके वे परीक्षार्थियों को पास करा सकें।
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के आने के बाद मुझे विश्वास था कि इसमें पिछली सरकारों की तरह परीक्षा केंद्रों पर उत्तर पुस्तिकाओं की अदला-बदली नहीं होगी और साक्षात्कार में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। जहां तक मुझे जानकारी है, अब परीक्षा केंद्र में नकल और साक्षात्कार में धांधली करीब-करीब बंद हो चुकी है। मगर परीक्षा पेपर लीक होना अब भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। एक तरह से देखा जाए, तो इस बात का संतोष किया जा सकता है कि सरकार पेपर लीक की पुष्टि होते ही परीक्षा रद्द कर देती है, लेकिन जिस तरह से बार-बार पेपर लीक की घटनाएं सामने आ रही हैं, उससे छात्रों और अभिवावकों का समय व पैसा, दोनों बर्बाद हो रहा है। इसके अलावा, उनका सरकारी व्यवस्था में विश्वास भी कम हो रहा है। इससे सरकार की साख पर बट्टा तो लगता ही है। अब समय आ गया है कि पेपर लीक करने वाले दुष्ट लोगों की भी ‘गाड़ी पलटे’ और बुलडोजर बाबा शिक्षा माफिया को सचमुच ‘मिट्टी में मिला दें’,  ताकि भविष्य में कोई पेपर लीक गैंग लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की जुर्रत न कर सके। अभ्यर्थियों को न्याय मिलना चाहिए।
आशा विनय सिंह बैस, टिप्पणीकार

यह तंत्र की नाकामी का सीधा संकेत
उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती परीक्षा के प्रश्न पत्र के लीक होने का मसला साफ-साफ तंत्र की नाकामी का संकेत है। पहले तो यह माना ही नहीं जा रहा था कि प्रश्न पत्र लीक हुआ है, जबकि सोशल मीडिया पर पहले से ही सवाल तैरने लगे थे। फिर, फौरी कार्रवाई का भ्रम पैदा किया गया, मानो कोई खास गड़बड़ी नहीं हुई हो। यहां तक कि अभ्यर्थियों ने डराने-धमकाने के आरोप भी लगाए हैं। मगर जब विपक्ष व नौजवानों ने दबाव बनाया, तो परीक्षा को रद्द कर दिया गया। 
यह पूरा प्रकरण बताता है कि हमारा तंत्र कितना संवेदनहीन हो चुका है और वह भ्रष्टाचार में इस कदर डूब चुका है कि उसे सही-गलत का एहसास ही नहीं। यह देखते हुए भी कि लाखों नौजवान आक्रोशित हैं, तंत्र चुपचाप तमाशा देखता रहा। शायद वह अभ्यर्थियों के धैर्य का इम्तिहान ले रहा था। अच्छी बात यह है कि अभ्यर्थियों ने भी अपने सब्र का पूरा परिचय दिया और बिना किसी हिंसक या उग्र गतिविधि के अपनी बात भी मनवा ली।
वैसे, यह कोई अकेला मामला नहीं है। तमाम राज्यों में सरकारी भर्तियों में धांधलीबाजी होती है। इन नियुक्तियों को मानो पैसा कमाने का कारोबार बना लिया गया है। इसमें कभी शिक्षा माफिया शामिल होता है, तो कभी कोई बड़ा अधिकारी या नेता। हर बार कड़ी कार्रवाई का भरोसा अभ्यर्थियों को दिया जाता है, लेकिन हर बार वे खाली हाथ रहते हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब हिमाचल प्रदेश में गड़बड़ियों के कारण कर्मचारी चयन आयोग को ही भंग कर दिया गया था। इसकी जगह पर बनाए गए हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग द्वारा अब नई भर्तियां की जा रही हैं, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं को काफी फायदा पहुंचने की उम्मीद है। 
जब किसी की मेहनत पर पानी फिर जाता है, तो उसे कितना दर्द होता है, इसका अंदाजा सिर्फ वही लगा सकता है, जो खुद इन मुश्किलों से कभी गुजरा हो। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र-छात्राओं के लिए एक-एक परीक्षा अहम है। अगर किसी कारणवश वह परीक्षा रद्द हो जाए, तो अभ्यर्थियों की पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है। साफ है, एक चाक-चौबंद व्यवस्था हमें बनानी ही होगी। इसके लिए तंत्र को कहीं ज्यादा कसना होगा। यह सच है कि राजनीतिक शह के बिना ऐसी गड़बड़ियां शायद ही हो सकती हैं, लेकिन ऐसे मामलों में फिलहाल नौकरशाहों की संलिप्तता अधिक दिखी है, इसलिए शुरुआत उन्हीं से करनी होगी।
श्याम सुंदर, टिप्पणीकार 

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