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अध्ययन सामग्री से अवसाद पैदा न हो

पाठ्यक्रमों में बदलाव नितांत आवश्यक है, मगर ऐसा करते वक्त कम से कम ऐतिहासिक तथ्यों का तो ध्यान रखना चाहिए। यह समझना चाहिए कि भारत को एकपक्षीय बनाने की कोशिश गंभीर दुष्परिणाम देगी, इसलिए एनसीईआरटी...

अध्ययन सामग्री से अवसाद पैदा न हो
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 18 Jun 2024 11:42 PM
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स्कूली पाठ्यक्रमों में एक बार फिर बदलाव किया गया है और आलोचक पूर्व की भांति भगवाकरण के आरोप लगा रहे हैं, जिसका खंडन एनसीईआरटी के निदेशक ने तत्काल कर दिया। उनका कहना है कि 12वीं की पाठ्य-पुस्तकों में गुजरात दंगों और बाबरी मस्जिद गिराए जाने के संदर्भों को इसलिए संशोधित किया गया है, क्योंकि दंगों के बारे में पढ़ाना हिंसक और अवसादग्रस्त नागरिक पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तथ्यों में यह बदलाव वार्षिक संशोधनों का हिस्सा है और इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। वाकई, एनसीईआरटी द्वारा पुस्तक में किया गया संशोधन समयोचित है। अभी भी राजनीतिशास्त्र की हमारी पाठ्य-पुस्तकों में कई तरह की भ्रमित करने वाली जानकारियां भरी हुई हैं, जिनमें सुधार करना आवश्यक है। ऐसा इसलिए भी किया जाना चाहिए, क्योंकि हमें देश पर जान लुटाने वाले शूरवीरों की कहानी पढ़नी चाहिए, न कि  उनकी, जिन्होंने हमारी सभ्यता-संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया। वास्तव में, स्कूली शिक्षा बच्चों को कच्ची मिट्टी से पक्का घड़ा बनाती है। इसमें किसी भी तरह की गलतफहमी बच्चों के मन-मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव डाल सकती है। यही कारण है कि अध्ययन-सामग्री में बदलाव का खुले दिल से समर्थन करना चाहिए।
सुभाष बुडावन वाला, टिप्पणीकार
नफरत बढ़ेगा इससे
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के एक और सुखद प्रयास पर बेवजह की राजनीति की जा रही है। स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में किए गए फेरबदल पर सवाल उठाना गलत है। आखिर क्यों दंगों से जुड़े विषय बच्चों को पढ़ाए जाने चाहिए? एनसीईआरटी के निदेशक सही कहते हैं कि छात्रों को दंगों के बारे में क्यों पढ़ाया जाए? नफरत और हिंसा स्कूल में पढ़ाने के विषय नहीं हैं। स्कूल का काम सकारात्मक नागरिक तैयार करना है, न कि हताश और हिंसक लोग। वाकई, बाल मन काफी कोमल होता है। उस पर हिंसक तथ्यों का नकारात्मक असर पड़ सकता है। वैसे, इन बदलावों के साथ आवश्यक यह भी है कि कुछ नए विषय स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किए जाएं। बच्चों को शुरू से ही ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए कि उनमें देश के प्रति एक अलग जज्बा हो, वे अपने इतिहास का सम्मान करें और भविष्य को बेहतर बनाने को तत्पर रहें। बच्चों की शिक्षा निस्संदेह हिंसक तथ्यों से दूर रहनी चाहिए, ताकि उनमें नफरत के बीज अंकुरित न हो सकें। 
मीना धानिया, टिप्पणीकार 

इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश
एनसीईआरटी की पाठ्य-पुस्तकों में किए गए ताजा बदलावों की सिर्फ निंदा ही की जा सकती है। यह पाठ्य-पुस्तकों को विकृत करने का भी एक गंभीर मामला है। खबरों की मानें, तो अब बारहवीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की पुस्तक से बाबरी मस्जिद का नाम हटाकर उसे ‘तीन गुंबदों वाला ढांचा’ कहा गया है, साथ ही इससे जुड़े कई अंशों को भी हटा दिया गया है। नई किताब में दो पृष्ठों में अयोध्या से जुड़े संदर्भों को रखना गलत नहीं है, लेकिन ऐसा करते हुए कुछ जरूरी तथ्य किताब से बाहर कर दिए गए हैं, जो आपत्तिजनक हैं। मसलन, गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा, कार-सेवकों की भूमिका, 6 दिसंबर, 1992 की घटना के बाद सांप्रदायिक हिंसा आदि। चूंकि इन तमाम घटनाक्रमों में सत्तारूढ़ दल की किसी न किसी तरह की भूमिका मानी जाती है, इसलिए यह साफ है कि सरकार के इशारे पर ही इतिहास को इस तरह तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की गई है। नतीजतन, उचित ही पाठ्यक्रम के मुख्य सलाहकार योगेंद्र यादव और सुहास पलशीकर ने एनसीईआरटी को कहा है कि नई पुस्तकों में से उनके नाम हटा दिए जाएं, अन्यथा उन्होंने कानूनी कार्रवाई की धमकी दी है।
वाकई, क्या यह नई पीढ़ी के साथ क्रूर मजाक नहीं है कि जिस बाबरी मस्जिद को पुरानी किताबों में 16वीं सदी की मस्जिद बताया जाता था और जिसे मुगल सम्राट बाबर के जनरल मीर बाकी ने बनवाया था, उसे नई किताब में तीन गुंबद वाली संरचना बताया गया है, जिसे 1528 में श्रीराम के जन्मस्थान पर बनाने की बात कही गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि इस संरचना के आंतरिक और बाह्य हिस्सों में हिंदू प्रतीकों व अवशेषों की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। इसी तरह किताब के नए संस्करण में अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक उप-खंड भी जोड़ा गया है, जिसका शीर्षक है- कानूनी कार्रवाई से सौहार्दपूर्ण स्वीकृति तक। मगर क्या भारत के बच्चों को यह पता नहीं होना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस को गंभीर आपराधिक कृत्य की संज्ञा दी थी?
पाठ्यक्रमों में बदलाव नितांत आवश्यक है, मगर ऐसा करते वक्त कम से कम ऐतिहासिक तथ्यों का तो ध्यान रखना चाहिए। यह समझना चाहिए कि भारत को एकपक्षीय बनाने की कोशिश गंभीर दुष्परिणाम देगी, इसलिए एनसीईआरटी के प्रयासों का विरोध होना चाहिए। पाठ्य-पुस्तकों में किए गए ताजा बदलाव को तत्काल वापस लेना चाहिए और सही तथ्यों के साथ किताबें फिर से प्रकाशित की जानी चाहिए।
विमल कुमार, टिप्पणीकार