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पीओके अब हमारा हिस्सा बनकर रहेगा

क्या बदला नरेंद्र मोदी के आने से? ऐसा पूछने वालों के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लहराते तिरंगे की खबर बहुत कुछ कह रही है। पहले हिन्दुस्तान में देशद्रोहियों द्वारा पाकिस्तान के झंडे लहराए...

पीओके अब हमारा हिस्सा बनकर रहेगा
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 21 May 2024 10:07 PM
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क्या बदला नरेंद्र मोदी के आने से? ऐसा पूछने वालों के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में लहराते तिरंगे की खबर बहुत कुछ कह रही है। पहले हिन्दुस्तान में देशद्रोहियों द्वारा पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते थे और ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगते थे, क्योंकि उनको संरक्षण मिला करता था। मगर अब पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके के लोग हिन्दुस्तान का नाम लेकर मरने-मारने पर उतारू नजर आते हैं। वे हमारे प्रधानमंत्री का लोहा स्वीकार कर रहे हैं और इस सत्य को स्वीकार कर रहे हैं कि अगर उनका कोई उद्धार कर सकता है, तो वह सिर्फ नरेंद्र मोदी हैं। इन कश्मीरियों के मुताबिक, मजहब के नाम पर डरा-धमकाकर काबिज पाकिस्तान के हुक्मरान उनको गर्त में ही ले जाएंगे, एक मोदी ही हैं, जो इस क्षेत्र को फिर से तरक्की के रास्ते पर ला सकते हैं। असल में, पाकिस्तान के सत्तानायक अपने अवाम को आटा भी उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं। ऐसे में, वे आखिर कैसे पीओके की जनता का भला कर सकेंगे? अच्छी बात है कि अब वहां के लोग इस सत्य को समझ गए हैं, इसलिए वे भारत का तिरंगा लहराने लगे हैं! उम्मीद है, पीओके भी भारत का फिर से अंग बन सकेगा, जिससे उसकी आत्मा सदियों से जुड़ी हुई है। वैसे भी, जब पूरी दुनिया में तिरंगे की लहर है, तो भला पीओके पीछे कैसे रह सकता है?
देवेंद्र कांटिया, टिप्पणीकार

दिल में हिन्दुस्तान
पीओके में विरोध-प्रदर्शन की आग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वहां के लोग पाकिस्तान की सरकार और फौज से नाराज हैं और संपूर्ण आजादी की मांग कर रहेे हैं। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि फौजियों को वहां के लोग दौड़ा-दौड़कर पीट रहे हैं। पाक अधिकृत कश्मीर में आजादी का तूफान उठ खड़ा हुआ है और लोग किसी भी कीमत पर पाकिस्तान से मुक्ति चाह रहे हैं। साफ है, जिस पीओके की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ साजिश के लिए पाकिस्तान करता रहा है, अब उसी जमीन पर हिन्दुस्तान के समर्थन वाली आवाज इस कदर बुलंद हो रही है कि इस्लामाबाद और लाहौर में बैठे पाकिस्तानी हुक्मरान व वहां के फौजी अफसरों की नींद हराम हो गई है। पहले पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में पुलिस व सरकार से त्रस्त जनता सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया करती थी, लेकिन अभी वहां बगावत की आग लगी हुई है। उनका साफ-साफ कहना है कि पाकिस्तान पीओके छोड़े। उनके दिल में एक अच्छे उदाहरण के रूप में हिन्दुस्तान बसता है। मतलब साफ है कि कश्मीर के इस हिस्से पर से पाकिस्तान अपना कब्जा अब गंवा रहा है। 
पवन त्यागी, टिप्पणीकार

इतनी भावुक न बने भारत की जनता
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर वापस लेने के लिए 400 सीटें लोकसभा में होने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था कि पीओके भारत का हिस्सा है। अब इसी काम के लिए संसद से किसी नए प्रस्ताव की आवश्यकता नहीं है। हमें सिर्फ बौद्धिक रूप से ईमानदार होना होगा। ऐसा इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि तर्क और सार्थक बहस का संस्कार सुन्न न हो जाए।
कुछ दिनों पहले पाकिस्तान के एक नेता फवाद चौधरी ने जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम लिया, तो उस पर खूब चर्चा हुई, लेकिन अब अमेरिका के एक पाकिस्तानी मूल के व्यापारी साजिद तरार ने हमारे प्रधानमंत्री की प्रशंसा की और उम्मीद जताई कि उनकी फिर से ताजपोशी होने के बाद पाकिस्तान से बातचीत शुरू हो जाएगी और व्यापार भी होगा, तो कहीं कुछ बहस नहीं हुई। मेरा केवल इतना कहना है कि दुनिया की राजनीति के मूल में केवल व्यापारिक हित और आर्थिक मुनाफा है, इसलिए जनता को इतना भी भावुक नहीं होना चाहिए। वैसे भी, चुनाव के बाद सभी को इसी देश में रहना है, लेकिन हर बार चुनाव प्रचार में जिस प्रकार तीखेपन के साथ विभाजन होता है, उसकी गहरी लकीर समाज पर पड़ती जा रही है और उसका तोड़-मरोड़कर विश्लेषण किए जाने से आम लोगों पर बुरा असर पड़ रहा है। चुनाव के बाद सभी एक हो जाते हैं, इसलिए इस बार भी फिर से वे एक हो जाएंगे, लेकिन जो लोग चुनाव प्रचार के दौरान कही गई बातों को मानकर एक-दूसरे के लिए नफरत पाल रहे हैं, उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराएं?
इन सभी का केवल एक परिणाम हो रहा है कि दुनिया के लोग हमें देख रहे हैं और मजे ले रहे हैं। उन्हें लगता होगा कि जो भारतीय तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का ख्वाब देख रहे हैं और मंगल और चंद्र की बातें कर रहे हैं, वे असल में कबीलों की तरह अपने आर्थिक मुनाफे को बचाने के लिए राजनेताओं द्वारा उसी तरह लड़वाए जा रहे हैं, जैसा कभी ईस्ट इंडिया ने अपने मुनाफे के लिए हिन्दुस्तानियों को लड़वाया था! 
यकीन न हो, तो आप खुद इस आम चुनाव की थीम देखिए? इसमें क्या बहस हो रही है? यही है न कि देश के दो कारोबारियों के पास ढेर सारा पैसा है और कोई उनका पैसा बचा रहा है और कोई उनसे छीनने के वायदे कर रहा है। मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए सभी कुछ न कुछ इसी तरह की कहानी और नैरेटिव गढ़ रहे हैं!
अमिताभ त्रिपाठी, टिप्पणीकार