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उठते सवालों से साख पर लगता दाग

चुनाव आयोग द्वारा मतदान के कई-कई दिनों बाद अंतिम आंकड़े को अपडेट करना शक पैदा करता है। यह उसकी निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर उंगली उठाने का कारण बनता है। यह युग तकनीक का है...

उठते सवालों से साख पर लगता दाग
Monika Minalहिन्दुस्तानFri, 24 May 2024 10:14 PM
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चुनाव आयोग द्वारा मतदान के कई-कई दिनों बाद अंतिम आंकड़े को अपडेट करना शक पैदा करता है। यह उसकी निष्पक्षता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर उंगली उठाने का कारण बनता है। यह युग तकनीक का है। प्रौद्योगिकी के मामले में भारत भी किसी से कम नहीं है। ‘चट मंगनी, पट ब्याह’ की तर्ज पर विश्वसनीय आंकडे़ मतदान के समाप्त होने के चंद घंटों में ही जारी किए जा सकते हैं। फिर भी, काफी दिनों बाद आंकड़ों को अपडेट किया जा रहा है, जिस पर अब अदालत की नजर भी टेढ़ी हो गई है। स्पष्ट है, चुनाव आयोग को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए और अधिक पारदर्शिता से काम करना होगा, ताकि किसी को उंगली उठाने का मौका न मिले। प्रत्येक मतदान केंद्र के पीठासीन अधिकारी द्वारा प्रत्येक उम्मीदवार के नियुक्त मतदान अभिकर्ता (एजेंट) को मतदान के आंकड़़ों की एक-एक प्रति दी जाती है। मतों के लेखा की प्रति व अपडेट किए गए आंकड़ों के मिलान से ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है। अगर मतों का लेख तथा अपडेट आंकड़ों में कोई अंतर आता है, तो चुनाव आयोग की नीयत पर सवाल उठ खड़े हो सकते हैं, जो उसकी धवल प्रतिष्ठा पर काला दाग सरीखा होगा। यही कारण है कि आयोग से संजीदगी और सक्रियता दिखाने की अपील देश का सभी संवेदनशील तबका कर रहा है। दिक्कत यह भी है कि आयोग कभी-कभी कार्रवाई करता भी है, तो वक्त बीत जाने के बाद। मसलन, उसने अब जाकर राजनीतिक दलों को नोटिस देकर कहा है कि वे धर्म, जाति, संप्रदाय, सेना, संविधान आदि पर बयानबाजी न करें। इस तरह की सख्ती अगर आदर्श आचार संहिता लगने के साथ शुरू हो गई होती, तो उचित होता, लेकिन अब तो चिड़िया चुग गई खेत वाली स्थिति है। कभी टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्तों ने अपनी सख्त और निष्पक्ष कार्यशैली से आयोग की विश्वसनीयता दुनिया भर में स्थापित की थी। मगर आज उस पर यदि सवाल उठ रहे हैं, तो आयोग को खुद पहल करके सभी शंकाओं का समाधान करना चाहिए। आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। आयोग को चाहिए कि वह शुरू से ही सख्ती दिखाए और उन विषयों की सूची सार्वजनिक करे, जो आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करते प्रतीत होते हैं। यह सख्ती भी इतनी सख्त होनी चाहिए कि ‘लक्ष्मण रेखा’ लांघने वाला उसे हमेशा याद रखे, फिर चाहे वह सत्ताधारी दल का हो या विपक्ष का। ऐसा करने पर ही चुनाव आयोग फिर से अपनी विश्वसनीयता हासिल कर सकेगा।
हेमा हरि उपाध्याय, टिप्पणीकार

चुनाव आयोग को बेवजह घेरना गलत
चुनाव सुधार की दृष्टि से देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ऐसा नाम थे, जिन्होंने विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र को चुनाव आयोग की शक्तियों से परिचित कराया और जनमानस को चुनाव की आदर्श व्यवस्था का बोध कराया। चुनाव अनुशासन के क्षेत्र में वह एक आदर्श मुख्य चुनाव आयुक्त सिद्ध हुए थे। उसके बाद चुनाव व्यवस्था पर भले ही एकाधिक बार संदेह की उंगली उठाई गई, लेकिन संदेह महज संदेह तक सिमटा रहा, सच साबित नहीं हो सका। इस बार भी ऐसी हवा बनाई जा रही है और चुनाव आयोग को घेरने का प्रयास हो रहा है। मगर हर बार की तरह चुनाव आयोग पाक साफ साबित होगा।
हर बार की भांति इस चुनाव में भी आयोग ने वे तमाम प्रतिबंध लगाए हैं, जो पूर्व में निष्पक्ष चुनाव के लिए लगाए जाते रहे हैं। बावजूद इसके कुछ राजनीतिक दल चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनके मुताबिक, आयोग निष्पक्ष नहीं है, मानो उनके पास ऐसे तथ्य हैं, जो आयोग की अविश्वसनीयता को साबित करते हैं। वास्तव में, ये सभी दावे फिजूल हैं। इनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं। यह ठीक ऐसा ही है कि सभी दल अपनी-अपनी जीत का दावा करें, लेकिन विजेता तो वही होता है, जिसे बहुमत मिलता है। चुनाव आयोग पर लोगों का विश्वास बना हुआ है। कुछ राजनेता भले ही इस विश्वास को खंडित करने की कोशिश करें, लेकिन जनता सब कुछ जानती-समझती है। 
इसी तरह, अपनी-अपनी जीत का दावा करके भी राजनेता चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना चाहते हैं। जिन नेताओं का राज्य विशेष के अलावा दूसरे सूबे में कोई आधार नहीं, वे भी अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसा करके वे बाद में ईवीएम पर सवाल उठाना चाहते हैं, ताकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ध्वस्त हो और देश का लोकतंत्र कमजोर पड़ जाए। इस सूरतेहाल में, चुनाव आयोग को और सख्त होना चाहिए। वह ऐसे नेताओं के अप्रामाणिक बयानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने से परहेज न करे। यदि समय रहते निष्पक्ष भाव से झूठे और आधारहीन भाषणों को संज्ञान में लेकर कठोर कार्रवाई की जाए, तो बहुत संभव है कि केवल भ्रमित करने वाले बयान देकर चुनाव का रुख बदलने का प्रयास करने वाले नेतागण सुधर जाएंगे और चुनाव आयोग व जनता के प्रति उनकी जवाबदेही अधिक सुनिश्चित हो जाएगी। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो इससे उत्पन्न होने वाली स्थिति लोकतंत्र के लिए नासूर साबित हो सकती है। चुनाव आयोग को यह देखना होगा।
सुधाकर आशावादी, टिप्पणीकार